30.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष चतुर्दशी /पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६५ वां* सार

 जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥

दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥2॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष चतुर्दशी /पूर्णिमा  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४७

जो हमारे  भीतर मनमन्दिर में स्थित है उसके पास अवश्य बैठें l


हमारे जीवन में सांसारिकता और आध्यात्मिकता — दोनों का समान महत्त्व है। विद्या और अविद्या के मध्य संतुलन आवश्यक है।


यहाँ अविद्या का तात्पर्य अज्ञान से नहीं, अपितु संसार के व्यवहार, कर्म, जीविका, परिवार, समाज, विज्ञान तथा व्यवस्था आदि से है। विद्या का अर्थ आत्मज्ञान, ब्रह्मचिन्तन, ईश्वरभक्ति और आध्यात्मिक बोध है।


अतः मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जिसमें वह अपने सांसारिक कर्तव्यों का भी सम्यक् पालन करे और साथ ही अपने अन्तःकरण को परमात्मा से संयुत रखे। कर्म और अध्यात्म का यही समन्वय जीवन को संतुलित एवं सार्थक बनाता है।


जब कर्म हम पुरोहितों के लिए राष्ट्र के लिए जाग्रत रहने का होता है तथा  जब कर्म समाजोन्मुखी भाव से किया जाता है, तब वही धर्मस्वरूप हो जाता है। ऐसा धर्म मनुष्य को पतन से बचाकर उसे सदैव सत्य, मर्यादा और कल्याण के पथ पर अग्रसर रखता है।


हमारे समाज के जो लोग पथभ्रष्ट हो गए हैं, उन्हें हम पुनः  सन्मार्ग पर लाने का प्रयास करेंगे और जो जान-बूझकर समाज तथा राष्ट्र को विपथगामी बनाने का प्रयास करेंगे, उनका दृढ़तापूर्वक प्रतिकार भी करेंगे l इसके लिए संगठन अत्यन्त आव्श्यक है l भगवान् राम ने यही किया l


ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।

तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥33॥

जिस व्यक्ति पर प्रभु श्रीराम की कृपा हो जाती है, उसके लिए संसार में कोई भी कार्य असम्भव नहीं रहता। प्रभु की कृपा के प्रभाव से अत्यन्त दुर्बल वस्तु भी असाधारण कार्य कर सकती है; जैसे रुई सामान्यतः अग्नि में जल जाती है, किन्तु प्रभु की शक्ति से वही रुई समुद्र के भीतर स्थित प्रचण्ड बड़वानल को भी जला सकती है।

हम प्रविष्ट हैं सुन्दर कांड में 

 लंका-दहन, सीताजी का सन्देश प्राप्त करने तथा अपना कार्य पूर्ण करके हनुमानजी श्रीराम के समक्ष उपस्थित होते हैं। श्रीराम उनकी सेवाभावना से अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें वर माँगने के लिए कहते हैं। तब हनुमानजी भक्ति का वरदान माँगते हैं

“हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे अपनी ऐसी भक्ति प्रदान कीजिए जो परम सुखदायिनी हो और कभी मुझसे दूर न हो।”


हनुमानजी के अत्यन्त सरल, निष्काम और निष्कपट वचन सुनकर श्रीराम ने प्रसन्न होकर कहा— “एवमस्तु”, अर्थात् “ऐसा ही हो।”

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, युगभारती के प्रथम अध्यक्ष स्व भैया राजेश जी का उल्लेख आचार्य जी ने क्यों किया तुलसीदास जी *उहां* कब कहते हैं और *इहां* कब जानने के लिए सुनें

29.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष त्रयोदशी / चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६४ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष त्रयोदशी / चतुर्दशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 29 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४६

 

जो हम बोलते हैं, वही हमारे आचरण में भी प्रकट हो और हमारा शरीर उसी के अनुसार कार्य करे तो हमारा जीवन स्वाभाविक रूप से शुद्ध और पवित्र बन जाएगा l 


यदि मनुष्य केवल अच्छे शब्द बोलता रहे, परन्तु उसका व्यवहार उसके विपरीत हो, तो जीवन में असंगति और कृत्रिमता उत्पन्न होती है।



