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15.2.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 15 -02- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है  द्रुण -रिपु ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 15 -02- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  566 वां सार -संक्षेप

1 द्रुण =बदमाश


याचना की भक्ति मनुष्य को अन्दर से कमजोर करती है एक ऐसा समय भी आया था जब याचक भक्ति की अधिकता हो गई थी जिसने हमें कमजोर किया 

आचार्य जी हमें इन कमियों की ओर संकेत कर इन सदाचार संप्रेषणों के माध्यम से उत्साहित शक्तिसम्पन्न धैर्यशाली बनाने का प्रतिदिन प्रयास कर रहे हैं


भ्रम और निराशा दूर करने के लिये भक्ति और विश्वास को प्रविष्ट करा कर हम अतिचार वाली जगहों पर अपनी छाती अड़ाने के लिए अपने अंदर शक्ति का पुंज स्थापित कर सकते हैं यही शौर्य प्रमंडित अध्यात्म है

भारतवर्ष तो इन्हीं भावों से भरा धर्मक्षेत्र है


भारत महान भारत महान

जग गाता था गा  रहा नहीं गायेगा फिर पूरा जहान

भारत महान भारत महान...


धीरेन्द्र शास्त्री भी यही बात कहते हैं


भारतवर्ष संपूर्ण विश्व में अद्भुतताओं से भरा एक देश है

इन विचित्रताओं को हमारे तपस्वियों विचारकों चिन्तकों मनीषियों ने समय समय पर हमें बताया है

हमें भाव में जाकर इन पर विश्वास करना चाहिये

इसीलिये उपासना का महत्त्व है हम अंशी के ही अंश हैं

आत्मस्थ होने का हमें प्रयास करना चाहिये

यह जीवन केवल करुण कथा नहीं है

हमने तो रहस्यात्मक तत्त्व शक्ति प्राप्त की है इस पर विश्वास करें

भगवान् राम आत्मविश्वास का एक ज्वलन्त उदाहरण हैं

रामचरित मानस इसी आत्मविश्वास को जाग्रत करता है आइये इसी के लंका कांड में प्रवेश करते हैं

मातृभूमि के प्रति प्रेम दिखाती ये पंक्तियां


सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम।

सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम॥120 क॥

चौदह वर्ष बाद भगवान् राम अवधपुरी को देख रहे हैं


फिर त्रिवेणी में आकर भगवान् राम ने हर्षित होकर स्नान किया और  वनवासियों सहित ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिए


भरत जी का तो उन्हें ध्यान लगातार है ही


आचार्य जी ने निषाद का एक प्रसंग सुनाया

 विरह में उसने आंखों पर पट्टी बांध ली थी


इहाँ निषाद सुना प्रभु आए। नाव नाव कहँ लोग बोलाए॥3॥


सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल॥5॥


और  प्रभु को देखकर वह आनंद में मग्न होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा प्रभु ने उसका परम प्रेम देखकर हृदय से लगा लिया

मूर्ख लोग जातियों के आधार पर भेदभाव करते हैं जबकि राम कथा में तो ऐसा बिल्कुल नहीं है

हमें इन्हीं बातों को जानना है और अन्य लोगों को भी इसी तरह की जानकारियों से अवगत कराना है

होगा तब जब हम स्वयं भी इन्हें जानने का प्रयास करेंगे


इसके अतिरिक्त ब्राह्मणत्व को आचार्य जी ने कैसे परिभाषित किया

फिल्म दुश्मन के किस गीत की आचार्य जी ने चर्चा की जानने के लिये सुनें

12.2.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 12-02- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि॥

सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि॥118 ग॥



प्रस्तुत है संविदात ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 12-02- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  563 वां सार -संक्षेप

1 =प्रतिभाशाली


शिक्षा के विकृत होने से शिक्षार्थी और शिक्षक के स्वरूप समाज में समस्याएं खड़ी हो जाती हैं लेकिन उनका समाधान भी शिक्षा में ही छिपा है

शिक्षा शक्ति भक्ति विचार संस्कार और मनुष्य जीवन का सर्वश्रेष्ठ वरदान है

शिक्षा को तैत्तिरीय उपनिषद् में बहुत सुन्दर ढंग से व्याख्यायित किया गया है 


सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्‌। अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः। पञ्चस्वधिकरणेषु। अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम्‌ ll

हम दोनों  आचार्य और शिष्य एक साथ यशस्वी बनें , एक साथ ब्रह्मवर्चस प्राप्त करें । इसके बाद हम संहिता के गूढ़  अर्थ की व्याख्या करेंगे जिसके पाँच प्रमुख विषय (अधिकरण) हैं

लोकों से सम्बन्धित, ज्योतिर्मय अग्नियों से सम्बन्धित,  विद्या से सम्बन्धित ,प्रजा से सम्बन्धित और आत्मा से सम्बन्धित  ll

शिक्षा में बहुत कुछ है कैसा व्यवहार हो कैसा जीवन जिया जाये आदि आदि लेकिन यह काम कठिन है फिर भी इसके लिये प्रयासरत रहना चाहिये


मानस में

सेवत सुलभ सकल सुखदायक, प्रणतपाल सचराचर नायक

 भगवान् राम के विविध रूप देखने को मिलते हैं

जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ॥ 31॥



निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।


या


पूछत चले लता तरु पाँती॥4॥


या


अनुज देखि प्रभु अति दु:ख माना॥3॥


और ऐसा स्वरूप भी जिसका तुलसी जी ने जिक्र नहीं किया


राम जी का आविर्भाव और तिरोभाव जीवन के नाट्य मञ्च जैसा है


भगवान् राम


इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें॥

अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता॥


का जीवन देखिये तुलसीदास जी का जीवन देखिये हम लोग अपना जीवन भी देखें तो 

 हम सब का जीवन एक ही सूत्र में पिरोया हुआ है सूत्रधार एक है नट अलग अलग हैं


घोर संघर्षों के बाद भी राम विचलित नहीं हुए व्याकुल नहीं हुए विराग राग साथ साथ चलता रहा



जीवन का संघर्ष लंका कांड में चरम पर है


राम धर्मरथ का उपयोग बतलाते हैं जब विभीषण को संदेह है 

नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥


हमारा इतिहास कितने अरब वर्षों का है सनातन धर्म कब से है ये रहस्य हैं और जब तक हमारा प्रवेश वास्तविक शिक्षा के गलियारे में नहीं होगा तब तक हम ऐसे रहस्यों को सुलझा नहीं पायेंगे


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अपनी रचित एक कविता सुनाई



केवल प्राणों का परिरक्षण जीवन नहीं हुआ करता है.....

