18.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 18 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३४ वां* सार -संक्षेप

 मैं सत्य सनातन चिन्तन जीवन दर्शन हूं 

संपूर्ण जगत का एकमेव आकर्षण हूं



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 18 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११६

सनातनत्व के अभ्यस्त होने का प्रयास करें हम शरीर नहीं हैं हम तत्त्व हैं यह अनुभव सदैव करते रहें शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति करें 


यदि प्रातःकाल सदाचार से युक्त विचारों और उपदेशों का श्रवण किया जाए, तो हमें पूरे दिन के छल-प्रपंचों और विकारों से बचने की दिशा मिल जाती है। इससे हमारे जीवन का मूल सार सुरक्षित रहता है और कठिन एवं विषम परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति तथा उचित मार्ग प्राप्त होता है। तो आइये इसी उचित मार्ग को प्राप्त करने के लिए प्रवेश करें आज की वेला में


जब हम अपने अवतारों के कार्य व्यवहार का एकाग्र चित्त होकर अवलोकन करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि उन्हें अपने शौर्य पराक्रम  शक्ति का पूर्ण बोध था। उन्हें अपने वास्तविक तत्त्व और स्वरूप की स्पष्ट पहचान थी। उन्हें ज्ञात था कि वे परमात्मा का अंश हैं अंश हैं तो स्वयं परमात्मा ही हैं 

(हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।

बूँद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥)

इसी आत्मबोध और सामर्थ्य की चेतना के कारण वे दुष्ट शक्तियों का विनाश कर सके और धर्म की स्थापना कर सके


जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी।।

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा।।

हमारा राष्ट्र विश्वशान्ति का साधन है,क्योंकि इसके मूल में समरसता, धर्म, न्याय और मानवमात्र के कल्याण की भावना निहित है किन्तु जो शक्तियाँ अधर्म, अत्याचार और विनाश का मार्ग अपना रही हैं उनके विनाश के लिए भी हम सज्ज हैं इसके लिए हम अपनी अंतर्निहित शक्ति को पहचानें और उसे भक्ति, विवेक तथा युक्तिपूर्ण व्यवहार के साथ जोड़कर सज्जित करें, ताकि वह धर्म और राष्ट्रहित के लिए सजग एवं तैयार रह सके।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी भैया पवन जी के किस कार्य की सराहना की बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना     का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

17.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 17 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

 मैं व्यक्ति नहीं अपने कुटुम्ब की थाती हूं 

हर संकट का हल और वज्र की छाती हूं


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 17 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११५


अध्ययन स्वाध्याय में रत हों


जब मनुष्य अंतर्मुख होकर अपनी अंतरात्मा की वाणी को सुनता है, तब उसे यह साक्षात्कार होता है कि उसका वास्तविक स्वरूप केवल यह नश्वर शरीर या सीमित व्यक्तित्व नहीं है। उसे अनुभूति होती है कि मूलतः वह तत्त्व है शक्ति है विश्वास है वह तो अनन्त वैभव है

हम भी इसी तत्त्व शक्ति की अनुभूति करें हम अनुभव करें कि हम अनन्त वैभव हैं और गर्व करें कि हम उस महान् भारतीय सनातनधर्मी समाज की थाती हैं अर्थात् उसकी परम्पराओं, मूल्यों और सांस्कृतिक धरोहर के संवाहक हैं हमारा अस्तित्व व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित नहीं, बल्कि अपने कुटुम्ब रूपी समाज की रक्षा, सेवा और उन्नति से संयुत है।

जब समाज पर संकट आयेगा तब हम समाधान का संकल्प लेकर आगे चलेंगे धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर अडिग रहकर प्रत्येक चुनौती का उत्तर देंगे अधर्म और दुष्ट प्रवृत्तियों के समक्ष हमारा हृदय न भयभीत होगा न विचलित l यह संभव है भावना के समर्पण से  l इसके लिए प्रातः काल का जागरण अनिवार्य है l हम अध्ययन स्वाध्याय संपर्क में रत हों किसी सार्थक विषय को केंद्र में रखकर बैठकें करें

किसी भी क्षेत्र में धनार्जन कर रहे हों अपनी परंपराओं को जानें अपने मूल को जानें l अतीत का ज्ञान हमें उसके सम्मान के लिए सक्षम बनाता है l भविष्य के लिए संकल्प करें l देश दर्शन से अपने देश की विविधता विचित्रता की जानकारी होगी l अतः देश का भ्रमण अवश्य करें l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भाईसाहब के पूर्त कार्य की चर्चा की,उन्नाव विद्यालय के लिए हम क्या कर सकते हैं, भैया पुनीत जी,भैया अमित गुप्त जी,भैया बलराज जी,दादा गुरु, प्रेमानन्द, निर्मल बाबा का उल्लेख क्यों हुआ सोनी जी के किस भाषण की आचार्य जी ने चर्चा की जानने के लिए सुनें l

