18.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२७

 कर्म के सिद्धान्त जब व्यवहार बनकर दीखते हैं 

तब भविष्यत् के सभी अंकुर सहज ही सीखते हैं 

और जब सिद्धान्त केवल सूत्रवत् रटवाए जाते 

तभी प्रवचन मंत्र सारे व्यर्थ यों ही फड़फड़ाते l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४५ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२७

यदि हमारा अन्तःसुख समाज-सेवा और भारतमाता की सेवा में समाहित हो जाए, तो इससे बढ़कर हमारे लिए आनन्द और सौभाग्य का विषय क्या हो सकता है!


हम पहले स्वयं सनातन धर्म की विशेषताओं से परिचित हों l भयों और भ्रमों में व्याकुल न हों l साथ ही नई पीढ़ी को भी सनातन धर्म के वैशिष्ट्य, उसकी उदात्त जीवन-दृष्टि, शाश्वत मूल्यों और समृद्ध परम्परा से परिचित कराना आज की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति अथवा धार्मिक अनुष्ठानों का नाम नहीं, बल्कि जीवन को सत्य, धर्म,पौरुष,शौर्य, पराक्रम,करुणा,शील,संयम, कर्तव्य, त्याग और लोकमंगल की भावना से जीने की व्यापक जीवन-पद्धति है।

हम वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता, मानस तथा अन्य ज्ञान-परम्पराओं में निहित जीवन-दर्शन से परिचित हों ताकि हम अपनी संस्कृति को केवल परम्परा के रूप में न जाने, बल्कि उसके पीछे निहित वैज्ञानिक, नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय दृष्टि को समझ सकें ।श्रीरामचरितमानस एक अद्भुत ग्रंथ है l यह पुण्य रूप, पापों का हरण करने वाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देने वाला, माया मोह और मल का नाश करने वाला, परम निर्मल प्रेम रूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका अवगाहन करते हैं उन्हें सांसारिक व्यथाएं सताती नहीं हैं वे अपने विकारों को दूर करने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं और ऊर्जस्वित, उत्साहित हो जाते हैं l

कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया,मधुमक्षिका वृत्ति क्या है,जुगल देवी विद्या मन्दिर और जय नारायण विद्या मन्दिर की चर्चा क्यों हुई, मानस रामायण किसके द्वारा रचित है जानने के लिए सुनें l




17.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष पञ्चमी (नाग पञ्चमी )विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२६

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष पञ्चमी (नाग पञ्चमी )विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४४ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२६

अपने तत्त्व को पहचानकर सत्कृत्यों को करने का संकल्प लें  भ्रमित भयभीत न हों आत्मबोधोत्सव मनाएं l


हमारी दैवीय परम्परा हमें केवल श्रद्धा करना नहीं सिखाती, वह हमें देना सिखाती है। देवता का स्वभाव ही ‘देना’ है। सूर्य बिना किसी भेदभाव के प्रकाश देता है, धरती सबको धारण करती है l हमारी संस्कृति ने इसी भाव को जीवन का आदर्श माना है।

अतः आगामी अधिवेशन, जहां आनन्दपूर्वक उत्साहपूर्वक एक साथ हम एकत्र हो रहे हैं,में  ‘दैवीय परम्परा’ का चिन्तन करते हुए स्वयं से यह प्रश्न करेंगे—मैं समाज को क्या दे रहा हूँ? राष्ट्र को क्या दे रहा हूँ?

 अधिवेशन का संकल्प बने—‘मैं समाज और राष्ट्र के लिए कुछ दूँगा।’

आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हमारे खाद्य, पेय,भाव विचार,शुद्ध हों , हम प्रेम और आत्मीयता का विस्तार करें, शक्ति, शौर्य, पराक्रम, संगठन का सदैव ध्यान रखें, हमारा धन परोपकार में प्रयुक्त हो इसका प्रयास करें, अपने भीतर ऐसी क्षमता विकसित करें कि दुष्ट शक्ति पर हम प्रहार कर सकें, हम स्वदेश -भाव सदैव बनाए रखें l हर दशा दिशा में राम -मन्त्र की महत्ता को समझें l रामात्मकता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l भगवान राम का नाम बार बार लेने के लिए कहा जाता है उसका आशय यही है कि जब हम उनका नाम लेंगे तो उनका कार्य व्यवहार भी हमारे सम्मुख होगा l उन्होंने समाज के सारे कष्ट दूर कर दिए l उन्होंने बहुत कुछ किया l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अयोध्या में होने जा रहे राजतिलक के वर्णन में क्या बताया 

