9.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७५ वां* सार -संक्षेप

 फूटी स्मिति सीता-ध्यान-लीन राम के अधर,

फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आई भर,


वे आए याद दिव्य शर अगणित मंत्रपूत,—

फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,....


मां सीता की स्मृति भगवान् श्रीराम के लिए प्रेरणा और शक्ति का स्रोत बनती है। क्षणभर पहले जो मन निराशा और चिन्ता से घिरा था, वह पुनः उत्साह, आत्मविश्वास और विजय-संकल्प से भर उठता है। दिव्य बाणों का स्मरण उनके पराक्रम और युद्ध-सामर्थ्य के पुनर्जागरण का प्रतीक है।

(*राम की शक्ति -पूजा*  से )


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५७

मानस एक ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जो हमें मार्गदर्शन देता है इसके आधार पर हम भावी योजनाएं बनाएं l उनमें हम निश्चित रूप से सफल होंगे क्योंकि हनुमान जी हमारे साथ हैं l



आजकल हम लोग कल्याणार्थ सुन्दर कांड के पाठ में प्रविष्ट हैं 


मनुष्यत्व के अनुभव में पारंगत भगवान् श्रीराम समुद्र पार कर लंका पहुँचने के उपाय पर विचार कर रहे हैं। वे सुग्रीव और विभीषण से परामर्श लेकर यह आदर्श प्रस्तुत करते हैं कि बुद्धिमान और महान् व्यक्ति भी महत्त्वपूर्ण कार्यों में अपने सहयोगियों के परामर्श का सम्मान करते हैं। साथ ही, समुद्र की विशालता और दुर्गमता  आगामी चुनौती की गंभीरता को प्रकट कर रही है।


विभीषण ने समुद्र से मार्ग माँगने का उचित उपाय बताया। लक्ष्मण जी,

(जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते) ऐसे कि जो संसार में जितने भी राक्षस हैं, उन सबको एक पल  में नष्ट कर सकते हैं,को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा कि आपके बाण करोड़ों समुद्रों को भी सुखाने की शक्ति रखते हैं  तो समुद्र से याचना करने की आवश्यकता नहीं है l

किन्तु मर्यादा और नीति यही कहती है कि पहले विनम्रता और उचित उपाय का आश्रय लिया जाए। इसलिए  भगवान् श्रीराम समुद्र के तट पर जाकर उसका सम्मान करते हुए मार्ग देने की प्रार्थना करने लगे।

कथा में आगे शुक और सारण का उल्लेख हुआ है l 

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।

सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥52॥

लक्ष्मणजी ने दूतों से कहा

 उस मूर्ख रावण से मेरा यह उदार और हितकारी सन्देश स्पष्ट शब्दों में कह देना कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटा दे और आकर  मैत्री स्थापित कर ले। यदि वह ऐसा नहीं करेगा, तो समझ ले कि उसका विनाशकाल निकट आ पहुँचा है।



इसके अतिरिक्त गुप्तसार संग्रह का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने बताया कि कुश के आसन पर बैठने से ज्ञान की वृद्धि होती है (यह ऊर्जा के क्षय को रोकता है। इस पर बैठकर पूजा, ध्यान या जप करने से अर्जित ऊर्जा धरती में नहीं जाती। यह मन की एकाग्रता बढ़ाता है और कामनाओं की तत्काल पूर्ति में सहायक होता है )l

भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

8.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७४ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५६

आगामी अधिवेशन की सफलता के लिए हम सभी मनोयोगपूर्वक जुट जाएँ। पूर्ण समर्पण, उत्साह और उत्तरदायित्व-बोध के साथ संगठित होकर कार्य करें। हमारी एकता, अनुशासन और सामूहिक पुरुषार्थ ही अधिवेशन को सफल, गरिमामय और उद्देश्यपूर्ण बनाएँगे l




शिक्षक नौकर नहीं होता है , वह समाज का संस्कारदाता और राष्ट्र का निर्माता होता है। नौकरी करना अपेक्षाकृत सरल है, किन्तु शिक्षक होना अत्यन्त दुष्कर उत्तरदायित्व है। जिस व्यक्ति में जी३वनपर्यन्त शिक्षकत्व का बोध, कर्तव्यनिष्ठा और लोकमंगल की भावना बनी रहती है, वही वास्तव में भारतराष्ट्र के कल्याण का महान साधक बनता है। उसके द्वारा प्रदान किए गए संस्कार पीढ़ियों का निर्माण करते हैं और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला रखते हैं।

