10.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९८ वां* सार -संक्षेप


कागभुशुण्डी जी का मन निर्गुण ब्रह्म में नहीं रमता (...अज अद्वैत अगुन हृदयेसा॥

अकल अनीह अनाम अरूपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा॥2॥)

वे कहते हैं 

राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥

सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया॥5॥

यह प्रसंग है श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि जी और लोमश ऋषि के संवाद से सम्बन्धित । काकभुशुण्डि जी अपनी रामभक्ति की दृढ़ता व्यक्त करते हुए लोमश ऋषि से कहते हैं 

 भगवान राम की भक्ति रूपी जल में मेरा मन मछली के समान रम गया है।

मनुष्य इस संसार में विविध रुचियां लेकर अपना जीवनयापन करता है l मेरी रुचि भगवान राम के दर्शन में है l

 जिस प्रकार मछली जल से अलग होकर जीवित नहीं रह सकती, उसी प्रकार मेरा मन भगवान राम की भक्ति से अलग होकर नहीं रह सकता। अतः मुझे भक्ति से विमुख करने का प्रयास न करें।

हे मुनिवर! आप कृपा करके मुझे ऐसा उपदेश दीजिए, जिससे मैं अपने नेत्रों से श्रीरघुनाथ जी के दर्शन कर सकूँ। 

श्रीरामचरितमानस एक ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जिससे हमारे अनेक संशय दूर होते हैं l भगवान राम के सामने राजसिंहासन था, राज्य का वैभव था, सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन था; किन्तु उन्होंने पिता के वचन की मर्यादा और रघुकुल की परम्परा को सर्वोपरि माना। उन्होंने राज्य के लिए धर्म का परित्याग नहीं किया, अपितु धर्म की रक्षा के लिए राज्य का सहज भाव से त्याग कर दिया।

भगवान् श्रीराम का वनपथ पर जाना भारतीय जीवन-दर्शन की एक अद्भुत घटना है।वनवास श्रीराम के लिए ऋषियों की रक्षा, दुष्टों के दमन और धर्म की स्थापना का अभियान बन जाता है। हमारा भी ऐसा ही अभियान है l राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाना हमारा लक्ष्य है इसे हमें सदैव ध्यान में रखना है l


इसके अतिरिक्त करपात्री जी  के गुरु नारायण खत्री इंटर कालेज वाले किस प्रसंग का उल्लेख हुआ, किन प्रमुखों की बैठक की जा सकती है, श्रीकृष्ण गोपाल जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

9.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९७ वां* सार -संक्षेप


हममें से कदाचित् ही कोई ऐसा हो, जिसके हृदय में भारतमाता के प्रति प्रेम का भाव न हो l इसकी जड़ें हमारी सनातनधर्मी परम्परा, हमारी संस्कृति और हमारे पारिवारिक संस्कारों में गहराई तक समाई हुई हैं l मातृभूमि के प्रति प्रेम का भाव भी हमारे संस्कारों से पुष्ट होता है।

“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” 

 हमारी सनातन जीवनदृष्टि हमें व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक आत्मीयता का विस्तार करना सिखाती रही है। ऐसी थी हमारी शिक्षा l जिस शिक्षा से आत्मबल, आत्मविश्वास और कर्तव्यबोध जाग्रत हो, जो भोग की अपेक्षा त्याग तथा पलायन की अपेक्षा पुरुषार्थ सिखाए, वही शिक्षा जीवन को सार्थक बनाने वाली शिक्षा है। ऐसी शिक्षा का उद्देश्य, मनुष्य के व्यक्तित्व को इस प्रकार विकसित करना  कि वह जीवन के उतार-चढ़ावों में व्याकुल न हो, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य न खोए और अपने कर्तव्यों से विमुख न हो, है l शिक्षक को ऐसा ही होना चाहिए जो इस प्रकार की शिक्षा दे जो केवल पाठ्यक्रम पर ही ध्यान न दे अपितु शिष्य के जीवन को उचित दिशा दे l ऐसा ही शिक्षक कह रहा है 