दूसरा बैल चारा क्यों नहीं खाता था,भैया मनीष कृष्णा जी, भैया पंकज श्रीवास्तव जी, भैया संजय गर्ग जी और भाभी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

16.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४३ वां* सार -संक्षेप 

स्थान : नई दिल्ली 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२५

हमें अपने भीतर निहित ऊर्जा, ऊष्मा, पौरुष, विक्रम, शौर्य, पराक्रम और तिग्मता आदि  जीवनदायी तत्त्वों के स्वरूप और सामर्थ्य को समझते हुए अपनी जीवनचर्या को इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए कि हमारी जीवनशक्ति अनुशासन, साधना, पुरुषार्थ और सृजन के रूप में सार्थक दिशा प्राप्त करे।



हमें जीवन में विभिन्न भूमिकाएँ प्राप्त होती हैं। यही इस नाम-रूपात्मक जगत की विविधता और आनन्द है यही परमात्मा की लीला है lअतः हमें जो भी भूमिका प्राप्त हो, उसमें पूर्ण मनोयोग, निष्ठा और समर्पण के साथ रम जाना चाहिए। भगवान श्रीराम इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं वे अपनी प्रत्येक भूमिका में पूर्णतः रमे और इसी कारण जन-जन के हृदय में भी रम गए।

 राम-राज्य, जिसमें जनता शासक के साथ समरूप हो गयी की, चर्चा हम आज भी करते हैं, जबकि उनके पूर्वजों के राज्य भी उसी परम्परा में धर्म, न्याय, लोककल्याण और सुशासन के आदर्श रहे थे ।तथापि रामराज्य का स्मरण विशेष रूप से इसलिए होता है कि भगवान् राम ने राजसत्ता को केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और लोकमंगल की साधना बना दिया था।

भगवान राम धर्म का उपदेश देने वाले नहीं अपितु धर्म को अपने जीवन में साकार करने वाले हैं l वे अपने सामर्थ्य का श्रेय स्वयं को नहीं देते। वे जानते हैं कि मनुष्य कितना ही सामर्थ्यवान क्यों न हो, उसके जीवन में गुरु, संस्कार, शिक्षा और कृपा का महत्त्व अत्यन्त बड़ा है। तभी भगवान राम कहते हैं 


गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥3॥


गुरु वसिष्ठ/वशिष्ठ हमारे कुल के पूजनीय गुरु हैं। इन्हीं की कृपा से मैंने रणभूमि में दानवों का संहार किया l यही रामत्व है यही मनुष्यत्व है l मनुष्यत्व की अनुभूति करते हुए ही हमें शक्ति बुद्धि संयम स्वाध्याय और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत जनों का कुटुम्ब अर्थात् संगठन निर्मित करना है l

दीनदयाल शोध संस्थान की चर्चा क्यों हुई,आचार्य जी ने अपने महाविद्यालय का कौन सा प्रसंग बताया, अधिवेशन का हेतु क्या है, छोटी सी पिपहरी क्या है जानने के लिए सुनें l

15.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२४

 अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

(मनुष्यता : मैथिली शरण गुप्त )


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४२ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२४

हम सद्विचारों को ग्रहण करने का सदैव प्रयास करें, ताकि मन में विकार उत्पन्न हों भी, तो सद्विचारों के प्रकाश से उनका शीघ्र निरसन हो जाए।

हम अखण्ड हिन्दू राष्ट्र के उस गौरवशाली स्वरूप का चिन्तन करें , जिसकी प्राचीन धरा का अतीत तेजस्विता, पराक्रम, शौर्य और सांस्कृतिक वैभव से अनुप्राणित रहा है।




संसार की इस विराट् लीला का संचालन किसी अदृश्य शक्ति की विधि-व्यवस्था से हो रहा है। वह शक्ति स्वयं अदृश्य है, पर उसकी व्यवस्था के पदचिह्न सर्वत्र दिखाई देते हैं। हम उन्हीं दृश्य संकेतों के माध्यम से उस अदृश्य सत्ता को समझने और उसे देखने का प्रयास करते हैं। हम मनुष्य के रूप में जन्मे हैं इस कारण हमें मनुष्यत्व की अनुभूति होनी ही चाहिए l हम सौम्य, शिष्ट, सुसंस्कृत, शान्त, सुशील बनें अपनी तृष्णाओं को असीमित न रखें संतुष्ट रहने का प्रयास करें l हम अपने जीवन को सतत उद्यम, पुरुषार्थ और कर्मशीलता से सार्थक बनाएं जैसे भगवान राम ने अपने जीवन को सार्थक बनाया l

इस समय हम उन्हीं की कथा में प्रविष्ट हैं भगवान राम रावण को पराभूत कर अयोध्या पहुंच चुके हैं 


हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा॥

अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे॥4॥


माताएं बार-बार हृदय में विचारती हैं कि इन्होंने लंकापति रावण को कैसे मारा? मेरे ये दोनों बच्चे अर्थात् भगवान राम और लक्ष्मण बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो ब़ड़े भारी योद्धा और अत्यन्त बली थे

माताओं को अवर्णनीय आनन्द की अनुभूति हो रही है l अयोध्या में सभी लोग प्रसन्न हैं l

भगवान राम का व्यवहार देखिए 

पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए॥

गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥3॥

श्री रघुनाथजी ने सब सखाओं को बुलाया और सबको सिखाया कि मुनि के चरणों में लगो। ये गुरु वशिष्ठ जी हमारे कुलभर के पूज्य हैं। इन्हीं की कृपा से रण में राक्षस मारे गए हैं॥

यह है रामत्व 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया आज आचार्य जी कहां जा रहे हैं, भैया मनीष जी ने क्या योजना बनाई जानने के लिए सुनें l

14.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२३

 इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥

सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥1॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२३


जीवनपर्यन्त सीखते रहने की जिज्ञासा बनाए रखें, क्योंकि सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। और सीखने के पश्चात् सिखाने का भाव भी सदैव बनाए रखें ताकि शिक्षकत्व की शक्ति मलिन न हो l अपने संगठन युगभारती में प्रेम और आत्मीयता का विस्तार करें l 





गोस्वामी तुलसीदास जी, जिन्हें ‘कविकुल-कमल-दिवाकर’ कहा गया है, श्रीरामचरितमानस के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि परिवार-भाव अत्यन्त अद्भुत और जीवनदायी होता है। यदि कभी मन में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न हो जाए, तो उसे द्वेष या वैमनस्य से नहीं, बल्कि सद्विचारों के द्वारा दूर करना चाहिए। परिवार और संगठन इसी भाव पर टिके रहते हैं।

रामकथा हमें यह संकेत भी देती है कि रामत्व क्या है और रावणत्व क्या है। रामत्व में अपने आत्म को परमात्मतत्त्व में समर्पित कर देना लक्ष्य है l रामत्व में विद्या ज्ञान के लिए धन दान के लिए और शक्ति रक्षा के लिए है रावणत्व में  विद्या वादविवाद के लिए, धन मद पैदा करने के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए है साथ ही रावणत्व में निजहित और अहङ्कार की प्रधानता है, जबकि रामत्व में समष्टि, समन्वय और संगठन का भाव है। रावण के पक्ष में स्वार्थ और विभाजन की प्रवृत्ति दिखाई देती है; इसके विपरीत  प्रभु श्रीराम बिखरे हुए समाज को एक सूत्र में पिरोते हैं। वनवासी आदि विभिन्न समुदायों को साथ लेकर वे एक संगठित शक्ति का निर्माण करते हैं और इसी सामूहिक शक्ति तथा संगठन-भाव के द्वारा रावण का पराभव करते हैं। अकबर के शासन के कारण उपजी विषम परिस्थितियों में तुलसीदास जी ने रामकथा के द्वारा यही संकेत दिया कि संगठन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l 

कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया 

 आचार्य जी ने बलराज मधोक द्वारा लिखित *पाकिस्तान का आदि और अंत* पुस्तक की चर्चा क्यों की  युगपुरुष दीनदयाल जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l