16.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 16 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३२ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 16 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११४

शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति आवश्यक है उत्साहपूर्वक उत्थित होने की आवश्यकता है

एकांत में बैठकर अंतर्निहित ऊर्जा की अनुभूति करें


जो व्यक्ति इस संसार के सत्य को नियमपूर्वक, तर्क और विवेक के आधार पर भली-भाँति समझ लेता है, वही वास्तव में भारत माता का सच्चा सेवक कहलाने योग्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अंतर्निहित शक्ति का बोध करना आवश्यक है। शारीरिक, मानसिक और नैतिक दुर्बलता राष्ट्र और समाज की प्रगति में बाधक होती है, अतः शक्ति के शैथिल्य से बचकर आत्मबल, साहस और संकल्प को सुदृढ़ बनाए रखना चाहिए।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विराट् रूप इसलिए दिखाया ताकि अर्जुन के मन में उत्पन्न संशय, मोह और भय का पूर्णतः निवारण हो सके तथा वह सत्य, कर्तव्य और परम शक्ति को प्रत्यक्ष रूप में समझ सके। अर्जुन को प्राप्त हुई यह शक्ति की दृष्टि उसके लिए अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुई l


नई पीढ़ी को सत्य का बोध कराने के प्रयास निरंतर किए जा रहे हैं। उनके मन में व्याप्त भय, संशय और भ्रम को दूर करने का कार्य चल रहा है तथा उन्हें यह समझाया जा रहा है कि भारतीय जीवन-दर्शन, उसके विचार और संकल्प न तो समाप्त हुए हैं और न ही लुप्त हुए हैं। वे आज भी जीवंत हैं और हमारे समाज में गहराई से विद्यमान हैं।

भारतीय संस्कृति में जीवन को देखने की एक समग्र और संतुलित दृष्टि है, जो सत्य, कर्तव्य, आत्मबल और समर्पण पर आधारित है।



डा एम. वी. गोविन्दस्वामी जो अखिल भारतीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान (AIIMH) के संस्थापक-निदेशक थे, जिसे बाद में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS), बैंगलोर के रूप में जाना जाने लगा का उल्लेख क्यों हुआ,भारतीय संगीत ऊर्ध्वगामी होने के कारण क्यों महत्त्वपूर्ण है  भैया प्रशान्त बोडस जी भैया संदीप बोडस जी भैया सौरभ राय जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

15.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 15 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 15 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३१ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११३

*मैं चिर युवा हूं* इसकी सदैव अनुभूति करें क्योंकि कर्म (सत्कर्म) के लिए यह अत्यन्त आवश्यक भाव है



राष्ट्रमन्दिर का पुजारी मुक्ति का कामी नहीं हूं...

आचार्य जी सेवा और समर्पण में रत एक ऐसे पुरोहित हैं जो किसी भी स्वार्थ या भेदभाव के बिना राष्ट्र की सेवा समाज की सेवा को ही अपने जीवन का उद्देश्य मानते हैं। जिस प्रकार एक पुजारी मन्दिर में निष्ठा, श्रद्धा और पवित्र भाव से पूजा करता है, उसी प्रकार आचार्य जी राष्ट्र की भलाई, उन्नति और अखण्डता के लिए अपने विचार और कर्म समर्पित करते हैं l 


आचार्य जी कहते हैं वे मुक्ति के कामी नहीं हैं क्योंकि जो मुक्ति प्राप्त कर लेता है उसे इस सृष्टि से कोई प्रयोजन नहीं रहता वह सृष्टि के संचरण से मुक्त रहता है

और आचार्य जी को तो सृष्टि से प्रयोजन है l हमें भी सृष्टि से मतलब रखना चाहिए हमें अपने सनातनधर्मी बन्धुओं के भय और भ्रम का निवारण करना चाहिए और उन्हें आश्वस्त करना चाहिए कि क्रूरता करने वाले दुष्टों को कुचलने के लिए हमारे समीप पर्याप्त शक्ति है अपने लक्ष्य की प्राप्ति में मार्ग में आ रही चमचमाहट से हमें विचलित नहीं होना चाहिए आत्मबल, विश्वास, संकल्प या ईश्वरीय कृपा जो भी जीवन-मार्ग में आवश्यक  ऊर्जा है वह हमारे भीतर विद्यमान है इसको हमेशा अनुभव करते रहें l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया कि संसार के जंजालों से दूर आत्मानन्द में विचरण करने के लिए लेखन,जो एक अत्यन्त प्रभावशाली साधन है, अवश्य करें क्योंकि लेखन न केवल विचारों को स्पष्ट करता है, बल्कि वह अन्तर्मन के द्वार खोलकर आत्मा के स्पर्श का अवसर देता है। जब हम अपने विचारों, अनुभूतियों और भावनाओं को शब्दों में रूपान्तरित करते हैं, तब भीतर का बोझ हल्का होता है और मन शान्ति की ओर अग्रसर होता है। यही शान्ति, आत्मानन्द का द्वार है।