हमारी प्रगति केवल बाहरी साधनों या अवसरों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मुख्य रूप से हमारे आन्तरिक और शारीरिक संतुलन पर आधारित होती है। यदि हमारा शरीर रोगमुक्त, सशक्त और सक्रिय रहता है, तो हम परिश्रम करने में सक्षम होते हैं और अपने कार्यों को निरन्तरता के साथ पूरा कर सकते हैं। शरीर की अस्वस्थता हमारी क्षमता को सीमित कर देती है और हमारे कार्य में बाधा उत्पन्न करती है।


इसी प्रकार, यदि हमारा मन स्थिर, शांत और सकारात्मक विचारों से युक्त रहता है, तो हम तनाव, भय और भ्रम से मुक्त होकर अपने लक्ष्य पर केन्द्रित रह सकते हैं। अस्थिर मन हमें बार-बार दिशा से भटका देता है और हमारी कार्यक्षमता को प्रभावित करता है।


बुद्धि का स्पष्ट, विवेकपूर्ण और सही निर्णय लेने में सक्षम होना भी अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि बुद्धि ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करती है। यदि हमारे निर्णय गलत हों, तो हमारे प्रयास भी सफल नहीं हो पाते।


जब हमारा शरीर, मन और बुद्धि—ये तीनों सम्यक रूप से संतुलित होते हैं, तभी हम अपने जीवन में स्थायी सफलता प्राप्त करते हैं। यही संतुलन वास्तविक प्रगति का आधार है, और इसके बिना हमारी उन्नति पूर्ण रूप से सम्भव नहीं होती।


सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ॥


मनुष्य अपने ही कर्मों से अपने भविष्य का निर्माण करता है। यदि वह गलत कार्य करता है या अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, तो उसका परिणाम अवश्य ही दुःख के रूप में सामने आता है। उस समय वह पछताता है, परन्तु समझ की कमी के कारण वह अपने कर्मों को न देखकर भाग्य, समय या ईश्वर को दोष देने लगता है।


तुलसीदासजी यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक उत्तरदायित्व मनुष्य के अपने कर्मों का होता है। इसलिए जीवन में विवेकपूर्वक कर्म करना ही उचित है l

आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम अपने भाव सुस्थिर रखने का प्रयास करें अर्थात् मन, चित्त, भावनाओं को ऐसी अवस्था में रखें कि वे डगमगाएँ नहीं, विचलित न हों, और एक ही दिशा में स्थिर रहें। हमारे भावों में शौर्य से प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति हो समाज और राष्ट्र का हित हो l यही रामकाज है, जिसे हनुमान जी ने पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ सम्पन्न किया।


हनुमान जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन को भगवान राम के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी वाणी, शरीर, बुद्धि और शक्ति सभी को केवल रामकाज में लगा दिया। लंका-गमन, सीता-खोज, संजीवनी लाना आदि उनके इसी समर्पण के उदाहरण हैं।

भगवान् राम पूछते हैं 


कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥3॥


हे हनुमान! बताओ तो, रावण के द्वारा सुरक्षित लंका और उसके बड़े बाँके किले को तुमने किस तरह जलाया? 


जब हनुमान जी देखते हैं कि प्रभु प्रसन्न हैं, तो उनका अहंकार पूर्णतः समाप्त हो जाता है। वे समझते हैं कि उनके सभी कार्य केवल प्रभु की कृपा से ही संभव हुए हैं। इसलिए वे विनम्र होकर उत्तर देते हैं।

अनपायिनी भक्ति को आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया,चम्मच से पैसा कौन हटा देता था,नरेन्द्र ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कैसी परीक्षा ली, गुरुता क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

28.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६३ वां* सार -संक्षेप

 बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥

रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥


रामकथा बुद्धिमानों को शान्ति, सामान्य जनों को आनन्द, कलियुग के पापों से मुक्ति और अन्तःकरण में विवेक की ज्योति प्रदान करती है।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष  द्वादशी /त्रयोदशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४५