और आचार्य जी ने किस विश्वनाथ वाराणसी के कार्यक्रम की  चर्चा की जानने के लिये सुनें

9.2.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 09-02- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्‌। अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः। पञ्चस्वधिकरणेषु। अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम्‌ ll


(तैत्तिरीय उपनिषद् )

हम दोनों भावनाओं के आधार पर एक दूसरे से संबन्ध बनाये हुए आचार्य और जिज्ञासु शिष्य एक साथ यशस्वी बनें , एक साथ ब्रह्मवर्चस प्राप्त करें। इसके बाद हम संहिता के गूढ़  अर्थ की व्याख्या करेंगे जिसके पाँच प्रमुख विषय (अधिकरण) हैं

लोकों से सम्बन्धित, ज्योतिर्मय अग्नियों से सम्बन्धित,  विद्या से सम्बन्धित ,प्रजा से सम्बन्धित और आत्मा से सम्बन्धित  इन्हें 'महासंहिता' कहा जाता है।




प्रस्तुत है आयः शूलिक ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 09-02- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  560 वां सार -संक्षेप

1 परिश्रमी


विदेशों की भौतिक उपलब्धियों की परम्परा से इतर हमारी आर्ष परम्परा एक श्रेष्ठ परम्परा है और यह अनुभूति का विषय है और जब इसकी अभिव्यक्ति होती है तभी ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति होती है


भावनाओं का अत्यन्त गम्भीर महत्त्वपूर्ण संसार केवल मनुष्य को प्राप्त है यही मनुष्यत्व है हमें इसका तिरस्कार नहीं करना चाहिये


भारतभूमि


उस पर है नहीं पसीजा जो, क्या है वह भू का भार नहीं। वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥


 अत्यन्त विलक्षण भावुक चरित्रों की भूमि है


जिसने कि खजाने खोले हैं,नवरत्न दिए हैं लासानी। जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी॥



 राम कृष्ण की भूमि है

लक्ष्मण भरत सीता कौशल्या कैकेयी दशरथ आदि की धरती है कुछ मूर्खों को मानस के ये भावुक पात्र नहीं दिखाई देते और वे उस ग्रंथ में दोष खोजते हैं 


आइये चलते हैं 

समाज सेवक गोस्वामी तुलसीदास द्वारा हमारे मार्गदर्शन के लिये रचित उसी सर्वसुलभ रामचरित मानस 

के लंका कांड में


सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ॥

सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला॥4॥


विभीषण को अब भोगमय लंका से लगाव नहीं रहा इसलिये वह अयोध्या जाना चाहता है भगवान् राम उन्हें उनके कर्तव्य की याद दिलाते हैं

और यह भी कहते हैं

भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥116 क॥

भगवान् अत्यन्त भावुक हो जाते हैं

इसे आत्मीयता लगाव प्रेम कहते हैं जिसकी कमी के कारण अब हमारे परिवार बिखर गये हैं 


तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि।

देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि॥116 ख

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने डी ए- वी  कालेज का नाम क्यों लिया जानने के लिये सुनें

31.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 31 -01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 Llप्रस्तुत है गर्ह्यवादिन् -रिपु ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 31 -01- 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  *551 वां* सार -संक्षेप

1 गर्ह्यवादिन् =दुर्वचन बोलने वाला व्यक्ति



जब मनुष्य  रुचियां विकसित कर लेता है और उनमें रत हो जाता है तो सांसारिक प्रपंचों में उलझने के बाद भी ऊबता  नहीं है संसारेतर चिन्तन भी एक रुचि है


कविं पुराणमनुशासितार


मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।


सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप


मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।8.9।।

ऐसा पुरुष अन्त समय में बिना विचलित हुए  योगशक्ति से भृकुटी के बीच में प्राणों को अच्छी तरह से प्रविष्ट करके उस परम दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है।रचनाकार अद्भुत है विकृत मनुष्य पशु से भी बदतर हो जाता है स्वार्थ के सागर में परमार्थ का चिन्तन भगवान् की ही कृपा है 


आनन्द देने वाले  संसारेतर चिन्तन के लिये ही हम इन सदाचार संप्रेषणों को सुनने की प्रतीक्षा करते हैं और इन्हीं संप्रेषणों के कारण हम अपनी समस्याओं का निदान खोज पाते हैं राष्ट्रोन्मुखी जीवन जीने के मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं खाद्य अखाद्य का निर्धारण कर पाते हैं साधन साधना में क्या महत्त्वपूर्ण है इसे जान पाते हैं हमें शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की महत्ता समझ में आती है

आइये चलते हैं लंका कांड में


सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी॥7॥


तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद।

सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद॥108॥


आचार्य जी ने दुर्बाद की व्याख्या करते हुए बताया कि 

राम के दो रूप हैं 

राजा राम त्यागी तपस्वी संयमी संगठनकर्ता सिद्धान्तवादी वीर पराक्रमी हैं

और परमात्मा राम आत्मस्थ है आत्मज्ञ हैं रावण भी मरकर उनमें समाहित हो जाता है

तासु तेज समान प्रभु आनन।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिये सुनें

29.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 29 -01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।

किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़॥ 30(ख)॥


प्रस्तुत है गीर्पति ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 29 -01- 2023 का  सदाचार संप्रेषण


(मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥

सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥3॥

कीरति =कीर्ति, भूति =ऐश्वर्य)

 

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  *549 वां* सार -संक्षेप

¹ विद्वान् पुरुष (गीष्पति भी )


इन संप्रेषणों को सुनते समय हम संसारेतर भाव में रहते हैं



ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।


निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।5.3।।


किसी से द्वेष न रखने वाला और न किसी की आकांक्षा करने वाला पुरुष  सदैव संन्यासी ही समझा जाये क्योंकि  द्वन्द्वों से दूर पुरुष बड़ी आसानी से बन्धन मुक्त हो जाता है।।

एक सहज अवस्था लगती है कि कर्म फल की न इच्छा की जाये न कर्म फल से घृणा की जाये

लेकिन है कठिन


सुख-दुख के इक परे परम सुख तेहि में रहा समाई


उलझनों में हमें गीता मानस का सहारा लेना चाहिये हम लेखन -योग भी कर सकते हैं

अपने उद्देश्य को बड़े से बड़ा बनायें राम राज्य की परिकल्पना करें और उसके लिये सन्नद्ध हों भावों को गहरा रखें प्रतिभा निखारें 


पावन मेरा देश भावन मेरा देश

( *अपने दर्द मैं दुलरा रहा हूं*  से, प्रथम कविता ) को उद्धृत करते हुए आचार्य जी कहते हैं कि हम अपने अस्तित्व की अनुभूति करते हुए अपनी मेधा जाग्रत करें 

हम राष्ट्र की सेवा में रत हों

और अनुवर्तन प्रत्यावर्तन पर विचार करें


किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं।

हमारी जन्मभूमि थी यही, कहीं से हम आए थे नहीं।

..

वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य संतान।

जिएँ तो सदा उसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष।

निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष।


आइये चलते हैं लंका कांड में


नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥30॥

इस तरह ध्यान मग्न मां सीता को हनुमान जी विजय की सूचना दे देते हैं

सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा॥

मां सीता को समझ में नहीं आ रहा कि हनुमान जी को इस उत्तम समाचार के लिये क्या दें

निस्पृह वैरागी हनुमान जी को तो आत्मीयता श्रद्धा विश्वास प्रेम ही चाहिये


सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं।

रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥



हनुमान जी तो भगवान् राम की और सेवा करना चाहते हैं

भगवान् राम जब अपनी मानव लीला बन्द करना चाहते हैं तो भी मातृभूमि अयोध्या सूनी न रहे हनुमान जी को रुकने का आदेश देते हैं

आज भी, में वो विराजमान हैं

28.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 28 -01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो॥4॥


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।


अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्।।4.7।।



प्रस्तुत है चामीकरप्रख्य   आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 28 -01- 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  *548 वां* सार -संक्षेप


ये सदाचार संप्रेषण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं इनको सुनने के लिये हमें अपने समय का समायोजन अवश्य करना चाहिये क्यों कि ये हमें सात्विकता की ओर उन्मुख करते हैं 


श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।

किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़॥ 30(ख)॥

उपासना और उपास्य की लीला अद्भुत है

रामकथा हमें आनन्द तो देती ही है यह परिस्थितियों के आने पर शौर्य शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये भी है


निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥



हम कितने भी ज्ञानी हों लेकिन संसार का गुढ़ रहस्य समझना बहुत कठिन है

जब हम उस तत्त्व को जान लेते हैं तो


अंश आत्मा अंशी परमात्मा में लीन होकर अपना अस्तित्व मिटा देता है


*हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।* 


*बूँद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥*

 अद्भुत है इस संसार का स्वरूप और स्वभाव


आइये चलते हैं लंका कांड में

भगवान् राम ने सहायता करने के लिये सभी को धन्यवाद दिया तो पूरा सैन्य समूह भावमय हो गया भावुकता जितनी अधिक प्रवेश करती है उसमें उतनी शक्ति और भक्ति भी प्रविष्ट हो जाती है


पुनि प्रभु


(जिन्होंने पहले भी कहा था 

कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥4॥)


 बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥

समाचार जानकिहि

(लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥30॥)


 सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥

आचार्य जी ने इस प्रसंग की विस्तृत व्याख्या की 

ऋषि द्रष्टा वाल्मीकि जी ने  भी इस प्रसंग का उल्लेख किया है


वैराग्य के प्रतीक हनुमान जी ही भगवान् राम में ध्यानस्थ सीता जी का ध्यान हटा सकते हैं



तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरीं निसाचर धाए॥

बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही॥


हनुमान जी ने दूर से प्रणाम किया

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज भैया प्रदीप का  नाम क्यों लिया जानने के लिये सुनें

23.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 23 -01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं।

सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं॥2॥



प्रस्तुत है  अतिशयन¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 23 -01- 2023

राष्ट्रीय पराक्रम दिवस



( हम शक्ति शौर्य संकल्प पराक्रम से अभिमंत्रित हों, 

आवेग अपार धार कर  अपने आप नियंत्रित हों। )


 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  543 वां सार -संक्षेप


¹प्रमुख


इन सदाचार संप्रेषणों के आशय को विस्तार से समझकर अपने जीवन के व्यवहार में संपादित करने का हम लोग लक्ष्य बनायें

हम लोग राष्ट्रार्पित विचारों   (जिसमें एक विचार, अखंड भारत का अस्तित्व हो, है) ,सनातन धर्मी विचारों(

अच्छी तरह आचरण में लाये हुए परधर्म से गुणों की कमी वाला अपना धर्म ही श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और  परधर्म भय को देने वाला है।

हम रामात्मक लोगों के समाज में अनुशासन है जब कि जिस समाज में रावणत्व का प्रवेश है वहां अनुशासन नहीं दिखता )



 को स्वयं पल्लवित करते हुए नई पीढ़ी को इससे अवगत करायें

हमारा चिन्तन राष्ट्रोन्मुखी  और सदाचार से सम्मिश्रित रहे आचार्य जी का यही प्रयास रहता है

गीता में 

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।


निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।।3.30।।


ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।


श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः।।3.31।।


सारे कर्मों का मुझ में संन्यास करके,  आशा और ममता से रहित और  संताप रहित हुए तुम युद्ध करो


मेरे इस मत का जो व्यक्ति दोष-दृष्टि से रहित होकर श्रद्धापूर्वक (    श्रद्धावान् लभते ज्ञानं ) सदा अनुसरण करते हैं, वे  कर्मों के बन्धन से  छूट जाते हैं


लंका कांड में 

रावण, जिसके रावणत्व ने संपूर्ण संसार को परेशान कर रखा था,जब मरता है



तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन॥

जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा॥


भारतवर्ष की भूमि भक्ति विचार आर्ष परम्परा हमें इस बात को समझने में सहायता प्रदान करती है कि यह संसार वास्तव में अद्भुत है सांसारिक बल काम नहीं देता

भारतवर्ष की भूमि राम रावण का युद्ध है 

उसी रावण की पत्नी मन्दोदरी, जिसमें रामत्व का प्रवेश है,कहती है


भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं॥



राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा॥



काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना॥

मन्दोदरी का ज्ञान जाग्रत है वो भगवान् को कोस नहीं रहीं


इसी सकारात्मक वैशिष्ट्य के कारण मन्दोदरी चर्चित हैं

इसके अतिरिक्त भैया रामेन्द्र जी और भैया पवन जी कल कहां गये थे जानने के लिये सुनें

22.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 22 -01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः।


ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।4.19।।



प्रस्तुत है  अधिश्री ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 22 -01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  542 वां सार -संक्षेप


¹ऊंची प्रतिष्ठा वाला


श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं।

सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं॥2॥


भगवान् श्रीराम और रावण के बीच युद्ध का चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद एवं कवि अनेक कल्पों तक गाते रहें तब भी उसका पार नहीं पा सकते


सत् प्रवृत्तियों और दुष्प्रवृत्तियों में संघर्ष आज भी चल रहा है अशान्ति अनिश्चय का बोलबाला है

