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23.9.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 23 सितम्बर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।

तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु॥ 31॥




प्रस्तुत है ज्ञान -क्षौणिप्राचीर आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 23 सितम्बर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/56


क्षौणिप्राचीरः =समुद्र


निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥



वन -पथ पर गमन करते हुए भगवान् श्री राम  ने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं मही (पृथ्वी) को राक्षसों से रहित कर दूँगा....


इस संसार में वन, धन, जन के साथ मन भी है और सब के साथ संतुलन करता हुआ संघर्ष करता हुआ मनुष्य अपनी यात्रा करता है


अरण्य कांड में कथाओं में वैविध्य है ऐसे ऋषियों, जिनके श्राप से रावण भी भयभीत है, के संपर्क, प्रेम, आत्मीयता, तपस्या का समावेश है


कबन्ध के कारण शरभंग के आश्रम बहुत लोग जाते नहीं हैं फिर कबन्ध नष्ट होता है



जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी॥

निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥4॥


रामकथा के माध्यम से तुलसी ने सामाजिक जागरण का भी संकेत किया

ऋषि मुनि तपस्या में लगे हैं संगठन में नहीं लगे हैं जब कि संगठन की आवश्यकता है 


मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥

मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥1॥


प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा॥

हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया॥2॥

सुतीक्ष्ण जिज्ञासा व्यक्त कर रहे हैं कि क्या दीनबंधु राम मुझ शठ पर भी दया करेंगे


नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥

एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥4॥


होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन॥

*निर्भर प्रेम* मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी॥5॥


मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यान जनित सुख पावा॥

भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा॥9॥


आचार्य जी ने ध्यान जनित सुख के लिये स्वामी विवेकानन्द का उदाहरण दिया कि ध्यानमग्न होने पर उनके ऊपर सांप चढ़ गया और उन्हें पता नहीं चला


परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी॥

भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई॥11॥


तब मुनि हृदयँ धीर धरि गहि पद बारहिं बार।

निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार॥10॥


एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुंभज रिषि पासा॥

बहुत दिवस गुर दरसनु पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ॥1॥



शक्ति के पुञ्ज कुंभज (कुम्भ से जन्म लेने के कारण )ऋषि अर्थात् अगस्त्य मुनि का तथ्यपूर्ण मिलन है l

ऐसे विलक्षण शक्ति के पुञ्ज ऋषियों के होते हुए रावण क्यों विकसित हो रहा था इस  रहस्य का उद्घाटन आचार्य जी आगे करेंगे

21.9.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 21 सितम्बर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है तकिलारि आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 21 सितम्बर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/54


तकिल =जालसाज, धूर्त 

अरि =  शत्रु



नित्य ही आचार्य जी सांसारिक कार्यों में रत हम मानस पुत्रों के लिये कल्याणकारी, हमें उत्साहित करने वाले,विचारों को प्रखर करने वाले और मन को सुस्थिर करने वाले वचन कहते हैं अभिभाव्यों के प्रति उनकी सचेत रहने वाली दृष्टि अभिभाव्यों को मार्गान्तरण से रोकती है



दीनदयाल विद्यालय की एक समय रही   विशिष्ट पवित्रता का चित्र आचार्य जी ने आचार्य श्री जे पी (जागेश्वर प्रसाद जी )जी के प्रसंग (सन् 1982/83 का समय )के माध्यम से खींच दिया


विद्यालय में पैर रखते समय श्री जे पी जी को एक विशेष अनुभूति होती थी एक रिक्शा चालक ने उनसे धन नहीं लिया और उसका कारण बताया कि वो जब भी इस विद्यालय में किसी को छोड़ता है तो उससे धन नहीं लेता है


ऐसी पवित्रता गुरु जी बैरिस्टर साहब बूजी अशोक सिंघल जी आचार्यों की तपस्या का प्रतिफल थी

हमें इसकी अनुभूति होनी चाहिये


आइये अरण्य कांड में प्रवेश करते हैं अरण्य कांड उस सांसारिक लक्ष्य की पूर्ति की भूमिका है जिसके लिये प्रभु राम इस धरती पर  अवतरित हुए हैं


सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं।

तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित॥5 ख॥



कवियों का कल्पनालोक भावजगत की अभिव्यक्ति है सतीत्व के प्रति कवि की अद्भुत कल्पना के उदाहरण स्वरूप आचार्य जी ने निम्नांकित श्लोक उद्धृत किया


सुतं पतन्तं प्रसमीक्ष्य पावके

न बोधयामास पतिं पतिव्रता ॥

पतिव्रताशापभयेन पीडितो

हुताशनश्चन्दनपङ्कशीतलः ॥

(अपने पुत्र को अग्नि में गिरते हुए देखकर भी पतिव्रता स्त्री ने अपने पति को नहीं जगाया और उसकी सेवा में रत रही। ऐसी पतिव्रता से डरकर अग्नि भी  चन्दन की तरह  शीतल हो गयी।)


सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा॥

तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना॥1॥


धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥

बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥4॥


यह एक पक्षीय दिख रहा है लेकिन पद्मपुराण के सृष्टिखंड में पापी पुरुष का भी वर्णन है


सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा॥

तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना॥1॥


सीता  ने यह सब सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक अनुसूया के चरणों में सिर झुकाया  तब यशस्वी चर्चित विनम्र  राम ने मुनि अत्रि से कहा- आज्ञा हो तो अब दूसरे वन में जाऊँ


जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी॥

ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे॥3॥


केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी॥

अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा॥5॥


ऋषि भावुक होते हैं तो अद्भुत स्थिति होती है


आचार्य जी ने भावुक वशिष्ठ का भी उल्लेख किया

हमें समय निकालकर मानस में अवश्य ही प्रवेश करना चाहिये इस मानस को अपने मानस में हमें उतार लेना चाहिये


रामकथा मानस में जो पिरोई गई है वह इस संसार के साथ सात्विक चिन्तन मनन निदिध्यासन अध्यात्म को संयुत कर देती है

19.9.22

श्री ओम शंकर जी का दिनांक 19 सितम्बर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 .प्रस्तुत है संवित्ति -सागर आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 19 सितम्बर 2022

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सार -संक्षेप 2/52


संवित्ति =ज्ञान

आइये सदाचार वेला में प्रवेश करते हैं  शरीर संसार भूलकर आनन्द प्राप्त करने के लिये


तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥

सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥2॥


यदि राम राज्य करने लगेंगे तो रावण को कौन मारेगा

इसलिये अद्भुत लीला रची गई राम के वन जाने के लिये दोषी कोई नहीं मां कैकयी सर्वथा निर्दोष हैं

भगवान् ने निषाद के सामने भी चौदह वर्ष वन में काटने की बात कही


अरण्य कांड में प्रवेश करते हैं


अरण्य कांड में बहुत उतार चढ़ाव हैं इस में भक्ति, संघर्ष, राम -गीता, नारद संवाद है


इसी कांड में भगवान् राम दिखाते हैं कि वो अकेले ही बहुत कुछ कर सकते हैं



अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।

रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।।

दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।।

कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।।

मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।

अनुसूया सीता माता को उपदेश देती हैं तपस्या से प्राप्त दिव्य वस्त्र देती हैं जिनमें मल नहीं लगेगा शील की रक्षा होगी 

नारी धर्म क्या है इसे बताया

यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है

हमें इसे समझना चाहिये 

पश्चिम की बयार कितनी घातक रही है जिसके व्यामोह में हम फंसते चले गये और हम इनके महत्त्व से अनजान रहे 


सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं

पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्

राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं

सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे।।2।।


भगवान् राम के दोनों हाथों में धनुष बाण हैं जो अत्यन्त आवश्यक हैं एक ओर तो पीतांबर पहने हैं लेकिन इसके बाद भी धनुष बाण धारण किये हुए हैं

ऐसे राम का भक्तिपूर्वक हम लोग ध्यान करें


विलासिनी दुष्टा शूर्पणखा जब राम को पथ से डिगाने की कोशिश करती है वहां संयम सात्विकता कौशल की परीक्षा हो जाती है


ताड़का का तो वध हुआ लेकिन शूर्पणखा के नाक कान कटते हैं



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अत्यन्त मृदु स्वभाव के स्व आचार्य हेमन्त जी को श्रद्धाञ्जलि दी

भैया विजय मित्तल भैया सौरभ राय का उल्लेख क्यों हुआ 

राजीव दीक्षित का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया जानने के लिये सुनें

15.5.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 15 मई 2022 का सदाचार संप्रेषण

 कर्म देश-हित के रहें, ईश्वर पर विश्वास। 

भावपूर्ण अन्तःकरण, मनस् आत्मविश्वास। ।

अपनों पर विश्वास हो, वैरी पर हो दृष्टि ।

इसी तरह करते चलें, संगठना की सृष्टि ।।

निज चरित्र आदर्श हो, भटके के प्रति प्रेम। 

प्रतिदिन ही करते रहो, सबका योग क्षेम। ।

भारत माँ के पूत हम , हम जगती के

 मूल। 

निर्वारेंगे फिर हमी , जग के उपजे शूल ।।



प्रस्तुत है  समाकर्षिन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 15 मई 2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




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अपने देश में बारहवीं शताब्दी से साजिशों का घिनौना खेल चल रहा है l यूं तो साजिशें पहले भी हुई हैं लेकिन पहले के विवाद  विकृत मानसिकताओं की भेंट नहीं चढ़े थे सीधे सीधे युद्ध होते थे  विचारों, व्यवहारों के युद्ध होते थे बाहर से लुटेरे आते थे

यद्यपि हम संगठित नहीं थे लेकिन छली प्रपंची नहीं थे

छल और प्रपंच पश्चिम की देन है लेकिन फिर भी पश्चिमी विचार पश्चिमी आचार पश्चिमी व्यवहार हमें आकर्षित करता है

और इसी कारण हम अपने पर विश्वास नहीं करते


अरण्य कांड में

जब लक्ष्मण ने शूर्पणखा (जिसके नख छाज जैसे लम्बे चौड़े हों ) के नाक कान काट डाले तो वह रावण के पास गई 

यहां विद्वान महात्मा चिन्तक तपस्वी समाज के पथ- प्रदर्शक तुलसीदास ने प्रपंचपूर्ण छलपूर्ण भाव से अद्भुत प्रस्तुतिकरण किया है


धुआं देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥

बोली बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी॥3॥


करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥

राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥4॥

बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ॥

संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥5॥


प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहिं बेगि नीति अस सुनी॥6॥


 रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।

अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन॥21 क॥


सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।

तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ॥21 ख॥


सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाँह उठाई॥

कह लंकेस कहसि निज बाता। केइँ तव नासा कान निपाता॥1॥


अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए॥

समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी॥2॥


जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन॥

देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना॥3॥


अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥

सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥4॥


रूप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी॥

तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा॥5॥


...रहित निसाचर करिहहिं धरनी ....

आज भी बहुत से लोगों को लग रहा है कि यह वातावरण निशाचर रहित हो जायेगा इसलिये वो व्याकुल हैं हमें छल बल समझने की जरूरत है


उत्तेजित न हों होश के साथ जोश रखें विचार के साथ व्यवहार हो


अच्छे लोगों को साथ मिलाते चलें

समय व्यर्थ न करें लेखन आदि में समय लगाएं संगठन को समय दें समाज -गंगा में अपना योगदान दें

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने केजरीवाल सच्चाई या साजिश पुस्तक (लेखक :संदीप देव कपोत बुक्स )की चर्चा की

विद्यालय में सस्ते में कौन ईंट देता था भैया ज्योति भैया प्रकाश शर्मा आदि का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिये सुनें

9.5.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 9 मई 2022

 सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुंदरं

पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्।

राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं

सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे॥2॥


प्रस्तुत है आत्मयाजिन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 9

मई 2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




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हम अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि आचार्य जी के सांसारिक प्रपंचों में लगातार फंसे रहने के बाद भी उनके आप्तवचन से हम लाभान्वित हो रहे हैं


साधनों के भंवर में फंसकर साधानानुरक्त होना भक्ति का आश्रय लेकर साधना की ओर उन्मुख होना यही दर्शाता है कि वास्तव में मनुष्य परमात्मा की एक अद्भुत रचना है


परमात्मा द्वारा बनाया गया संयोग है कि हम आनन्द और उत्साह में उछलते हैं और सुख दुःख में डूब जाते हैं


परमात्मा के बनाये सिद्धान्तों पर निरन्तर चलते रहने से दैविक, आधिदैविक और अधिभौतिक त्रितापों से हमें सहज मुक्ति मिलेगी।


अरण्य कांड में


भगवान् राम कई ऋषियों के आश्रम में जाते हैं प्रसंग वहां का है जब सीता लक्ष्मण सहित भगवान् राम सुस्ता रहे हैं

एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥

सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥3॥


मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥

कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥4॥


ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।

जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥14॥


थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥

मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥1॥


एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥

एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥3॥


एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥

श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥4॥


बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।

तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥16॥


आचार्य जी ने इनको पढ़ने का परामर्श दिया


भगवान् राम बता रहे हैं कि मेरी भक्ति भक्तों को सुख देने वाली है

जो माया ईश्वर आत्मस्वरूप को नहीं जानता वो जीव है

अविद्या दुष्ट है विद्या जगत की रचनाकार है


जो करता है परमात्मा करता है परमात्मा सब अच्छा ही करता है

हमें आत्मचिन्तन में समय लगाना चाहिये भ्रमित होने पर मानस और गीता का सहारा लें मार्ग निकल आयेगा

आत्मशक्ति की आवश्यकता है आत्मिक स्वास्थ्य परिशुद्ध बना रहे इसका प्रयास करते रहें


घटाकाश (09:00 पर ) का क्या अर्थ है,किसी की निष्प्राण देह के प्रति हमारा व्यवहार कैसा रहता है आदि जानने के लिये सुनें

7.5.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 7 मई 2022 का सदाचार संप्रेषण

 महामृत्युंजय मंत्र 

||ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥



प्रस्तुत है विवेकदृश्वन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 7 मई 2022

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हम जब भी कोई कार्य करें तो सबसे पहले अपने इष्टदेव का स्मरण अवश्य करें इन सदाचार संप्रेषणों का उद्देश्य ही है कि हमें इनसे वैचारिक बल मिले वैचारिक बल तभी सुरक्षित रहता है जब शारीरिक बल सहज रहता है शारीरिक स्वस्थता की ओर लगातार सचेष्ट रहने की आवश्यकता है  जीवनचर्या भी महत्त्वपूर्ण है उस बल का सदुपयोग  स्वयं करें और स्वयं जैसे समाज की निर्मिति के लिये करें


यह क्रिया संस्कार है संस्कार लगातार चलते हैं विकार सहज रूप से आ जाते हैं

इन विकारों को दूर करने का सतत् प्रयास करते रहना चाहिये अच्छे सात्विक बीजों को विचार के रूप में  पल्लवित करने की कोशिश करते रहना ही संसार का कर्तव्य पालन है


कार्य सामान्य हो असामान्य हो व्यवहार साधारण हो असाधारण हो सबके प्रति लगातार सचेत रहने की क्रिया जिन लोगों के मन मस्तिष्क में छाई रहती है ऐसे लोग अपने को संसार सागर से बचा लेते हैं

शरीर को स्वस्थ करके आराम देना भी गलत है


सबसे बड़ा भय मृत्यु से होता है  लेकिन हमें शरीर बदलने में भी कष्ट नहीं होना चाहिये जैसे पका हुआ खरबूजा लता से संबंध को त्याग देता है

मानस में भी इसी प्रकार की शिक्षा हम लोगों को दी गई है


अरण्य कांड में


अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।

तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम॥32॥


अखण्ड भक्ति का वर माँगकर  जटायु  परमधाम को चले गये । भगवान् राम ने उनकी  क्रियाएँ यथायोग्य अपने हाथों से कीं॥32॥


संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन॥

आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता॥3॥

दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा॥

सुनु गंधर्ब कहउँ मैं तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही॥4॥


मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।

मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव॥33॥


.....

मानस और गीता के नित्य पाठ से हमारी ज्ञान की परतें खुलती जायेंगी और हम व्याकुल नहीं होंगे

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने विप्रत्व और शूद्र का क्या अर्थ बताया भैया विधुकांत जी भैया मोहन कृष्ण जी और भैया प्रवीण सारस्वत जी का नाम क्यों लिया जानने के लिये सुनें

3.5.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 3 मई 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है विगतकल्मष आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 3 मई 2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




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हम श्रवणोत्सुक समूह के लिये आचार्य जी ने परामर्श दिया कि इस संप्रेषण में जो कुछ बोला जा रहा है उस शक्ति की अनुभूति का प्रयास करें


वर्तमान में जीवित रहने का उत्साह हम सभी का है वर्तमान में जीवित रहते हुए संसार के साथ सामञ्जस्य स्थापित करते हुए संसार का आनन्द लेते हुए शौर्य शक्ति के साथ आगे बढ़ना औऱ ताप तप्त को ऐसी छाया प्रदान करना कि कुछ देर के लिये उस छाया में वो शान्त होकर बैठ सके किसी की व्याकुलता शान्त कर दी तो हमने उसे छाया दे दी यही संसार में रहते हुए भक्ति है


गीता के बारहवें अध्याय भक्ति योग में बीस छन्द हैं


संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।


ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।12.4


इन्द्रिय समूह को ठीक प्रकार से नियमित करके, सब जगह समभाव वाले,  भूतमात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।



अरण्य कांड में 


मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं

वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्।

मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं

वन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्।।1।।


और दूसरे छन्द में राम का स्वरूप देखते ही बनता है 

सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं

पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्

राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं

सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे।।2।l



जिनका शरीर  मेघों के समान सुंदर एवं आनंदघन है, जो सुंदर  पीत वस्त्र धारण किए हैं, जिनके हाथों में बाण और धनुष हैं, कमर उत्तम तरकस के भार से सुशोभित है, कमल  तुल्य विशाल आंखें हैं और माथे पर जटाजूट धारण किए हैं, उन अत्यन्त शोभायमान सीता जी और लक्ष्मण जी सहित मार्ग में चलते हुए आनंद देने वाले श्री राम जी को मैं भजता हूँ॥2||

हाथ में धनुषबाण  इस भाव का हमें वरण करना चाहिये 


त्रिकालदर्शी अत्रि के आश्रम में



* प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।

मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत॥3॥

भावार्थ:-प्रभु आसन पर विराजमान हैं। नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनि श्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे॥3॥


*नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥

भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥1॥

भावार्थ:-हे भक्त वत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाव वाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषों को अपना परमधाम देने वाले आपके चरण कमलों को मैं भजता हूँ॥1॥

*निकाम श्याम सुंदरं। भवांबुनाथ मंदरं॥

प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं॥2॥

भावार्थ:-आप नितान्त सुंदर श्याम, संसार (आवागमन) रूपी समुद्र को मथने के लिए मंदराचल रूप, फूले हुए कमल के समान नेत्रों वाले और मद आदि दोषों से छुड़ाने वाले हैं॥2॥

*प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं॥

निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥3॥

भावार्थ:-हे प्रभो! आपकी लंबी भुजाओं का पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय (बुद्धि के परे अथवा असीम) है। आप तरकस और धनुष-बाण धारण करने वाले तीनों लोकों के स्वामी,॥3॥

( shriramcharitmanas. in से साभार )

इन स्तुतियों को हमें याद करना चाहिये और अन्य लोगों को भी सुनाना चाहिये 


भक्ति और शौर्य का संयोग गीता और मानस दोनों में है यदि हम इनका अवगाहन करेंगे तो हमारे अन्दर इतना शक्ति सामर्थ्य आयेगा कि हम उदाहरण बन जायेंगे