28.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०६

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०६


हम कायरता, निराशा, आलस्य और आत्महीनता को अपने ऊपर अधिकार न करने दें। यह हमारे गौरव और इस दिव्य मानव जीवन के अनुरूप नहीं है। हम अपने हृदय की तुच्छ दुर्बलताओं, भय, मोह और संशय का त्याग करें तथा धर्म, सत्य, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा के पथ पर दृढ़तापूर्वक खड़े होकर निष्काम भाव से कर्म में प्रवृत्त हों। 




इन सदाचार वेलाओं का श्रद्धापूर्वक श्रवण कर हम  मुमुक्षु आत्मानन्द का अनुभव करें, उत्साहपूर्वक अपने कर्तव्यों के प्रति संकल्प जाग्रत करें तथा इस दुर्लभ मानव जीवन को ईश्वरप्रदत्त अनुपम अवसर मानें। निष्काम कर्मयोग की भावना से, फल की इच्छा का त्याग कर, सनातन धर्म, राष्ट्र-निष्ठ समाज और राष्ट्र के कल्याण हेतु निरन्तर कर्मरत रहने का दृढ़ संकल्प लें।

*उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत*

रामकथा हमें यही जीवन-दर्शन प्रदान करती है। भगवान श्रीराम, जिन्होंने जीवन को एक युद्ध माना, का सम्पूर्ण जीवन कर्तव्य, त्याग, मर्यादा और निष्काम कर्म का सजीव आदर्श है। उन्होंने प्रत्येक परिस्थिति में धर्म का आश्रय लिया, लोकमंगल को सर्वोपरि रखा और बिना किसी स्वार्थ के अपने जीवन को समर्पित किया।


आजकल हम लोग इसी रामकथा  के उस प्रसंग में प्रविष्ट हैं जब भयभीत भ्रमित विभीषण को भगवान् राम समझा रहे हैं

विजय बाहरी अस्त्र-शस्त्र या भौतिक सामर्थ्य से नहीं, बल्कि सद्गुणों से निर्मित धर्मरथ पर आरूढ़ होकर ही प्राप्त होती है। जिस व्यक्ति के जीवन में शौर्य और धैर्य का संतुलन हो, सत्य और सदाचार उसकी पहचान हों, बल के साथ विवेक और आत्मसंयम जुड़ा हो तथा उसका प्रत्येक कर्म परोपकार की भावना से प्रेरित हो, उसके जीवन का रथ सम्यक् दिशा में अग्रसर होता है। इस रथ को नियंत्रित करने वाली लगाम क्षमा, करुणा और समता हैं, जो शक्ति को मर्यादा प्रदान करती हैं और व्यक्ति को अहंकार से बचाती हैं l

विभीषण को समझ में आ जाता है 

इसके अतिरिक्त भैया पवन जी, भैया पंकज जी के नाम लेकर आचार्य जी ने सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै के भाव को कैसे स्पष्ट किया,आचार्य जी ने किसे ध्यान, विधान,ज्ञान का मंगल अनुमोदन बताया, देशदर्शन क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

27.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 27 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०५

प्रातःकाल का हमारा जागरण हो ,  इसके पश्चात् हम शरीर का मार्जन करें ,मन के परिमार्जन  हेतु सदाचारमय विचार ग्रहण करें और अपने लक्ष्य का ध्यान रखते हुए कर्मरत हों l



रावण ने अपने आतंक को केवल बल के आधार पर नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीति के माध्यम से फैलाया। उसने अनेक राक्षसों और अपने समर्थकों को विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित किया। ताड़का, खर, दूषण और त्रिशिरा जैसे राक्षस वन क्षेत्रों में सुतीक्ष्ण शरभंग आदि ऋषियों, तपस्वियों पर अत्याचार कर रहे थे। अनेक वनवासी समुदाय भी उसके प्रभाव या भय के कारण उसके पक्ष में दिखाई देते हैं । इस प्रकार रावण ने आतंक का एक संगठित जाल बिछा रखा था।