जिस प्रकार हनुमान जी को विश्वास था 


ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।

तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥33॥

वैसा ही विश्वास हम लोगों के भीतर भी उत्पन्न हो इसका प्रयास करें 


जो कुछ जहां भी जो भी देशहित कर रहा 

करता रहे सदा ही पूरे मनोयोग से

कर्म का कुठार दायें हाथ में पकड़कर 

बायें को लगाए रहे नवल प्रयोग से

कर्मयज्ञ सतत चला है चलता रहेगा 

किसी भी दशा दिशा में योग में वियोग में 

अतः मलिन मन होकर न बैठो मित्र 

मन को लगाए रहो सदा कर्मयोग में ll 


हममें से जो भी राष्ट्रहित में कार्य कर रहा हो , उसे पूर्ण समर्पण और निष्ठा के साथ  करता रहे l कर्म में परिश्रम  के साथ नवल प्रयोग भी कर सकते हैं जीवन में संयोग-वियोग, अनुकूलता-प्रतिकूलता आती रहती हैं, परन्तु कर्मरूपी यज्ञ कभी रुकना नहीं चाहिए। इसलिए निराशा , मालिन्य और निष्क्रियता धारण करके बैठने के स्थान पर मन को सदैव कर्मयोग में लगाकर उत्साहपूर्वक आगे बढ़ते रहना चाहिए l जितने भी प्रयोग देशहित में होंगे वही रामकथा का आधार बनेंगे l 

रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥

सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥


जब अबुल-फ़तह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का शासन था

(सन् १५५६ से सन् १६०५ तक) और धार्मिक तथा सांस्कृतिक चेतना क्षीण होती प्रतीत हो रही थी, तब गोस्वामी तुलसीदास ने सन् १५७४-७५ में कलम उठाई और श्रीरामचरितमानस के माध्यम से सनातन धर्म के आदर्शों, मर्यादा, भक्ति और लोकमंगल की भावना को जन-जन तक पहुँचाकर समाज को जाग्रत करने का, संगठित करने का कार्य किया।

रामकथा ऐसी अद्भुत कथा है जिससे आज भी भ्रमित जनमानस दिशा, धैर्य और धर्म का आलोक प्राप्त कर रहा है।विचलित हृदयों को वह मर्यादा का मार्ग दिखाती है, निराश आत्माओं में आशा का दीप प्रज्वलित करती है और  राष्ट्रभक्त समाज को पुनः अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ती है। यह कथा संयम है, सेवा है, प्रेरणा है;

यह शक्ति है, भक्ति है, विश्वास और स्वाध्याय है।

यह केवल आख्यान नहीं, अपितु मानव जीवन को धर्म, मर्यादा और आत्मोन्नति की ओर ले जाने वाला दिव्य पथ है।


बालधी विसाल विकराल ज्वाल-जाल मानौं, लंक लीलिबे को काल रसना पसारी है। कैथौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु, बीररस बीर तरवारि सी उघारी है।। तुलसी सुरेस चाप, कैध दामिनी कलाप, कैध चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है। देखे जातुधान जातुधानी अकुलानी कहें, "कानन उजार्यो अब नगर प्रजारी है l 

(कवितावली )

आचार्य जी ने सुंदर कांड के एक अत्यन्त भावनापूर्ण प्रसंग  का उल्लेख किया वह प्रसंग क्या है जानने के लिए  सुनें l

27.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष एकादशी / द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६२ वां* सार -संक्षेप

 एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥

तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥6॥

हे तात! आप केवल इतना कार्य कीजिए कि वहाँ जाकर माता सीता को देख आएँ और उनकी सुधि लेकर लौट आएँ। उसके बाद कमलनयन प्रभु श्रीराम अपने भुजबल से, वानर सेना सहित, खेल-खेल में ही सब कार्य सिद्ध कर देंगे l 



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष एकादशी / द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 27 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४४

यदि हम युगभारती के सदस्य “राष्ट्र प्रथम” के पवित्र भाव को अपने जीवन का आधार बनाकर परस्पर प्रेम, आत्मीयता और सहयोग से संयुत रहेंगे , तो उसका परिणाम केवल संगठन की उन्नति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह सम्पूर्ण समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।

ऐसे जीवनमूल्यों का प्रभाव केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहता। भावी पीढ़ियाँ शब्दों से नहीं, उदाहरणों से प्रेरित होती हैं। जब वे देखती हैं कि एक संगठन के सदस्य राष्ट्र, संस्कृति और समाज के लिए निःस्वार्थ भाव से एकजुट होकर कार्य कर रहे हैं, तब उनके भीतर भी सेवा, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति के संस्कार जाग्रत होते हैं। इस प्रकार वर्तमान का सद्भाव भविष्य की प्रेरणा बन जाता है।



आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस, जो प्रमुख रूप से भगवान राम के वनवास  की कथा है,के सुन्दरकाण्ड में प्रविष्ट हैं इस कांड में हनुमान जी केवल बल और पराक्रम के प्रतीक नहीं हैं, अपितु वे अन्तःस्थित भक्ति, अटूट विश्वास और जाग्रत आत्मशक्ति के भी मूर्त स्वरूप हैं।

जब  हम हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और विश्वास को अपने भीतर धारण करेंगे तब हमें अनुभव होगा कि हमारे भीतर भी असम्भव को सम्भव करने की क्षमता विद्यमान है। यह शक्ति बाहर से प्राप्त नहीं होती; यह तो आत्मा में निहित दिव्य चेतना का जागरण है। हनुमान जी स्वयं इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं। जाम्बवान् के स्मरण कराने पर उन्हें अपनी सुप्त शक्ति का बोध हुआ और वे समुद्र लाँघने में समर्थ हुए। इसका गूढ़ संकेत यह है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर भी अनन्त सामर्थ्य विद्यमान है, किन्तु वह श्रद्धा और आत्मविश्वास के अभाव में सुप्त पड़ा रहता है।


लंका जैसी दुर्जेय नगरी में प्रवेश करना, राक्षसों का सामना करना, माता सीता को आश्वस्त करना और सम्पूर्ण लंका को दग्ध कर देना—ये सभी कार्य हनुमान जी ने किए l

लंका को दग्ध करने के पश्चात् वे माता सीता के पास पहुंच जाते हैं 

 माता! जैसे प्रभु श्रीराम ने मुझे अपनी मुद्रिका देकर भेजा था, वैसे ही आप भी कोई चिन्ह दीजिए, जिससे प्रभु को विश्वास हो और उन्हें आपकी सुधि प्राप्त हो।

तब माता सीता अपने मस्तक की चूड़ामणि उतारकर हनुमान जी को देती हैं। वह केवल आभूषण नहीं था; वह विरह, विश्वास और आशा का प्रतीक था। माता सीता हनुमान जी के माध्यम से प्रभु श्रीराम को अपना सन्देश भी भेजती हैं। उनके वचनों में करुणा, धैर्य और राम के प्रति अनन्य समर्पण झलकता है।

हनुमान जी माता को धैर्य बँधाते हैं कि प्रभु शीघ्र ही वानर सेना सहित लंका आएँगे और रावण का विनाश करके उन्हें पुनः सम्मान सहित ले जाएँगे। इस समय हनुमान जी केवल दूत नहीं रहते; वे आशा और विश्वास के आधार बन जाते हैं।

हनुमान जी भगवान राम को सब बता देते हैं 


अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥

मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥2॥


छोटे भाई समेत प्रभु के चरण पकड़ना (और कहना कि) आप दीनबंधु हैं, शरणागत के दुःखों को हरने वाले हैं और मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप) ने मुझे किस अपराध से त्याग दिया?॥2॥



इसके विस्तार में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें

26.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४३


यदि हम पुनः अपने महान् ग्रन्थों की ओर लौटें, उनका अध्ययन, मनन और आचरण करें, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में प्रकाश आएगा, बल्कि समाज और राष्ट्र भी पुनः उसी गौरव, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक चेतना की ओर अग्रसर हो सकेगा, जिसने कभी भारत को विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया था।




भारत वह  दिव्य भूमि है जहाँ मानव जीवन को केवल भोग और उपार्जन का साधन न मानकर, आत्मोन्नति, लोकमंगल और परम सत्य की प्राप्ति का माध्यम माना गया। यहाँ के ऋषियों ने तप, साधना और अनुभूति के द्वारा ऐसे ज्ञान का प्रकाश किया, जिसने मनुष्य को केवल बाह्य उन्नति ही नहीं, बल्कि अन्तर्मन की जागृति का मार्ग भी प्रदान किया।हमारे समक्ष भारत के इसी दिव्य ज्ञान-परम्परा का आधार हमारे  अत्यन्त प्रेरणादायक, प्रभावोत्पादक और भक्तिरस से ओतप्रोत ग्रन्थ जैसे वेद, उपनिषद्, पुराण,श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस, कवितावली उपलब्ध हैं l ये ग्रन्थ हमारे भीतर आत्मबोध, साहस, पुरुषार्थ, करुणा, भक्ति और जीवन के उच्च आदर्शों का जागरण करते हैं।