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।

साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल॥108 घ॥



( जब काकभुशुण्डि जी अपने पूर्वजन्म में शिवजी के मंदिर में शिवनाम का जप कर रहे थे, तब उनके मन में अहंकार आ गया और उन्होंने मंदिर में आए अपने गुरु का सम्मानपूर्वक अभिवादन नहीं किया। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने उन्हें शाप दे दिया।

किन्तु उनके गुरु ने अपने शिष्य के कल्याण की कामना करते हुए भगवान शिव से प्रार्थना की कि उस पर कृपा करें और शाप को शीघ्र ही उसके परम कल्याण का साधन बना दें। )


हे कृपानिधान! अब वही कीजिए, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरे के हित में रत ब्राह्मण की वाणी सुनकर पुनः आकाशवाणी हुई- 'एवमस्तु' l

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, विद्यालय का कौन सा प्रसंग चर्चा में आया जानने के लिए सुनें l

8.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९६ वां* सार -संक्षेप

 बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥89 क॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९६ वां* सार -संक्षेप


“सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग।

बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग॥”

हमारे जीवन में गुरु

( शान्तो दान्तः कुलीनश्च विनीतः शुद्धवेशवान्।

शुद्धाचारः सुप्रतिष्ठः शुचिर्दक्षः सुबुद्धिमान्॥

आश्रमी ध्याननिष्ठश्च मन्त्रतन्त्रविशारदः।

निग्रहानुग्रहे शक्तो गुरुरित्यभिधीयते॥ ) का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय सनातन परम्परा में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य, रामानन्दाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, ज्ञानेश्वर, नामदेव, रैदास, कबीर, दादूदयाल, गुरु नानक, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, समर्थ रामदास, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि गुरुओं की एक दीर्घ परम्परा रही है। इन गुरुओं ने समय - समय अपने ज्ञान, साधना और लोकमंगलकारी विचारों से समाज का मार्गदर्शन किया तथा भारत को भ्रम, अज्ञान और सांस्कृतिक विस्मृति से बचाते हुए सनातन जीवन-दृष्टि को सुदृढ़ बनाए रखा।

गुरु हमारे जीवन में केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि पथप्रदर्शक और पथरक्षक होता है। वह हमें पथभ्रष्ट होने से बचाता है, उचित-अनुचित का विवेक कराता है और जीवन को उचित दिशा देता है।


किन्तु आज नई पीढ़ी को प्रभावित करने वाले अनेक विचार और प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं, जिनके कारण यह धारणा बनती जा रही है कि जीवन में गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है—स्वयं ही सब कुछ जाना और समझा जा सकता है। यह स्थिति चिन्तनीय है। नई पीढ़ी के लिए भी गुरु आवश्यक है क्योंकि 

"गुरु" गौरव शक्ति प्रदाता है, 

गुरु  प्रेम भक्ति का दाता है। 

गुरु आत्मबोध का ज्ञाता है, 

गुर-शिष्य  अखण्डित नाता है ॥


हमें ही अपने गुरुत्व को निःस्वार्थ भाव से जाग्रत करना होगा और शिष्यों को भय भ्रम कुंठा से बचाना होगा l

कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया? भगवान शिव कैसे महागुरु हैं ? शिव जी की लाट क्या है? जानने के लिए सुनें l

7.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९५ वां* सार -संक्षेप

 जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥

त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥3॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९५ वां* सार -संक्षेप


एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।

गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥106 क॥


काकभुशुण्डि जी अपने पूर्वजन्म की चर्चा करते हुए गरुड़ जी से कहते हैं—हे पक्षीराज! एक बार मैं भगवान शिव के मंदिर में बैठकर निरन्तर ‘शिव’ नाम का जप कर रहा था। उसी समय मेरे गुरु वहाँ आए। परन्तु मेरे भीतर अभिमान उत्पन्न हो गया था; इसलिए गुरु को सामने आया देखकर भी मैं अपने स्थान से उठकर खड़ा नहीं हुआ और उन्हें प्रणाम भी नहीं किया।

‘गुरु’ को केवल सामान्य शिक्षक मानना पर्याप्त नहीं है ।  गुरु ज्ञानदाता, संस्कारदाता और जीवन का मार्गदर्शक है। इसी कारण गुरु के आने पर अभिमानवश उठकर प्रणाम न करना गंभीर दोष के रूप में सामने आता है। सनातनधर्मी सिद्धान्त यह है कि यदि हम किसी सिद्धमूर्ति के सामने पूजा कर रहे हैं तो किसी के भी वहां आने पर हम उसे प्रणाम नहीं करेंगे किन्तु यदि गुरु आये हैं तो पूजन में भंग डालकर उन्हें प्रणाम करेंगे क्योंकि गुरु प्रथम है l


गुरु के हृदय में करुणा, वात्सल्य और शिष्य के प्रति आत्मीयता होती है। वह शिष्य की जिज्ञासा को समझता है, उसकी भूलों का परिष्कार करता है और उसे जीवन के सत्य का बोध कराता है।


किन्तु गुरु के प्रति अनादर देखकर भगवान शिव के मन में  क्रोध उत्पन्न हुआ। उन्होंने काकभुशुण्डि जी को शाप दिया कि उनके अहंकार का परिणाम उन्हें भोगना पड़ेगा।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, विद्यालय की चर्चा क्यों हुई, स्तुत के क्या अर्थ हैं जानने के लिए सुनें l

6.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९४ वां* सार -संक्षेप

 एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।

गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥106 क॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९४ वां* सार -संक्षेप

श्रीरामचरितमानस एक अद्भुत काव्यग्रंथ भी है। इसकी महिमा जितनी कही जाए, उतनी ही कम है। इसे पढ़कर और सुनाकर असंख्य लोगों ने यश प्राप्त किया है आजीविका अर्जित की है; आज भी अनेक लोग इसके माध्यम से यश और धन दोनों प्राप्त कर रहे हैं श्रीरामचरितमानस एक ऐसा जीवनोपयोगी ग्रंथ है, जिससे हमें लोकव्यवहार की शिक्षा, कर्तव्य-बोध, मर्यादा, नीति, विवेक और जीवन जीने की कला प्राप्त होती है। इसके प्रत्येक प्रसंग में मनुष्य के जीवन को दिशा देने वाला कोई न कोई संदेश निहित है,इसका व्यावहारिक परामर्श अद्वितीय है l

श्रीरामचरितमानस का श्रवण, मनन और अनुशीलन अमंगल का नाश करने वाला तथा मंगल का संवर्धन करने वाला है। इसकी कथा और श्रीराम के चरित्र का चिंतन करते ही मन को तत्काल आनन्द प्राप्त होता है। यह आनन्द केवल क्षणिक मनोरंजन का नहीं, बल्कि अन्तःकरण को शान्ति, आश्वस्ति और प्रसन्नता प्रदान करने वाला है।


कागभुशुण्डी जी कहते हैं

हे पक्षीराज! सुनिए, अब मैं अपने प्रथम जन्म के चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभु के चरणों में प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं॥


पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।

नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥96 ख॥

किन्तु यह भी एक सिद्धान्त है कि अनेक विकारों के मध्य  सद्विचारों का भी अस्तित्व रहता है l

तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में शैव और वैष्णव परम्पराओं का अद्भुत समन्वय किया। उन्होंने भगवान शिव को भगवान राम का अनन्य भक्त और भगवान राम को भगवान शिव का परम आराध्य दिखाकर दोनों सम्प्रदायों के बीच सेतु बनाया।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मम्मट का नाम क्यों लिया, अहंकारी भक्त कौन है जानने के लिए सुनें l