हमारे अतुलनीय साहित्य के चर्चित चर्वित और वर्णित विषयों का अध्ययन कर इन सदाचार संप्रेषणों के माध्यम से आचार्य जी हमें सन्मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करते हैं ताकि अशान्ति में रहते हुए भी हम शान्ति की अनुभूति कर सकें,  अनिश्चय के वातावरण में भी निश्चय का संकल्प कर सकें,आजीवन हमारे कामना से रहित प्रयास हों जैसे भगवान् राम सब कर्म करते हैं लेकिन उनमें लिप्त नहीं होते (यह भी रामत्व है ),हम सद्ग्रन्थों में रुचि लें, गहनता का अनुभव करें, समस्याओं का हल स्वयं निकाल सकें, हम मनुष्यत्व की अनुभूति कर सकें और हम


निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥


भगवान् राम की तरह प्रण लें

और


खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।

रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ 102॥

हम प्रवेश कर चुके हैं लंका कांड में

रावण की नाभि में अमृत था उसको सोखने का समय आ गया था

(राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा॥)


सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥

लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥

अद्भुत है प्रभु की लीला


रावण मारा गया तमस विलीन हो गया यही संसार का तत्वबोध है


पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी॥

जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आईं

17.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 17-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।


मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।4.11।।



हे पार्थ ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य  मेरे मार्ग का अनुकरण करते हैं।



प्रस्तुत है चिरजीवी हनुमान जी की कृपा से धीरचेतस् ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 17-01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  *537 वां* सार -संक्षेप


¹ साहसी


यह संप्रेषण हमारा मार्गदर्शन करता है ताकि समस्याएं आने पर हम घबराएं नहीं और उनका डटकर सामना करें हम मनुष्यत्व की अनुभूति कर सकें 

यह सत्य है कि


काव्य शास्त्र विनोदेन, कालो गच्छति धीमताम्।

व्यसनेन च मूर्खाणां, निद्रयाकलहेन वा। ।


मनुष्य का अपनापन जब विस्तार ले लेता है जो पूरी वसुधा को ही अपना कुटुम्ब मानता है तो यह अपनापन उसे मनुष्यत्व की अनुभूति कराने लगता है


संस्कार युक्त विचार  व्यवहार 

भारतवर्ष का वैशिष्ट्य है उसका आत्मस्वरूप है


उसकी 

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः


समुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति।

की तरह की क्षमता जब तक उसकी रही समृद्ध रूप से वह वसुधैव कुटुम्बकम् के स्वरूप को संसार के सामने प्रस्तुत कर सका


लेकिन जब जब उसका सत् स्वरूप विकृत हुआ यानि

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

तब तब

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्।

।


और फिर उसका सत् स्वरूप संसार के सामने प्रकट हो जाता है

अद्भुत प्रतिभासम्पन्न तुलसीदास जी की रामकथा भारतवर्ष की आत्माभिव्यक्ति है

एक उदाहरण 

माल्यवान रावण को पहले विकृत करता है फिर सुधारता है

गौर करें तो ऐसी परिस्थितियां हमारे सामने भी आती हैं

रामकथा तब भी चल रही थी आज भी चल रही है 

मनुष्य रूप में लीला करने वाले भगवान् राम में सरलता शौर्य  

शक्ति तत्व भक्ति भाव विचार आदि सब कुछ है

आइये उस रामत्व को धारण कर, जो रावण को पराजित करेगा ही, चलते हैं लंका कांड में



अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें॥

सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल॥3॥


देवताओं को प्रभु राम की स्तुति करते हुए देख  रावण ने सोचा, मैं इनकी समझ में एक हो गया, किंतु इन्हें यह पता ही नहीं कि इनके लिए मैं एक ही बहुत हूँ और कहा- अरे मूर्खों! तुम तो सदा मेरी मार खाने वाले हो। ऐसा कहकर वह देवताओं की ओर दौड़ा


आज से तुलना करें भीड़ आज इनके पीछे कल उनके पीछे

जैसे देवता कभी रावण की स्तुति कर रहे हैं कभी राम की

हमें भीड़ नहीं संगठन बनाना है



देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो॥4॥

देवताओं की व्याकुलता देख शक्ति के साथ सौम्य स्वभाव रखने वाले अंगद ने रावण को पटका और राम जी की शरण में चले गये


YouTube (https://youtu.be/YzZRHAHbK1w)

9.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 09-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य।

राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य॥ 84॥




प्रस्तुत है चिरजीवी हनुमान जी की प्रेरणा से सुचक्षुस् ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 09-01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  *529 वां* सार -संक्षेप


¹ विवेकशील व्यक्ति


जो अपने साथ चार कदम भी चले हैं हमें अपने मन में उनकी स्मृति रखनी ही चाहिये

इन सदाचार संप्रेषणों से प्रेरणा लेकर हम लोग समाज के विकारों से मुक्त होने का प्रयास करते हैं और सत्कर्मों में लगने के लिये तत्पर होते हैं 


निष्ठा से अपने काम में लगे

 यश संपदा सुख की चाह न रखने वाले लेकिन प्रेम आत्मीयता  विश्वास के भूखे अपने राम स्वारथ जी कल प्रातः पांच बजे स्वर्ग सिधार गए। 

परमेश्वर के लीला-मंच का एक और पात्र अपना अभिनय पूरा कर  मंच से उतर गया।

हाल में हम लोग 25 दिसम्बर 2022 को रजत जयन्ती कार्यक्रम में उनसे मिले थे 

परम पिता उस परमार्थी को फिर से अपनाएँ,  आइये हम सब लोग अपनी भावाञ्जलि  अर्पित करें

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

लक्ष्मण जी भी इसी तरह यश सुख संपदा की चाह नहीं रखते थे वे साधना का आनन्द चाहते थे 

आइये चलते हैं लंका कांड में


साधना का आनन्द चाहने वाले 

साधक लक्ष्मण जी को स्वार्थ के यज्ञों में रत रावण की शक्ति लगी है 

अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो॥

कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता॥


भगवान् राम का मार्ग कभी बाधित न हो  भगवान् राम में स्वार्थ देखने वाले लक्ष्मण जी ने सदैव इसका ध्यान रखा है

हमेशा समर्पण का भाव

कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुलमनि जानी॥

जनक की अनुचित वाणी पर उनका दिया गया जवाब अपने भाई राम जी के प्रति उनके समर्पण को दिखाता है


सात्विक शौर्य के उदाहरण भगवान् राम लक्ष्मण जी का मनोबल जगा रहे हैं 

ये शक्ति कुछ भी नहीं


सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला॥

6.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 06-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 मिलते रहो जुड़ते रहो मुड़कर न देखो  आपदा। 

संयुत रहो गतियुत रहो लभ शौर्य की शुभ संपदा ।।


प्रस्तुत है सूपसदन ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 06-01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  526 वां सार -संक्षेप


¹ जिसके पास पहुंचना आसान हो


इन सदाचार संप्रेषणों की स्वीकार्यता इस कारण है कि ये संप्रेषण नित्य हमें सदाचरण के मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करते हैं, संगठन के महत्त्व को बताते हैं जब सामान्य सी जंगली असंगठित अनगढ़   जनजातियां संगठित होकर इतना बड़ा काम कर सकती हैं तो हम भी ऐसा ही कर सकते हैं

,संसारी भाव के कारण अशुद्ध हुए हम लोगों को शुद्ध करने का सहज स्वभाव का बनाने का प्रयास करते हैं, ये संसार के सत्य को भांपने नापने अपने अन्दर प्रवेश कराने की कुंजी हैं

ये संप्रेषण शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनिवार्यता बताते हैं, ये रावणत्व से दूर रहने  और रामत्व को धारण करने का उपाय हैं

ये हमारे ऋषियों चिन्तकों विचारकों मनीषियों दार्शनिकों द्वारा बताई गई सुस्पष्ट जीवनशैली को अपनाने का मार्ग हैं

धर्मरथ साथ हो तो बहुत सारे साधनों की आवश्यकता नहीं रहती

हमारा देश ऐसा है जहां समरांगण में भी सद्गुण सुनाए जाते हैं

मार्गदर्शक कृपालु सब प्रकार के अनुशासनों के देवता शौर्य पराक्रम संयम के प्रतीक हनुमान जी हमें नैराश्य से भय से भ्रम से संकटों से बचाते हैं

आइये चलते हैं लंका कांड में


जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥

ऐसे भगवान राम के समझाने पर भ्रमित 

विभीषण को अब समझ में आ गया है


सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।

एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥80 ख


हनुमान जी के माध्यम से राम तक पहुंचने वाले,हनुमान जी के भक्त , कलियुग के वाल्मीकि तुलसीदास जी ने युद्ध का अद्भुत स्वरूप प्रस्तुत किया है

उधर रावण तो इधर अंगद और हनुमान जी हैं

हनुमान जी रावण से 

कंपत अकंपन, सुखाय अतिकाय काय, कुंभऊकरन

 आदि से किस प्रकार जूझ रहे हैं कवितावली में इसका बहुत सुन्दर वर्णन है


बार-बार सेवक-सराहना करत रामु, 'तुलसी' सराहै रीति साहेब सुजानकी।

लाँबी लूम लसत, लपेटि पटकत भट, देखौ देखौ, लखन! लरनि हनुमानकी॥

5.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 05-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है मीमांसक ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 05-01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  525 वां सार -संक्षेप


¹ अनुसंधानकर्ता



भावना के साथ की गई प्रार्थना में बल की वृद्धि हो जाती है अपनी भारतीय संस्कृति के  संस्कारों को नई पीढ़ी को संप्रेषित करना हमारा धर्म है

हम भावुक और भावक व्यक्तियों को दिये जा रहे ये संप्रेषण बिना हेतु के नहीं हैं


धरती पर चल रहे भोग काम विकारों पर हमारी पैनी दृष्टि रहे उनसे हम स्वयं तो बचते ही रहें उन पर नियन्त्रण भी रखें

बेचारगी घातक है


संयम नियम ध्यान धारणा प्राणायाम अनिवार्य इसीलिये बताये गये हैं ताकि प्राणों की शक्ति शिथिल न हो और शरीर बोझ न लगे

यम नियम ध्यान धारणा आदि को हमारी शिक्षा से दूर कर दिया गया और वह भोगमयी शिक्षा से बदल दी गई

ऐसी शिक्षा को बदलने के लिये हमें आगे आना होगा 


आइये चलते हैं लंका कांड के

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥

ऐसे 

 धर्मरथ  वाले प्रसंग में


महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥80 क॥


हे धीरबुद्धि वाले सखा!

सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार रूपी   रिपु , क्योंकि हम सार हैं तत्व हैं संसार नहीं, को भी जीत सकता है

 रावण, जिसकी साधना साधनों के लिये थी,

 पर विजय तो बहुत आसान है


मरणशील शरीर धारण किया है तो  कोई व्यक्ति अमर कैसे हो सकता है


यदि व्यक्ति अपने को अजेय (अमर )समझेगा तो सामान्य मनुष्य तो घबराने लगेगा


जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी l


करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥



भगवान् राम भी मनुष्य के रूप में आये और उन्होंने रामत्व की अनुभूति करने वाले वनवासी गिरिवासी आदि को संगठित करके अपने को अमर समझने वाले निशाचरों से धरती को मुक्त करने का संकल्प किया


आचार्य जी ने सदाचरण के अंगों का वर्णन करते हुए कथा को आगे बढ़ाया



सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।

एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥80 ख


इस धर्मरथ के वर्णन से,रावण के अन्त के बाद लंका में रावणत्व प्रवेश नहीं कर पायेगा, यह विभीषण को सुनिश्चित हो गया



भगवान् राम के पास दुविधाग्रस्त देवताओं ने मातलि सारथि के साथ स्वर्णिम दिव्य रथ को भेजा था

जब कि भगवान राम को तो धर्मरथ पर विश्वास था



युद्ध का वर्णन करते हुए आचार्य जी ने बताया कि रावण पहले दिन का रण हार जाता है

4.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 04-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् | उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् |l 



प्रस्तुत है महारम्भ ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 04-01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  524 वां सार -संक्षेप


¹ बड़े बड़े कार्यों को हाथ में लेने वाला



ये सदाचार संप्रेषण हमारे अन्दर की सुप्त शक्तियों को जाग्रत करने का प्रयास, भक्ति व भाव की शक्ति को समझने की चेष्टा और उसी शक्ति से अपने सामने आ रही समस्याओं को सुलझाने का उपाय और आज भी बहुआयामी बहुत से दर्शनों को अपनाने वाले धर्म के विस्तार विश्वात्मा भारत की रक्षा में सन्नद्ध महारम्भ  हनुमान जी के कार्यों का विस्तार है उन्हीं की कृपा, छाया,योजना है, भारत मां की सेवा में हम जुटें उसका launchpad हैं 



स्वयं के काम पर ईमान रखना देशसेवा है, 

कि अपने धर्म का सम्मान रखना देशसेवा है, 

सदा सद्भाव से सहयोग करना देशसेवा है, 

पड़ोसी से मधुर संबंध रखना देशसेवा है, 

प्रकृति से प्रेम करना भी अनोखी देशसेवा है, 

मितव्ययिता सरलता और शुचिता देशसेवा है, 

सहज अक्रोध धीरज और मुदिता देश सेवा है

सुसंगति और सेवा भावना भी देशसेवा है।




डा हेडगेवार  भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रारम्भ करने के बाद शुरुआती दिनों में हनुमान जी की मूर्ति के सामने भारतभक्ति आदि की प्रतिज्ञा करवाते थे