उस समय अनेक शक्तिशाली राजा अपने-अपने राज्य और दायित्वों तक सीमित रहे। राजा दशरथ ने देवासुर संग्राम में इन्द्र की सहायता कर शम्बर का वध किया, किन्तु  रक्तपिपासु रावण के विरुद्ध कोई अभियान नहीं छेड़ा l इसी प्रकार मिथिला के राजा जनक का मुख्य ध्यान अपने राज्य और आध्यात्मिक जीवन पर केन्द्रित था। इस परिस्थिति में ऋषियों,मुनियों पर होने वाले अत्याचार निरन्तर बढ़ते गए।

यह प्रसंग हमें संकेत देता है कि जब समाज का नेतृत्व व्यापक संकट के प्रति संगठित होकर खड़ा नहीं होता, तब अधर्म और आतंक को विस्तार का अवसर मिल जाता है। इसलिए किसी भी युग में राष्ट्र और समाज की सुरक्षा सजग नेतृत्व, सामाजिक एकता और धर्मनिष्ठ नागरिकों से सुनिश्चित होती है।

आज भी यदि राष्ट्रविरोधी शक्तियाँ समाज में भ्रम, भय, विभाजन का प्रयास करें, तो उनसे सतर्क रहना आवश्यक है l

इतिहास का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यदि हम भी केवल अपने में मग्न रहें और समाज तथा राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों से विमुख हो जाएँ, तो सनातनधर्मी समाज और भारत राष्ट्र के लिए अनिष्टकारी शक्तियों को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। सजग, उत्तरदायी और संगठित समाज ही ऐसे प्रयासों का प्रभावी उत्तर दे सकता है।

भगवान राम का जीवन सिखाता है कि सज्जन व्यक्ति केवल अपने संसार तक सीमित नहीं रहता। वह समाज, धर्म और लोकमंगल के लिए भी उत्तरदायित्व निभाता है। जहाँ अधर्म और आतंक निर्दोषों को पीड़ित करें, वहाँ धर्मनिष्ठ व्यक्ति यथाशक्ति उनके संरक्षण और न्याय के लिए खड़ा होता है। हमें भी यही करना है l

इस प्रेरणा को प्राप्त करने के लिए आइये हम प्रवेश कर जाएं लंका कांड के युद्धक्षेत्र में जहां भगवान राम के ह्रदय में कोई भय नहीं कोई भ्रम नहीं उन्हें अपने शौर्य पराक्रम पर विश्वास है


वे शंकालु विभीषण

(नाथ न रथ नहिं तन पद त्रानां । केहि बिधि जितब बीर बलवाना ।)


 को उत्तर देते हैं 

सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना । २ ।

सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ।

बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे । ३ ।

ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ।

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा । ४ ।

इसे आचार्य जी ने किस प्रकार समझाया, यम नियम के विषय में क्या बताया, अधिवेशन की चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें l

26.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०४

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०४

 हम अपने को भौतिक भंवर से निकालकर कुछ समय यदि आध्यात्मिक चिन्तन, स्वाध्याय,आत्ममन्थन के लिए देते हैं तो निश्चित रूप से हमारा मन उल्लसित रहेगा हमें धैर्य,भक्ति,शक्ति,शौर्य,पराक्रम प्राप्त होगा l


हमारा सनातन धर्म अद्भुत, अनादि और अनन्त है। वेदों के दिव्य मन्त्र, उपनिषदों के अमृततुल्य उद्धरण तथा पुराणों के प्रेरणादायी आख्यान हमारी अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर हैं। यही हमारे जीवन का बल, हमारी संस्कृति का आधार और हमारे आत्मविश्वास का स्रोत हैं। ये हमें ज्ञान, विवेक, साहस, धैर्य और धर्मनिष्ठा की शक्ति प्रदान करते हैं तथा प्रत्येक परिस्थिति में सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देते हैं।

पश्चिमी प्रभावों से भ्रमित होकर यदि हम  वेद, उपनिषद और पुराणों को हेय दृष्टि से देखते हैं, तो हमारा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पतन निश्चित है । इस पतन से बचने के लिए शिक्षा का महत्त्व सर्वोपरि हो जाता है। शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य, स्वावलम्बन और सुरक्षा  हमारी संस्था के चिंतन और कार्य के प्रमुख आयाम हैं।

जब हम संसार की परिस्थितियों को सम्यक् दृष्टि से समझकर उन्हें आत्मसात् करते हैं, तब हम परिस्थितियों के दास नहीं रहते, बल्कि उन पर विवेकपूर्ण दृष्टि से विचार करने लगते हैं।  हमारे भीतर यह दृढ़ विश्वास जाग्रत होता है कि प्रत्येक परिस्थिति में हमें राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सदैव जागरूक रहना है। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः l

गोस्वामी तुलसीदास ने अपने समय की विषम परिस्थितियों को गहराई से समझा। उन्होंने सनातनधर्मी समाज की निराशा, विघटन और सांस्कृतिक शिथिलता को पहचानकर श्रीरामचरितमानस के माध्यम से जन-जन को धर्म, सदाचार, आत्मविश्वास और राष्ट्रचेतना के प्रति जाग्रत किया। इसी ग्रंथ के लंका कांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं और उसमें आज हम लोग  एक अत्यन्त प्रेरक प्रसंग *धर्मरथ*, जिसे विभीषण -गीता और राम -गीता के नाम से भी जाना जाता है, में प्रवेश करने जा रहे हैं


यहां गोस्वामी तुलसीदासजी बताते हैं कि जीवन के वास्तविक संघर्षों में विजय बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि धर्मरूपी रथ से प्राप्त होती है। विभीषण व्याकुल हैं भ्रमित हैं 

रावण की सेना में  असंख्य अस्त्र शस्त्र हैं 

और हमारी ओर 


नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥

केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥5॥

विभीषण कहते हैं 


नाथ! न रथ, नहिं तन पद त्राना।

केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥

अर्थात्, "हे नाथ! आपके पास न रथ है, न शरीर का कवच और न ही पैरों में  पदत्राण। ऐसे में आप उस बलवान रावण को कैसे जीतेंगे?"

तब भगवान राम उसे उत्तर देते हैं 


इसके अतिरिक्त भैया पंकज जी भैया पवन जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

25.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०३

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 25 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०३

हमारा संकल्प हो कि जीवन का प्रत्येक क्षण कर्ममय बने। तब आयु हमें नहीं रोकेगी, परिस्थितियाँ हमें नहीं झुकाएँगी और अंतिम श्वास तक हम कर्तव्यपथ पर अविचल चलते रहेंगे।




शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलम्बन और सुरक्षा—इन चार आधारभूत आयामों को केन्द्र में रखकर हमारी संस्था युगभारती, जिसके लिए प्रेम और आत्मीयता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, व्यक्ति, परिवार,समाज और भारत राष्ट्र,जहां अनगिनत महापुरुषों ने निष्काम कर्मयोगी बनकर अपने त्याग, तप,  परिश्रम, शौर्य, पराक्रम और बलिदान से  वैभव, गौरव और विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया,के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य और व्यवहार के स्तर पर सतत आगे बढ़ रही है। हमारा प्रयास केवल विचार देने तक सीमित नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारकर व्यक्ति, परिवार,समाज  और राष्ट्र को सशक्त, संस्कारित तथा आत्मनिर्भर बनाना है। इन्हीं चार स्तम्भों के आधार पर हम अत्यन्त पवित्र उद्देश्य के साथ निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं।

हमारा प्रयास मनुष्यत्व से ईश्वरत्व की ओर आरोहण का है। यह मार्ग आत्मसंयम, सदाचार, सेवा, त्याग और लोकमंगल से प्रशस्त होता है। किन्तु जो व्यक्ति, संस्था, दल या विचारधारा समाज में विभाजन, स्वार्थ, हिंसा, घृणा अथवा नैतिक पतन को बढ़ावा दे रही हो वह राष्ट्रसेवा के आदर्श को  चरितार्थ नहीं कर सकती। यह सदैव हम ध्यान में रखें l


श्रीरामचरितमानस में धर्मरथ वाला प्रसंग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है 

धर्मरथ हमारी शक्ति और भक्ति का आधार है l हनुमान जी  जो निश्चिन्त और निष्काम भक्त हैं और जिनके जीवन में दुविधा का कोई स्थान नहीं, से इतर विभीषण दुविधाग्रस्त भक्त हैं तभी वे प्रश्न करते हैं 

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥ अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥१ll 

इसका क्या उत्तर मिलता है इसकी प्रतीक्षा हम कल तक करें 


और इसके अतिरिक्त किस प्रकार के शिक्षकों की आवश्यकता है भैया पुनीत जी और भैया अजीत जी का उल्लेख क्यों हुआ, उन्नाव विद्यालय में इस समय कौन से कार्य चल रहे हैं जानने के लिए सुनें

24.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी / एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०२

 ओ वीर वंशधर फिर अपना इतिहास पढ़ो।

अभिमंत्रित कर लो अपनी कुलिश-कृपाणों को।

आतंकी पारावार ज्वार पर इतराता,

संधान करो तरकश के पावक वाणों को।

आ गया समय फिर से अंगार उगलने का,

अरिदल से कह दो आओ काल बुलाता है।।६।।

*आओ काल बुलाता है*

पृष्ठ ६०, ६१, ६२

गीत मैं लिखता नहीं हूं

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी / एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०२

जब राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है, तब व्यक्तिगत आग्रह, अहंकार, मतभेद और विवाद स्वतः ही गौण हो जाते हैं। ऐसे समय हमारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म राष्ट्र, धर्म तथा संगठन की गरिमा को बढ़ाने वाला होना चाहिए।

आइए, हम स्वयं से एक प्रश्न करें—क्या हमारी चर्चा और हमारा व्यवहार राष्ट्र, धर्म तथा संगठन को सशक्त कर रहा है, या अनजाने में उनकी गरिमा को आहत कर रहा है ?

यदि आहत कर रहा है तो यही उचित समय है कि हम विवाद का नहीं, संवाद का मार्ग अपनाएँ, आग्रह का नहीं, समर्पण का परिचय दें  और व्यक्तिगत मतों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए आगे बढ़ें। यही हमारे वैदिक आदर्श *वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः* की सच्ची साधना है।



*वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः*

यजुर्वेद का यह दिव्य मन्त्र केवल उच्चारण का विषय नहीं, अपितु हमारे जीवन का संकल्प है। यही हमारी शक्ति,भक्ति,तत्त्वचिन्तन, विचार, संयम और कर्तव्यबोध का आधार है। इसका भाव है कि हम राष्ट्र  के लिए सदैव जागरूक रहें, सनातनी राष्ट्रभक्त समाज को जाग्रत रखें तथा धर्म, संस्कृति और सदाचार के प्रकाश से राष्ट्र का पथ आलोकित करें। हम राष्ट्र का बोध प्रबल रखें और भ्रमित होने से बचें l कालनेमियों से सावधान रहें l प्रवाहपतित होने से बचें l राष्ट्रविरोधी शक्तियों के विरुद्ध दृढ़ संकल्प के साथ खड़े हों l  अपने आत्मतत्व को हम जाग्रत करें l

ध्यान रखें 

"प्रचण्ड तेजोमय शारीरिक बल, प्रबल आत्मविश्वास युक्त बौद्धिक क्षमता एवं निस्सीम भाव सम्पन्ना मनः शक्ति का अर्जन कर अपने जीवन को निःस्पृह भाव से भारत माता के चरणों में अर्पित करना ही हमारा परम साध्य है l" 



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया ओम प्रकाश जी भैया,मोहन जी, प्रो रघुवंश जी जो जन्मजात विकलांग थे पर क्या आरोप लगा था, मुक्तियज्ञ और संघर्षगाथा की चर्चा क्यों हुई, प्रभाकर माचवे, निराला और अज्ञेय के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा, नरोस क्या है जानने के लिए सुनें