शिक्षक अपने शिष्य को पुत्रवत् स्नेह प्रदान करता है। वह उसे दुलारता है, पुचकारता है, आवश्यकता होने पर अनुशासन का महत्त्व भी समझाता है। शिष्य की प्रगति, चरित्र-निर्माण और यशस्विता के लिए वह निरन्तर चिन्तित रहता है तथा उसे भी चिन्तन मनन के लिए प्रेरित करता है, शिष्य को सत्कर्मोन्मुख करता है । शिष्य की सफलता में ही शिक्षक अपनी सफलता का दर्शन करता है। आचार्य जी ऐसे ही शिक्षक हैं l 

सच्चा शिक्षक केवल विषयज्ञान नहीं देता, अपितु जीवन जीने की कला भी सिखाता है। वह अपने शिष्यों को बताता है कि कर्म करते रहो, फल की चिन्ता मत करो l वह उसे आत्मा की नित्यता और शरीर की नश्वरता का बोध कराता है। ऐसे शिष्य को जब कर्म, कर्तव्य, आत्मा और जीवन के वास्तविक स्वरूप का  ज्ञान हो जाता है, तब वह जीवन से ऊबता नहीं, बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में उसका आनन्द लेना सीख जाता है l श्रीरामचरितमानस हमें शक्ति बुद्धि विचार कौशल और संगठन की महत्ता का उद्बोध कराता है l भगवान राम ने मनुष्य के रूप में जीवन का  जी आदर्श प्रस्तुत किया वह अद्वितीय है l

जब-जब धर्म की हानि होती है और दुष्ट, अधर्मी तथा अभिमानी लोगों का प्रभाव बढ़ने लगता है, तब-तब करुणासागर भगवान विभिन्न अवतार धारण करके सज्जनों की पीड़ा का निवारण करते हैं तथा धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।

भगवान राम समुद्र पार करने के लिए विचार कर रहे हैं 


सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥

संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँति॥3॥


 हे वानरराज! हे वीर लंकापति! बताइए, इस गम्भीर समुद्र को किस प्रकार पार किया जाए? यह समुद्र मगरमच्छों, सर्पों और विशाल मछलियों से भरा हुआ है। इसकी गहराई अथाह है और इसे पार करना हर प्रकार से अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है।


यद्यपि भगवान राम सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं, तथापि वे लोकमर्यादा का पालन करते हुए अपने सहयोगियों से परामर्श करते हैं। इससे नेतृत्व का यह आदर्श प्रकट होता है कि महानतम व्यक्ति भी सामूहिक विचार-विमर्श का सम्मान करता है और महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोगियों की राय लेता है।अद्भुत है भगवान राम की माया लीला l 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भगवान राम के एकनिष्ठ सेवक कौन हैं, भैया पंकज जी की किस पुस्तक की चर्चा हुई, शुक और सारण, जो रावण के दो प्रमुख मंत्री तथा गुप्तचर थे, क्यों चर्चा में आये जानने के लिए सुनें l

7.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७३ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५५

शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति करते हुए संगठन के लिए जब हम एकत्र हों उसमें धन को अधिक महत्त्व न दें अन्यथा मन व्यग्र होगा साथ ही दंभ अहंकार से भी बचें l संगठन में प्रेम और आत्मीयता महत्त्वपूर्ण है l


सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को सामर्थ्य, साहस और उत्तरदायित्व से युक्त बनाने वाली संस्कृति है। किसी भी देवी देवता को हम देखें तो उनके हाथों में शस्त्र दिखेंगे l ये शस्त्र केवल युद्ध के उपकरण नहीं हैं, वे धर्मरक्षा, अन्याय-प्रतिरोध, आत्मसंयम और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु का चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल, माँ दुर्गा के विविध आयुध और भगवान राम का धनुष सभी यह संदेश देते हैं कि सज्जनता के साथ शक्ति का होना भी आवश्यक है। मां सरस्वती के हाथों में वीणा है वह भी शक्ति और शौर्य को उद्भासित कर रही है वह आत्मिक शक्ति का स्रोत है l

वैदिक वाक्य “वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः” हमारे जैसे प्रत्येक जागरूक नागरिक का आदर्श है। सनातन परम्परा हमें सिखाती है कि धर्म का पालन केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित न रहे, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण से भी जुड़ा हो।

आज आवश्यकता है कि सनातनी समाज अपने भीतर शौर्य, आत्मविश्वास, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का विकास करे। ऐसा समाज जो ज्ञान में प्रखर हो, चरित्र में दृढ़ हो, सेवा में अग्रणी हो और आवश्यकता पड़ने पर धर्म तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए खड़ा होने का साहस रखता हो। इसके लिए हमारी शिक्षा भी महत्त्वपूर्ण है 

वर्तमान समय में चल रही शिक्षा निराशा हताशा कुंठा को वृद्धिंगत कर रही है यह शिक्षा व्यापार है l हमारे लिए इसे परिवर्तित करना नितान्त आवश्यक है l


गोस्वामी तुलसीदास ने अपने युग की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया। उन्होंने यह अनुभव किया कि समाज दिशाहीनता, निराशा और विघटन की ओर अग्रसर हो रहा है। अतः लोकमंगल की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने श्रीरामचरितमानस की रचना की, जिससे जनसामान्य को धर्म, नीति, सदाचार, भक्ति और आदर्श जीवन के मूल्यों का सरल एवं प्रभावी शिक्षण प्राप्त हो सके l


रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।

जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥49क

रावण का क्रोध अग्नि के समान था और उसकी उग्र श्वासें उस अग्नि को प्रचण्ड बनाने वाली वायु के समान थीं। ऐसे भयंकर क्रोध की अग्नि में विभीषण मानो जल रहे थे। उस समय श्रीराम ने उन्हें अपनी शरण में लेकर न केवल उनकी रक्षा की, बल्कि आगे चलकर उन्हें अखण्ड लंका का राज्य भी प्रदान किया।


अधर्म के बीच सत्य का पक्ष लेने वाला व्यक्ति यदि अकेला भी पड़ जाए, तो ईश्वर स्वयं उसका सहारा बनते हैं।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बैठकों के लिए क्या परामर्श दिया, युगभारती प्रार्थना की चर्चा क्यों हुई, प्रार्थना का दूसरा छंद कहां से लिया गया है जानने के लिए सुनें l

6.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७२ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५४

जब हम आत्मचिन्तन करते हैं तो आनन्द में रहते हैं और जब लोकचिन्तन करते हैं तो व्याकुल रहते हैं किन्तु लोक को जब आत्म के साथ संयुत करने का प्रयास करते हैं तो उत्साह प्राप्त होता है l



समस्याओं का अस्तित्व जीवन का स्वाभाविक अंग है। यदि समस्याएँ ही न हों, तो समाधान की खोज, नवोन्मेष की प्रेरणा और पुरुषार्थ का अवसर भी नहीं मिलेगा। अनेक बार वही कठिनाइयाँ हमें विचार करने, सीखने और अपनी क्षमताओं का विकास करने के लिए प्रेरित करती हैं।

संसार के साथ सामंजस्य केवल अनुकूल परिस्थितियों से नहीं बनता, बल्कि प्रतिकूलताओं का धैर्यपूर्वक सामना करने और उनके समाधान खोजने से बनता है। यदि हम  समस्याओं से भागते हैं तो हम विकास के अवसरों से भी दूर हो जाते हैं परन्तु  उन्हें समझकर समाधान की दिशा में प्रयत्न करते हैं तो जीवन में स्थिरता और सफलता प्राप्त करते हैं l

समस्याएँ पुरुषार्थ को जाग्रत करती हैं और शरीर उस पुरुषार्थ के प्रकट होने का माध्यम बनता है।शरीर धारण करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। यह शरीर एक ओर रोगों का घर कहा गया है  परन्तु दूसरी ओर यही शरीर धर्म, साधना, सेवा, ज्ञानार्जन और लोकमंगल का साधन भी है। अतः शरीर के प्रति न तो अत्यधिक आसक्ति रखनी चाहिए और न ही उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। उसकी आवश्यक देखभाल, स्वच्छता, स्वास्थ्य-संरक्षण और पोषण आवश्यक है, क्योंकि स्वस्थ शरीर से ही उच्च आदर्शों की पूर्ति सम्भव होती है। किन्तु साथ ही यह स्मरण भी रहना चाहिए कि शरीर साधन है, साध्य नहीं। इसका उद्देश्य केवल भोग नहीं, अपितु कर्तव्य, सेवा, साधना और आत्मविकास है।

इस प्रकार शरीर के प्रति समभाव रखना चाहिए— न मोह, न तिरस्कार; न अहंकार, न उपेक्षा। उसकी रक्षा करें, परन्तु उसे ही अपना सम्पूर्ण स्वरूप न मानें।

यदि मनुष्य अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक और लोककल्याण की भावना से पालन करता है, तो वही उसकी ईश्वर-पूजा बन जाती है।

जो शिक्षक निष्ठापूर्वक शिक्षा देता है, जो कृषक परिश्रमपूर्वक अन्न उत्पन्न करता है, जो चिकित्सक सेवा-भाव से रोगियों का उपचार करता है, जो सैनिक राष्ट्ररक्षा करता है, जो साधक स्वाध्याय,साधना, लेखन -योग करता है—वे सभी अपने-अपने कर्म द्वारा परमात्मा की आराधना कर रहे होते हैं।

तुलसीदासजी संकेत करते हैं कि जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का आश्रय नहीं छोड़ता, उसकी रक्षा स्वयं भगवान् करते हैं। रावण के राज्य से निष्कासित विभीषण को श्रीराम ने न केवल शरण दी, बल्कि आगे चलकर लंका का अखण्ड राज्य भी प्रदान किया 


रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥

सुन्दर कांड में आचार्य जी ने आज और क्या बताया,साध्वी ऋतंभरा (दीदी माँ) के गुरु युगपुरुष महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद गिरिजी महाराज का उल्लेख क्यों हुआ, जाजमऊ की चर्चा क्यों हुई, भैया अरविन्द जी की किस योजना का संकेत हुआ, भैया संतोष मिश्र जी द्वारा दी गयी किस पुस्तक का उल्लेख हुआ जानने के लिए सुनें l

5.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७१ वां सार

 तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५३

लेखन एक योग है इसे अपने जीवन में अवश्य महत्त्व दें 


मन का मनका टूट रहा है,

बेगाना जग छूट रहा है l

इस मन को कैसे समझाऊं,

कांचा घट अब फूट रहा है  ll 

जब मृत्यु या शरीर के क्षीण होने का समय निकट आता दिखाई देता है तब मनुष्य को अनुभव होता है कि संसार की वस्तुएँ स्थायी नहीं हैं  केवल ईश्वर, आत्मा और सत्कर्म ही शाश्वत हैं।

या जब विवेक का उदय होता है तो मनुष्य समझने लगता है कि संसार का उपयोग तो किया जा सकता है, परन्तु उसे जीवन का अंतिम आश्रय नहीं बनाया जा सकता। और इस प्रकार वह आत्मचिन्तन, सत्संग, भक्ति और धर्म की ओर उन्मुख होता है।

जब तन केवल भोग में और मन केवल इच्छाओं में उलझ जाता है, तब अशान्ति उत्पन्न होती है। परन्तु जब तन सेवा में, मन भक्ति में और बुद्धि विवेक में स्थित होती है, तब जीवन आनन्दमय बन जाता है।

श्रीरामचरितमानस  जीवन को सही ढंग से जीने की कला सिखाने वाला ग्रन्थ है l सुन्दरकांड का पाठ हमारा अभिप्रेत है l 


सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥48॥

भगवान् श्रीराम कहते हैं कि जो मनुष्य सगुण स्वरूप में भगवान् की उपासना करते हैं, सदैव दूसरों के हित में लगे रहते हैं, नीति और धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करते हैं तथा जिनके हृदय में ब्राह्मणों, विद्वानों और ज्ञानपरम्परा के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम होता है, वे मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय हैं।


जो व्यक्ति ईश्वर-भक्ति के साथ समाज-हित,राष्ट्र -हित,मर्यादा, अनुशासन और सद्जनों के सम्मान को अपनाता है, वही भगवान् का सच्चा भक्त कहलाता है।॥


भैया पुनीत जी, भैया अरविन्द जी, श्री सुनील मिश्र जी का उल्लेख क्यों हुआ, तन मन धन के स्थान पर तन मन के साथ GUN का उल्लेख कौन करता था,सगुणोपासक कैसा विश्वासी होता है जानने के लिए सुनें