किन्तु विडम्बना यह है कि हम इन अमूल्य ज्ञानस्रोतों से विमुख होकर ऐसी शिक्षा की ओर अधिक आकर्षित हो गए हैं, जो प्रायः केवल नौकरी प्राप्त करने तक सीमित रह गई है। यह शिक्षा हमें बाह्य साधनों की ओर तो ले जाती है, परन्तु अनेक बार  हमें हमारे अन्तर्मन की शक्ति, आत्मचेतना, स्वाभिमान और पराक्रम से दूर कर देती है।यदि हम अपने जीवन में इन दिव्य ग्रन्थों के विचारों का मनन करे, तो उसमें केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक, तेजस्वी और लोकमंगलकारी बनाने की प्रेरणा भी जाग्रत हो सकती है। लोकमंगल अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि इस समय परिस्थितियां अत्यन्त विषम हैं ऐसे में हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए बिना ईर्ष्या द्वेष के सत्पुरुषों को संगठित करें  और कापुरुषों का निरसन करें l विकारों को दूर कर सद्विचारों को ग्रहण करें तो आइये सद्विचारों को ग्रहण करने के लिए प्रवेश करें लंका में


लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥

मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥1॥

हनुमान् जी सोचने लगे—

“यह लंका तो राक्षसों का निवासस्थान है। यहाँ सज्जनों का वास भला कहाँ हो सकता है?”

वे अपने मन में यही तर्क-वितर्क कर ही रहे थे कि उसी समय विभीषण जाग उठे।

ईश्वर की व्यवस्था में कभी भी सत्पुरुषों का पूर्ण अभाव नहीं होता।

अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों में भी कहीं न कहीं सत्य, भक्ति और धर्म का दीपक जलता रहता है।

आइये उस प्रसंग में पहुंच जाएं जब विभीषण नीति का स्मरण कराते हुए कहते हैं कि दूत का वध अधर्म है।

यह सुनकर रावण अपना आदेश बदल देता है और कहता है—

“वानर को उसकी पूँछ अत्यन्त प्रिय होती है, अतः इसकी पूँछ में आग लगा दो।”

इसके पश्चात् 

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥

जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥3॥


जारि-बारि, कै बिधूम, बारिधि बुताइ लूम, 

      नाइ माथो पगनि, भो ठाढ़ो कर जोरि कै।

मातु! कृपा कीजे, सहिदानि दीजै, सुनि सीय

       दीन्ही है असीस चारु चूडामनि छोरि कै॥


कहा कहौं तात! देखे जात ज्यौं बिहात दिन,

        बड़ी अवलंब ही,सो चले तुम्ह तोरि कै।

'तुलसी' सनीर नैन, नेहसो सिथिल बैन,

        बिकल बिलोकि कपि कहत निहोरि कै॥


हनुमान् जी लंका जलाकर, समुद्र में अपनी पूँछ की अग्नि बुझाकर, माता सीता के पास आते हैं। वे सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर विनम्र भाव से खड़े हो जाते हैं और कहते हैं—


“माता! अब मुझे विदा दीजिए, कृपा कर कोई पहचान और संदेश दीजिए।”


यह सुनकर सीता माता उन्हें आशीर्वाद देती हैं और अपनी चूड़ामणि उतारकर श्रीराम के लिए पहचानस्वरूप प्रदान करती हैं।


फिर अत्यन्त करुण स्वर में कहती हैं—

“पुत्र! क्या कहूँ? तुम्हें जाते देखकर ऐसा लगता है जैसे दिन ही समाप्त हो रहा हो। तुम ही तो मेरे बड़े सहारे थे, और अब तुम भी जा रहे हो।”

तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता माता की आँखें आँसुओं से भरी थीं, प्रेम के कारण उनकी वाणी मन्द और कम्पित हो रही थी। उनकी व्याकुल दशा देखकर हनुमान् जी भी अत्यन्त विनीत होकर उन्हें धैर्य देने लगे।


इसके अतिरिक्त भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी भैया मोहन जी भैया पवन जी भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें