सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 20 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६६७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४९
सद्ग्रंथों का अध्ययन प्रारम्भ करें ध्यान धारणा स्वाध्याय करें जिससे हमारे भीतर की दुर्बलता दूर होगी
यदि जीवन पूर्णतः समरूप और निष्कम्प हो जाए, उसमें न कोई चुनौती रहे और न किसी प्रकार का परिवर्तन, तो न पुरुषार्थ का जागरण होगा और न ही विकास सम्भव होगा। अतः हमें जीवन में आने वाले संघर्षों और कष्टों से विचलित नहीं होना चाहिए, अपितु उन्हें धैर्य, साहस और दृढ़ संकल्प के साथ स्वीकार कर आगे बढ़ना चाहिए।
जब मनुष्य केवल भौतिक सुख, प्रतिष्ठा, स्पर्धा और बाह्य आकर्षणों में ही उलझा रहता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। यही विस्मृति उसे उसकी आन्तरिक शक्ति से दूर कर देती है। किन्तु भावुक भक्त ज्ञान की सीमा का संस्पर्श करते हुए कहता है सोऽहं
*सोऽहं* एक अत्यन्त गूढ़ और महत्त्वपूर्ण वैदिक महावाक्य है। अर्थात् “मैं उसी परम शक्ति का अंश हूँ।”
हमारे ग्रंथ केवल ज्ञान के भंडार ही नहीं, अपितु शक्ति के भी अक्षय स्रोत हैं। यदि हम उनका नियमित अध्ययन और स्वाध्याय करें, तो हमारे भीतर राष्ट्रभक्ति का भाव स्रष्टा के प्रति अनुराग स्वाभाविक रूप से जाग्रत होगा।
सद्ग्रंथ केवल शब्दों का संग्रह नहीं होते, वे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं। उनके अध्ययन से मनुष्य के भीतर श्रेष्ठ भावनाएँ जाग्रत होती हैं।
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