आजकल लंका कांड में धर्मरथ का प्रसंग चल रहा है



आचार्य जी ने मानस -पीयूष की चर्चा की

महात्मा श्री अंजनी नन्दन जी शरण  द्वारा सम्पादित "मानस-पीयूष" श्रीरामचरितमानस की सबसे बृहत् टीका है। यह  ग्रन्थ अनेक  रामायणियों,चिन्तकों,विचारकों,  कथावाचकों की व्याख्याओं का एक  उत्कृष्ट संग्रह है।


जिनका भाव सुदृढ़ होता है उनके अन्दर का विश्वास भी सुनिश्चित हो जाता है यहां विभीषण भ्रमित हैं तभी कहते हैं


नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥



उस भ्रम को दूर करने के लिये प्रभु राम कहते हैं वह रथ तो दूसरा ही है जिससे विजयश्री मिलेगी


परमात्मा का भजन आवश्यक है राम राम कहने से भगवान् शिव का भजन होना अद्भुत है


सारथि सुजाना हो जैसे ढीले पहिये को सही करने वाली नीतिकुशल त्यागमयी नारी कैकेयी थीं रथी दशरथ के लिये

 आचार्य जी ने बर बिग्यान बिरति चर्म संतोष कृपाना आदि की व्याख्या की

इतनी चीजों को रखने वाला सारे शत्रुओं को जीत लेगा

3.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 03-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 रसौ वै सः



प्रस्तुत है महेच्छ ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 03-01- 2023 

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  523 वां सार -संक्षेप


¹ महत्त्वाकांक्षी


शरीर मन बुद्धि का सामञ्जस्य मनुष्य है और यदि मनुष्य को मनुष्यत्व अर्थात् आत्मबोध की अनुभूति होती रहे तो इसे परमात्मा की बड़ी कृपा समझना चाहिये


आत्मबोध डगमगाने पर मनुष्य को परमात्मा की शरण ही दिखाई देती है


ऐसा मनुष्य आर्त भक्त है

ऐसे आर्त भक्त की पुकार को व्यक्त करती कुछ अपनी रचित पंक्तियां आचार्य जी ने सुनाईं


हे जगत पिता हे जगदीश्वर संसार समन्दर पार करो....


....


तुम ही सर्जक विश्वंभर हो


सर्जन पक्ष और विश्वंभरत्व  ये दोनों जब आत्मस्थ हो जाते हैं तो वह कहता है 

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्


लेकिन यह कठिन अवस्था है

फिर भी मनुष्यत्व यही है कि इसका हम चिन्तन विचार अवश्य करें यह निराशा नहीं है

हमारा विश्व का भरण करने वाले जगत पिता परमेश्वर के प्रति अनुरक्ति को दर्शाने वाला कर्म है

उत्कर्ष पर पहुंचने वाली अनुरक्ति भक्ति है


भक्त हनुमान जी ने भगवान् राम को जब पहचान लिया तो उनके ज्ञान के नेत्र खुल गये थे


और फिर उन्हें भय भ्रम निराशा नहीं हुई


हनुमान जी चिरजीवी हैं


 भारतवर्ष इसी कारण बचा हुआ है



समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी के समय हनुमान जी की उपासना का आदेश दिया था

 मारीशस गये व्यक्ति मानस का गुटका साथ ले गये थे


हम आर्त भाव से जब हनुमान जी के चरणों में समर्पित होते हैं तो वे कृपा करेंगे ही


आइये चलते हैं लंका कांड में


सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥

ऐसा है धर्मरथ  मनुष्य का जीवन रथ

आत्मबल का प्रयोग उपयोग दोनों हो

परोपकार सर्वकल्याणकारी है


ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥4॥


ईश्वर का भजन ही  चतुर सारथी है। भाव रम जाये वह भजन है

यह भजन गुरुगोविन्द सिंह चन्द्रशेखर आजाद भगत सिंह ने भी किया है

ये शौर्य प्रमण्डित अध्यात्म के उदाहरण हैं

2.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 02-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है उरुकीर्ति ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 02-01- 2023 

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  522 वां सार -संक्षेप


¹ प्रख्यात


सांसारिक प्रपंचों में ही हम उलझकर न रह जायें इसलिये

बुद्धि के पांच भागों में सबसे महत्त्वपूर्ण हमारा विवेक जाग्रत रहे भगवान् से इसकी प्रार्थना करनी चाहिये

हम कभी न अधीर होने वाले संपूज्य लोकोपकारी कल्याणकारी सरल सहज हनुमान जी को अपने भाव विचार क्रिया समर्पित करते चलें 

ऐसे सदाचारमय विचारों का लाभ लेने के लिये आइये शामिल होते हैं इस सदाचार वेला में


लंका कांड में वर्णित धर्मरथ का विषय अत्यन्त गम्भीर है इसे कम शब्दों में समेटना कठिन है यूं तो एक श्लोक वाली रामायण भी उपलब्ध है


विभीषण भय के कारण अधीर हैं अर्जुन भी मोहजनित अधैर्य का शिकार हुए थे


विभीषण समझ रहे हैं साधनों से ही युद्ध जीते जाते हैं

धर्मरथ तो कुछ अलग ही प्रकार का है 

शौर्य और धैर्य उस रथ के दो पहिए हैं।  युद्ध के रथों में दो पहिए ही होते हैं सत्य और शील उसकी मजबूत ध्वजा, पताका हैं। सदा कल्याणकारी सत्य क्रूर नहीं होता तात्विक दृष्टि को सत्य दृष्टि कहते हैं

शील कमजोरी नहीं मृदुता है लेकिन सत्य की आंखें कालनेमि और विभीषण में अंतर करना जानती हैं 


बल, विवेक, दम और परोपकार- ये चार घोड़े हैं

बल आवश्यक है रामत्व आवश्यक है

सत्य मिघ्या जानने का विवेक आवश्यक है

दमन करने की शक्ति भी जरूरी है


आचार्य जी ने परोपकार को भी स्पष्ट किया


 रथ ऐसा है जो क्षमा, दया,समता रूपी लगामों से संयुत है

आचार्य जी ने इसकी व्याख्या में क्या कहा जानने के लिये सुनें

1.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 01-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन। 

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।। (७।१६)



प्रस्तुत है दोषज्ञ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 01-01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  *521 वां* सार -संक्षेप



इन सदाचार वेलाओं का उद्देश्य है कि हमारा आत्मबोध जाग्रत हो हम कौन हैं यह जानें

हमें शौर्य प्रमण्डित अध्यात्म को आत्मसात् करना होगा

शौर्य रहित अध्यात्म के कारण ही हमारी परिस्थितियां ऐसी हुईं

अब न हों यह ध्यान रखना होगा


भक्तों की याचनाओं के कई प्रकार होते हैं जब कि संसारी व्यक्ति की याचना भौतिक ही होती है