कल त्रयोदशा कार्यक्रम सम्पन्न हुआ जिसमें १९७५ बैच से भैया शशि शर्मा जी भैया राजेश मल्होत्रा जी भैया विनय अजमानी जी १९७६ से भैया सुनील जैन जी भैया बलराज पासी जी १९७८ से भैया अरविन्द तिवारी जी १९८२ से भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी भैया मलय चतुर्वेदी जी १९८३ से भैया अतुल मिश्र और प्रवीण अग्रवाल १९८४ से भैया आलोक जी, भैया प्रदीप त्रिपाठी जी भैया मनोज अवस्थी जी १९८५ से भैया समीर राय जी भैया अरुण जी भैया पुनीत श्रीवास्तव जी १९८६ से भैया मोहन कृष्ण जी १९८८ से भैया विनीत मेहरोत्रा जी, भैया तरुण सक्सेना जी, भैया आलोक सांवल जी,  भैया जय सिंह जी, भैया नरेंद्र सिंह जी,  भैया मनीष कृष्णा जी

१९८९ से भैया अमित गुप्त जी बैच १९९२ से भैया रत्नेश तिवारी जी

१९९६ से भैया पवन जी, भैया रामेंद्र जी २००१ से भैया संदीप जी उपस्थित रहे

भैया डा नरेन्द्र जी,भैया विभास जी, भैया दुर्गेश जी, श्री मुकेश जी श्री हरमेश जी आदि भी उपस्थित थे

14.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 14 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 14 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३० वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११२

अपने भीतर छिपी दिव्य शक्तियों को पहचानें


विश्वास मनुष्य के भीतर छिपी हुई वह दिव्य शक्ति है जो उसे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी डगमगाने नहीं देती। यह आत्मबल का स्रोत है, जो जीवन में आगे बढ़ने, संघर्ष करने और लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता करता है। परंतु यह विश्वास स्वतः स्थिर नहीं होता, इसे नियमित अभ्यास, आत्मचिंतन, सत्संग, अध्ययन और सकारात्मक अनुभवों के माध्यम से सशक्त बनाना पड़ता है। श्री रामचरित मानस का अध्ययन विश्वास को सुस्थिर करने का एक उत्तम उपाय है विषम परिस्थितियों में इसे रचकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने हम सनातनधर्मियों में विश्वास का संचार किया हमें शक्ति की अनुभूति कराई हमें संगठित होना सिखाया प्रेम का अखंड व्रती बनाया अन्यथा भय भ्रम लालच लोभ से हम लोगों का विश्वास डगमगा रहा था और हम धर्म परिवर्तन के लिए विवश हो रहे थे

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥

अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥1॥

नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥




रावण को रथ पर और भगवान् राम को बिना रथ के देखकर भगवान् राम के भक्त विभीषण सशंकित हो गए क्योंकि विचारों के प्रति वे समर्पित नहीं थे उनमें विकार भरे हुए थे

भगवान् राम उनके भ्रम का निवारण करते हुए कहते हैं 

सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥2॥

 वीरता और धैर्य उस रथ के पहिए हैं, सत्य और शील (सदाचार) उसकी ध्वजा और पताका हैं। शक्ति, विवेक, इंद्रियनिग्रह और परोपकार उसके चार घोड़े हैं, जो आत्मनियंत्रण और जनकल्याण के प्रतीक हैं। क्षमा, कृपा और समता वे रस्सियाँ हैं, जिनसे घोड़े जुड़े हैं।


ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है l

( यह रथ एक आदर्श जीवन जीने की दिशा दिखाता है—जिस पर आरूढ़ होकर मनुष्य जीवन की कठिनाइयों को पार कर सकता है और धर्म का पालन करते हुए सफलता प्राप्त कर सकता है।)

आज भी विषम परिस्थितियां हैं हमें इस ओर चिन्तन करना चाहिए और  अपनी क्षमताओं की अनुभूति कर कर्मरत होना चाहिए


जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे आचार्य जी श्री ओम शंकर त्रिपाठी जी के अग्रज भाईसाहब  श्री राम शंकर त्रिपाठी जी ३ जनवरी को ब्रह्मलीन हो गए थे आज उनका त्रयोदशा कार्यक्रम है l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने ट्रम्प का उल्लेख क्यों किया भारतभ्रमण क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें