7.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४७

 सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दु:ख गन॥

पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं॥1॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६५ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४७

भैया मनीष कृष्णा जी,बैच १९८८ की माताजी का हमारे बीच न रहने का समाचार अत्यन्त पीड़ादायक है। इस दुःखद घड़ी में हम सभी की गहरी संवेदनाएँ उनके एवं समस्त परिवार के साथ हैं।




माताजी का सरल, संयमित और संस्कारमय जीवन सदैव स्मरणीय रहेगा। उन्होंने अपने आचरण से  सिखाया कि व्यसनों से दूर रहकर सादगी और शुचिता का जीवन जीना चाहिए तथा किसी के धन का लालच कभी नहीं करना चाहिए। ऐसे जीवन-मूल्यों की उनकी सीख सदैव प्रेरणास्रोत रहेगी।

ईश्वर दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा सभी परिजनों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 🙏


मनुष्य के जीवन का एक अद्भुत विधान परमात्मा ने बनाया है—दुःख बाँटने से दुःख कम होता है और सुख बाँटने से सुख बढ़ता है। जब किसी के दुःख में हम अधिक संख्या में सम्मिलित होते हैं, उसके साथ खड़े होते हैं, तो उसका दुःख हल्का हो जाता है। और जब हम किसी के सुख में सम्मिलित होते हैं, तो उसका सुख और अधिक वृद्धिंगत हो जाता है।

यही मनुष्य-जीवन का सामाजिक और आध्यात्मिक सत्य है। परमात्मा ने मनुष्य को अकेला नहीं बनाया। मनुष्य मनुष्य से जुड़ता है, जीवात्माएँ संगठित होती हैं, तो उनमें परमात्म-भाव प्रकट होता है। संगठन केवल संख्या का नाम नहीं, बल्कि हृदयों के मिलन, परस्पर सहयोग और एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहभागी होने का नाम है।

ईश्वर ने हमें इस संसार में मनुष्य बनाकर कर्म करने के लिए भेजा है। प्रत्येक व्यक्ति के कर्म अलग हैं, परिस्थितियाँ अलग हैं और उसके कर्तव्य भी अलग-अलग हैं। इसलिए हमें अपने कर्तव्य-पथ से विमुख नहीं होना चाहिए। संसार में रहते हुए अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति निर्धारित धर्म और कर्म का निर्वाह अवश्य करें,जीवन में अनेक व्यथाएँ आएँगी, अनेक कठिनाइयाँ आएँगी। हमें उन सबको सहते हुए, अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए आगे बढ़ना है। जीवन की कथा तब पूर्ण होती है, जब हम अपनी सारी व्यथाओं को पीकर भी अपने कर्तव्य-पथ से विचलित न हों।

भगवान श्रीकृष्ण का अमर संदेश हमें इसी ओर प्रेरित करता है—

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

रामकथा भी यही संदेश देती है उस कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया जानने के लिए सुनें

6.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४६

 जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥

पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥1॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६४ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४६

आगामी अधिवेशन के लिए सज्ज हो जाएं 


ये सदाचार वेलाएं अद्भुत हैं इन वेलाओं के श्रवण से हमें शान्ति प्राप्त होती है यह हमारे इष्ट हनुमान जी, जो इस कलिकाल में भी हर स्थान पर छाए हुए हैं,जो आज भी श्रीराम के कार्य और धर्म की रक्षा के लिए उपस्थित हैं,की कृपा है l जब हमारे साथ पवनपुत्र हनुमान जी का आश्रय है, तब हमें भय कैसा?

आगामी अधिवेशन की तैयारी अभी से प्रारम्भ कर दें।  ये अधिवेशन हम नहीं कर रहे हैं हमसे करवाया जा रहा है हम तो मात्र पात्र हैं जब हम यह विचार करेंगे तो व्याकुल,निराश और हताश नहीं होंगे । हमारे सामने जो समस्याएँ दिखाई दे रही हैं, वे हमें रोकने के लिए नहीं, बल्कि उनके समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाली हैं। हम मिलकर उनका समाधान खोजेंगे।

जब हम सभी वहाँ एकत्र होंगे, तो अपने-अपने प्रश्नों और जिज्ञासाओं को लेकर आएँगे और सामूहिक चिन्तन एवं मार्गदर्शन से अपने अनेक प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करेंगे। साथ बैठना, विचारों का आदान-प्रदान करना और एक-दूसरे से प्रेरणा लेना—यह सामूहिक आनन्द वास्तव में अवर्णनीय होगा।

और सबसे महत्त्वपूर्ण बात—जब हम अधिवेशन से वापस लौटेंगे, तो केवल स्मृतियाँ लेकर नहीं लौटेंगे, बल्कि एक सुस्पष्ट लक्ष्य, नई ऊर्जा, दृढ़ संकल्प और अपने कर्तव्य की स्पष्ट दिशा लेकर लौटेंगे।