जब हम स्वभाववश,परिस्थिति वश संस्कार वश या आत्मबोध के लिये मन्त्र के जाप,पूजन की क्रियाविधि आदि करते हैं तो अन्त में त्रिविध तापों के शमन के लिये कहते हैं

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः


सांसारिक कष्टों की चर्चा और चिन्तन में हम लोग अपना समय व्यतीत कर देते हैं इन सदाचार संप्रेषणों से या अन्य प्रकार से उपलब्ध 

अध्यात्मोन्मुखता का यह अभिप्राय कतई नहीं है कि हम संसार त्याग दें

हमें तो संसारत्व त्यागना है


भक्तों के चार प्रकार हैं

बद्ध, मुमुक्षु, केवली और मुक्त


बद्ध - जो इस जीवन की समस्याओं से बँधा है लेकिन ईश्वरोन्मुख रहता है


मुमुक्षु - जिसमें मुक्ति की चेतना जागृत हो किन्तु उसमें लीन नहीं है

भक्त अथवा केवली - जो मात्र ईश्वर की उपासना में ही लीन हो

मुक्त - जो पूर्णरूपेण ईश्वर में समाविष्ट हो जाते हैं


हम लोग बद्ध भक्त हैं


मानस की यहां चर्चा का


 यही उद्देश्य है  व्यवहार विचार साथ साथ हों

कर्मशीलता जाग्रत करते हुए आइये चलते हैं लंका कांड में


धर्मरथ को समझने का प्रयास करते हैं


रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥

अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥1॥

बद्ध भक्त विभीषण को अपने आश्रय को देखकर मोह हो रहा है जब कि अर्जुन को


आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।


मातुलाः श्चशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा।।1.34।।


 अपनों को देखकर मोह हुआ था


हमारे पास साधन नहीं हैं उसके पास साधन हैं बद्ध भक्त साधनों में उलझ जाता है


तो भगवान राम कहते हैं जिससे विजय होती है वह दूसरा ही रथ है


सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥2॥


सौरज (शौर्य )और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील उसकी मजबूत ध्वजा, पताका हैं। सत्य क्रूर नहीं होता l 

बल, विवेक, दम और परोपकार- ये चार घोड़े हैं, जो क्षमा, दया,समता रूपी डोरी से रथ में संयुत  हैं


ईश्वर प्रेरित व्यवस्था वाले किसी भी काम को नहीं त्यागना यह हमारा उद्देश्य हो


...भीतर से जर्जर हैं ये लोग ये आदर्श स्थापित नहीं कर सकते इसलिये इनका मरना जरूरी है यह भगवान् कृष्ण समझाते हैं अर्जुन को


YouTube (https://youtu.be/YzZRHAHbK1w)

31.12.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 31 दिसंबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥2॥


प्रस्तुत है धिप्सु -द्विषत् *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 31 दिसंबर 2022 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  *520 वां* सार -संक्षेप

*

धोखा देने वालों के शत्रु 

धिप्सु =धोखा देने वाला

द्विषत् = शत्रु


हम सेवाभावी, विश्वासयुक्त, शक्तिसम्पन्न बनें राष्ट्रार्पित जीवन का भाव सदा पुलकित रहे इन सदाचार संप्रेषणों का मूल भाव है



अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् । 

शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥

( महा० वन० ३१३ । ११६)


जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है फिर भी

इससे बड़ा संसार  का आश्चर्य  और क्या हो सकता है कि शेष लोग यहां स्थिर रहना चाहते हैं


इस दुनिया में लोग आते जाते हैं लेकिन अपने निकट का जब कोई जाता है तो व्यथा होती है

लेकिन एक अपरिचित चला जाये तो भी यदि व्यथित कर दे तो..


सौ बरस तपस्या की लेकिन वरदान नहीं कोई माँगा, 

अर्पित कर दिया मातृभू को जीवन-पट का धागा धागा ।

हे जननी, हे माता-ममता, हे सत्यतीर्थ, हे शुभाशीष, 

कर्तव्यमूर्ति, हे अनासक्ति, साकार तपस्या, हे अमीश। 

श्रद्धानत पूरी धरती है पुष्पांजलि देता महाकाश, 

स्तब्ध महोदधि शान्त पवन मंगलमय पुलकित चिदाकाश।


ये हीराबा, जो अपने पुत्र की तपस्या के कारण नहीं अपनी तपस्या के कारण चर्चित हुईं,के चले जाने पर आचार्य जी के व्यक्त उद्गार हैं

यह धरती श्रद्धा विश्वास की धरती है पुण्यभूमि कर्मभूमि धर्मभूमि भावभूमि सर्वस्व है

इस सर्वस्व के  एक अंश के विदा होने पर निकले भाव हैं

आइये चलते हैं मानस में

लंका कांड में आगे 


युद्ध का सिद्धान्त है कि शत्रु की धरती पर जाकर युद्ध करें और विजय प्राप्त करें

प्रभु राम ने भी ऐसा ही किया

रावण जो घमंड में चूर है 

सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई॥

निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा॥


अच्छा  तो यही है वह शत्रु अभी भाग जाए। युद्धरत होकर  पीठ दिखाकर भागने में भलाई नहीं है। मैंने अपनी भुजाओं के बल पर बैर बढ़ाया है  उस शत्रु को मैं  जवाब दूंगा

प्रभु राम ने प्रतिज्ञा की कि ऐसे रावण 

को लंका में जाकर परास्त करना है


रावण मैदान पर आ चुका है

असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुज बल गर्ब बिसाला॥


भगवान् राम जो नंगे पांव हैं से अधिक प्रीति करने वाले विभीषण परेशान हैं


रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥

अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥1॥


इस बलवान से कैसे जीत पायेंगे तो प्रभु कहते हैं


सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥2॥


जिससे जय होती है वह दूसरा ही रथ है यह राम जी का विश्वास है यही रामत्व है

27.12.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 27 दिसंबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।


कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।।9.7।।



प्रस्तुत है आधर्मिक -रिपु *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 27 दिसंबर 2022 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  *516 वां* सार -संक्षेप

*बेईमानों का शत्रु

देवताओं से भी अधिक शक्ति प्राप्त करने में सक्षम और परमात्मा के परिष्कृत अंश मनुष्य से ही संसार आचार विचार विकार संयम नियम ध्यान धारणा व्यवहार संयुत है


