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13.11.21

दिनाङ्क 13/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है पूतात्मन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनाङ्क 13/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

युगभारती लखनऊ की कल एक बैठक लखनऊ में है बैठक किसी योजना को विस्तार देने के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था का प्रारम्भ है

हर कार्यों में हर व्यवस्थाओं में विचार होता है पहले भाव उठता है फिर विचार होता है और उसके बाद क्रिया होती है  

दीनदयाल विद्यालय के निर्माण के पीछे उद्देश्य था कि वहां राष्ट्रोन्मुखी विचारोन्मुखी शिक्षा होगी   और ऐसे विद्यार्थी तैयार होंगे जो अपनी घर गृहस्थी चलाने के साथ साथ समाज को संचेतना प्रदान करेंगे

गीता में दूसरे अध्याय में 59 वें से 72 वें छन्द तक पढ़ने की आचार्य जी ने सलाह दी


विषया   विनिवर्तन्ते,

                             निराहारस्य देहिनः।

        रसवर्जं रसोऽप्यस्य,

                             परं दृष्ट्वा निवर्तते।।

                               (गीता 2/59)

           इन्द्रियों द्वारा विषयों को न ग्रहण करने वाले पुरुषों के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं क्यों कि वे ग्रहण ही नहीं करते; किन्तु उन का राग नहीं निवृत्त होता, आसक्ति लगी रहती है। सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों से समेटने वाले निष्काम कर्मी का राग भी 'परं दृष्ट्वा'- परमतत्त्व परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाता है।

हम इस प्रकार की शिक्षा को प्रेरित करते हैं कि हमें एक अच्छी नौकरी मिल जाए

लेकिन हमारे अन्दर यह जिज्ञासा नहीं है कि हमारा दिमाग जो सबसे विशाल कम्प्यूटर है वो किसने बनाया

तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षा वास्तविक शिक्षा है जिसे हम लोगों ने समझने का प्रयास नहीं किया

आचार्य जी ने यह भी बताया जो कल की बैठक में वो बताने वाले हैं

28.10.21

दिनांक 28/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है ब्रह्मवत् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 28/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

आचार्य जी युगभारती लखनऊ के आमन्त्रण पर 14 नवम्बर को  लखनऊ जाएंगे, दीपमिलन पर कानपुर आ सकते हैं,आचार्य जी से कल श्री योगेन्द्र भार्गव जी ने कल वाली परशुराम कथा से संबन्धित कुछ प्रश्न पूछे और उन उत्तरों से वे संतुष्ट हुए

शैक्षिक पाठ्यक्रम में संशोधन की अत्यन्त आवश्यकता है

मूल विषय :

अवतार क्या है उद्धार क्या है संसार की निर्मिति कैसी होती है 

प्रजापतिश्चरति गर्भे अंतरजायमानो बहुधा वि जायते।

तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भवनानि विश्वा ।।               (यजुर्वेद ३१ / १९) का आचार्य जी ने अर्थ बताया

परमात्मा की षोडश कला शक्ति जड़ चेतनात्मक समस्त संसार में व्याप्त है 

 प्राणियों की उत्पत्ति के आधार पर ८४ लाख योनियों को चार प्रकार में वर्गीकृत किया गया।


जरायुज - माता के गर्भ से जन्म लेने वाले मनुष्य, पशु जरायुज कहलाते हैं।

अण्डज - अण्डों से उत्पन्न होने वाले प्राणी अण्डज कहलाये।

स्वेदज - मल, मूत्र, पसीना आदि से उत्पन्न क्षुद्र जन्तु स्वेदज कहलाते हैं।

उद्भिज - पृथ्वी से उत्पन्न प्राणियों को उद्भिज वर्ग में शामिल किया गया। (एक कला का विकास )

पशु में चार कलाएं साधारण मनुष्य में पांच कलाएं होती हैं 

जिन मनुष्यों में पांच से ऊपर आठ तक कलाएं होती हैं वे विभूति कोटि में आते हैं  और आठ से ऊपर वाले अवतार कोटि के अन्तर्गत आते हैं

सब कुछ जानते हुए हमें अपने कर्म का निर्धारण करना चाहिए और उस कर्म में हमारी प्रमाणिकता रहनी चाहिए और उस प्रमाणिकता की हमें पूजा करनी चाहिए l 

इसके अतिरिक्त नकली जहर किसे दिया गया आचार्य जी जब सातवीं कक्षा में थे तो उन्होंने क्या सीखा आदि जानने के लिए सुनें