मनुष्य कभी अपने को बहुत विचलित कर लेता है और कभी जब उसे सुस्पष्ट रहता है कि


वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव


दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।


अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा


योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।।8.28।।

तो 

विचलनों से बाहर निकलने का मार्ग भी स्वयं ही खोज लेता है

वह भक्ति के आधार पर परमात्माश्रित रहता है यद्यपि किसी को अपना स्थान त्यागना अच्छा नहीं लगता फिर भी संसार रूपी रंगमंच पर  बिना लिप्त हुए सांसारिक कार्यों को अभिनेता की भांति करते हुए वह मुक्त भाव से परमात्मा से पुरस्कृत होता है

लेकिन 

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।


परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।


मूर्ख  मेरे  महान् ईश्वर रूप परम भाव को न जानते हुए मुझे  साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं।


कुछ पाने का भाव लिये भक्ति करने वाले शक्ति के मद में चूर राक्षसी स्वभाव वाले रावण मेघनाद भगवान् राम को साधारण मनुष्य ही मान रहे हैं


लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू॥6॥


दृश्य है

सांसारिक ज्ञानियों के लिये अबूझ रामचरित मानस के 

 लंका कांड में युद्ध का


कुम्भकर्ण मारा जा चुका है

मेघनाद का आगमन हो गया है

मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।

गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥72॥


देवताओं से वरदान प्राप्त मेघनाद का दुस्साहस देखिये

पुनि रघुपति सैं जूझै लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा॥5॥


ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥


लेकिन

चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी॥

*अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी*॥1॥


यह भक्ति है उसे तर्कों से दूर रखना चाहिये


भक्ति के भाव को समझने की चेष्टा करें


मिट्टी में भी भाव देखे जाते हैं

उसकी मूर्ति की पूजा करते हैं


फिर जामवंत ने लंका के द्वार पर मेघनाद को फेंक दिया


इसके अतिरिक्त भैया दीपक शर्मा जी का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया जानने के लिये सुनें

14.12.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 14 दिसंबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला॥

कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू॥


प्रस्तुत है बहुदक्षिण *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 14 दिसंबर 2022 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

  503 वां सार -संक्षेप

* दानशील


स्थान :उन्नाव



भारतीय जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है कि विचार और व्यवहार में सामञ्जस्य बनाने के लिये हम लोग अपने इष्टदेवों से प्रार्थना करते रहते हैं इसका अर्थ पराश्रयता कतई नहीं है इसका वास्तविक अर्थ आत्मानुभूति है जब हम अनुभव करते हैं कि परमात्मा हमारे अन्दर शक्ति बुद्धि विचार भक्ति के रूप में विद्यमान है और जब वह व्यवहार के रूप में प्रकट होने लगते हैं तो वह व्यक्ति चर्चित प्रशंसित होने लगता है  और फिर उसको आत्मसंतोष होता है यही संतोष मनुष्य का प्राप्तव्य भी है लेकिन 

ओछेपन की संतुष्टि से बचें

आइये चलते हैं मानस में जहां 

पक्ष में भगवान् राम और विपक्ष में रावण है


राम रावण का खेल संसार में चलता रहता है

लंका कांड में आगे 


रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज।

पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज॥ 35(क)॥


शत्रु  रावण,जो भोगवादी स्वार्थी असंयमी अविवेकी तामसिक यज्ञ करने वाले चापलूसों से घिरा है, के बल का मर्दन कर अंगद ने हर्षित होकर  भगवान के चरणकमल पकड़ लिए। उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों में  उल्लास का जल भरा है.


और उधर रावण को मंदोदरी फिर समझा रही है


साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।

मंदोदरीं रावनहिं बहुरि कहा समुझाइ॥ 35(ख)॥



हम लोगों के पुत्र को भी मार दिया


रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा॥

जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा॥


नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना॥

बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली॥1॥



स्त्री के बाण के समान वचन सुनकर रावण सुबह होते ही उठकर सभा में चला गया और सारा डर भुलाकर अत्यंत अभिमान में  सिंहासन पर जा बैठा



इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥

अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥2॥



सुबेल पर्वत पर प्रभु श्री राम ने अंगद को बुलाया। उन्होंने आकर चरणों में सिर नवाया। बड़े आदर से उन्हें पास बैठाया


आचार्य जी ने यह भी बताया कि पक्ष और विपक्ष दोनों को देशहित का ध्यान रखना चाहिये

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया दृश्यमुनि चाकमा का नाम क्यों लिया जानने के लिये सुनें

13.12.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 13 दिसंबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा॥


प्रस्तुत है बहुज्ञ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 13 दिसंबर 2022 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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  502वां सार -संक्षेप


आचार्य जी प्रतिदिन हमारा मनोबल उत्थित करने का प्रयास करते हैं


मन तो मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है मन गिरता है तो तन पीछे पीछे चल देता है

दीनदयाल विद्यालय को खोलने का उद्देश्य ही था कि हमारा मनोबल ऊंचा रहे

हम मनुष्यत्व की अनुभूति करें  दीपकत्व की अनुभूति कर प्रकाश फैलाएं 

विद्यालय से ऐसे  अनेक दीनदयाल निकलें जिनका उद्देश्य हो

राष्ट्रनिष्ठा से परिपूर्ण समजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष


यही हमारा व्यवहार होना चाहिये

भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग।

कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥ 34(ख)॥


पौरुष पराक्रम से पूर्ण   सत्  वाले और बहुत सी बिखरी हुई शक्तियों को संगठित करने का भाव रखने वाले संत का मन   बहुत से विघ्न आने पर भी नीति का त्याग नहीं करता


इसी संतत्व को धारण कर भगवान् राम कहते हैं

निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥


वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

शक्ति उपासना युगधर्म है

इसी रामत्व को धारण करने के लिये आइये चलते हैं राम चरित मानस के लंका कांड में


तुलसीदास जी ने राम चरित मानस में कथा के साथ एक उद्देश्य लेकर इतिहास भी संयुत किया है


भाव और कला पक्ष वाले अत्यधिक क्षमता वाले साहित्य की एक अनुपम कृति है मानस


रामत्व के साथ रावणत्व भी अस्तित्व में है रावण समस्या है राम समाधान हैं


जब हम समस्याओं में घिरते हैं तो समाधान खोजते हैं


कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे॥

गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा॥


अंगद का बल देखकर सब हृदय में हार गए। तब अंगद के ललकारने पर रावण खुद उठा।  वह अंगद का पैर पकड़ने लगा, तब  अंगद ने कहा - मेरा पैर पकड़ने से तेरा बचाव नहीं होगा



गहसि न राम चरन सठ जाई॥ सुनत फिरा मन अति सकुचाई॥

भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई॥


सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई॥

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया कि कल भैया उमेश्वर पाण्डेय जी के पिता जी इस संसार में नहीं रहे