अतः अभी से स्वयं को तैयार करें—मन से भी, विचार से भी और कर्म से भी आगामी अधिवेशन हमारे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आगे की यात्रा के लिए दिशा-निर्धारण का अवसर है।

ऐसा ही सुस्पष्ट लक्ष्य भगवान राम के सामने था जो पूर्ण हो चुका है और वो राजा के रूप में विद्यमान हैं राम- राज्य चल रहा है 


बाज़ार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।

जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥

बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।

सब सुखी सब सच्चरि सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥

अयोध्या के बाजार इतने सुंदर और समृद्ध हैं कि उनका वर्णन करते नहीं बनता। वहाँ आवश्यक वस्तुएँ सहज ही उपलब्ध हो जाती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति भगवान श्रीराम राजा के रूप में विराजमान हों, वहाँ की संपत्ति और समृद्धि का भला किस प्रकार वर्णन किया जा सकता है?

वहाँ बजाज अर्थात् वस्त्रों का व्यापार करने वाले, सराफ अर्थात् धन-आभूषण आदि का व्यवसाय करने वाले तथा अनेक प्रकार के वणिक (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो वे अनेक कुबेर हों।


रामराज्य में अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल धन का संचय नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का सुख और सदाचार था। बालक से लेकर वृद्ध तक और स्त्री से लेकर पुरुष तक—प्रत्येक व्यक्ति उस व्यवस्था में अपने जीवन को सुरक्षित, सुखी और सार्थक अनुभव करता था।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों की चर्चा क्यों हुई, भैया अरविन्द जी का उल्लेख क्यों हुआ, उन्नाव के बाजार का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

5.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६३ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४५

शिक्षा के स्वरूप में परिवर्तन आज की महती आवश्यकता है।

वर्तमान शिक्षा केवल ज्ञान और रोजगार तक सीमित न रह जाए, बल्कि वह मनुष्य के भीतर चरित्र, संस्कार, विवेक, आत्मविश्वास, कर्तव्यबोध और राष्ट्रबोध का निर्माण करे—इस दिशा में गम्भीर चिन्तन आवश्यक है।

इसी महत्वपूर्ण विषय पर आगामी अधिवेशन में व्यापक चर्चा और विचार-मंथन होने जा रहा है। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के पुनर्निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर है।

अतः हम सभी उत्साह, उमंग और सकारात्मक मनोभाव के साथ अधिवेशन में भाग लेने के लिए सज्ज हो जाएँ।



सनातन जीवन-दृष्टि अत्यन्त संतुलित और संयमित जीवन का मार्ग दिखाती है। मनुष्य के भीतर भी समय-समय पर अनेक विकार उत्पन्न होते हैं। जब ये विकार धीरे-धीरे बढ़ते हुए एकत्रित और प्रबल हो जाते हैं, तब वही विकार रावणत्व का रूप धारण कर लेते हैं।

रावण के जीवन का मूल भाव भोग था और उसमें भी कामासक्ति का अत्यन्त विकृत रूप दिखाई देता है। कामना जब मर्यादा और संयम की सीमा को लाँघ जाती है, तब वह मनुष्य को इतना व्याकुल और विवेकहीन बना देती है कि उसका आचरण पशु से भी अधम हो सकता है। इसलिए मनुष्य के भीतर रावणत्व का जितना अधिक निराकरण होगा, समाज उतना ही अधिक स्वस्थ, सुरक्षित और व्यवस्थित रहेगा।

इसी संदर्भ में बहुविवाह की प्रवृत्ति पर भी विचार करने की आवश्यकता है। भारतीय जीवन-दृष्टि ने दाम्पत्य को केवल भोग का साधन नहीं माना, बल्कि उसे निष्ठा, उत्तरदायित्व, संयम और पारस्परिक समर्पण का सम्बन्ध माना है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में रामराज्य की व्यवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है—

सब उदार सब पर उपकारी।

बिप्र चरन सेवक नर नारी॥

*एकनारि ब्रत रत सब झारी।*

ते मन बच क्रम पति हितकारी॥

इसका भाव है कि रामराज्य में सभी नर-नारी उदार और परोपकारी हैं। पुरुष एक-पत्नी-व्रत का पालन करते हैं और स्त्रियाँ मन, वचन तथा कर्म से पति के हित में समर्पित रहती हैं। यहाँ दाम्पत्य जीवन में संयम, निष्ठा और कर्तव्य को सामाजिक व्यवस्था का आधार माना गया है। जब कि  कुछ अन्य पंथों में ऐसा नहीं हैं l 

रामराज्य केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि जीवन और समाज की एक आदर्श व्यवस्था है। इसलिए रामराज्य पर गम्भीर चिन्तन, मनन, विचार, अध्ययन और स्वाध्याय की आवश्यकता है। इन सबमें यदि भावनाओं और जीवन-मूल्यों का समावेश नहीं होगा, तो हमारा अध्ययन केवल बौद्धिक अभ्यास बनकर रह जाएगा और हम अनेक प्रकार के भ्रमों में पड़ सकते हैं।

मनुष्य के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे विकार कुछ-न-कुछ मात्रा में रहते हैं। इनका होना ही मनुष्य को पतित नहीं बनाता; समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इनमें से कोई एक विकार हमारे मन और व्यवहार पर प्रमुख रूप से अधिकार कर लेता है। तब व्यक्ति का विवेक कमजोर पड़ने लगता है और उसका जीवन संतुलन खो देता है।

मनुष्य होने का वास्तविक अर्थ ही यह है कि हम अपने भीतर उठने वाली प्रवृत्तियों के बीच संतुलन, संयम और विवेक बनाए रखें। भगवान श्रीराम के जीवन में यही अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे शक्ति रखते हुए भी संयमित हैं, अधिकार रखते हुए भी मर्यादित हैं, संकटों के बीच भी धैर्यवान हैं और विजय प्राप्त करने के बाद भी अहंकाररहित हैं।

इसी मर्यादा, संयम, निष्ठा, कर्तव्य और संतुलन ने हमारे जीवन-मूल्यों को सुरक्षित रखा है। इन्हीं जीवन-मूल्यों ने हमारी सनातन जीवन-दृष्टि को युगों की अनेक चुनौतियों के बीच जीवन्त बनाए रखा है।

आज आवश्यकता है कि हम रामराज्य को केवल एक आदर्श शासन-व्यवस्था के रूप में न देखें, बल्कि उसे अपने व्यक्तिगत जीवन, परिवार, समाज और राष्ट्र के आचरण का मार्गदर्शक बनाएँ। अपने भीतर के रावणत्व को पहचानें, उसे सीमित करें और अपने भीतर के रामत्व—विवेक, मर्यादा, संयम, करुणा, कर्तव्य और संतुलन—को निरन्तर विकसित करें। यही इन वेलाओं का उद्देश्य है कि हम अपना चैतन्य जाग्रत करें l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया कृपा शंकर जी का नाम क्यों लिया,श्री ओमेन्द्र रत्नु की चर्चा  क्यों हुई, हल्दी घाटी, जौहर का उल्लेख क्यों हुआ, घरवापसी क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

4.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४४

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६२ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४४


आगामी अधिवेशन को सफल बनाने हेतु अपने योगदान के लिए सज्ज हो जाएं l



आगामी अधिवेशन केवल एक कार्यक्रम न होकर व्यक्ति के मानस को दिशा देने वाला अनुभव बने—यह हमारा प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए। युगभारती के सदस्यों सहित जो भी लोग वहाँ आएँ, उन्हें ऐसा सात्त्विक, आत्मीय और प्रेरणादायी परिवेश मिले कि वे भीतर से उत्साहित होकर लौटें और अपने जीवन को स्वदेश, कर्तव्य तथा आत्मबोध के अनुकूल बनाने का संकल्प लेकर जाएँ।


हमारा प्रयास हो कि व्यक्ति जब अधिवेशन में प्रवेश करे तो उसे आनन्द और अपनापन मिले इसके लिए हमें अपने दंभ का निरसन भी करना होगा, सहज होना होगा , साथ ही चिन्तन और प्रेरणा मिले और लौटते समय उसके भीतर एक स्पष्ट भाव हो—

“मैं अपने स्वदेश के लिए उपयोगी बनूँगा, अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाऊँगा और अपने आत्मस्वरूप के अनुरूप जीवन जीने का प्रयास करूँगा।”

अधिवेशन में संगोष्ठी का विषय है 

“विकसित भारत के लिए सुदृढ़ शिक्षा तंत्र”

 जिस प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता है उसके आधार पर शिक्षित व्यक्ति अपने शरीर की सीमा को जानता है अपने जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाता है  सदाचारमय जीवन व्यतीत करता है उसे आत्म का बोध रहता है चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति रहती है l

शिक्षा का  लक्ष्य केवल अर्थोपार्जन नहीं, बल्कि मनुष्यत्व का विकास है।


(🪷 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक मंगलकामनाएँ 🪷

श्रीकृष्ण का अवतरण केवल एक दिव्य घटना नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना, अधर्म के विनाश और मानव-हृदय में परमात्म-चेतना के जागरण का संदेश है।

इस पावन जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना है कि हमारे भीतर का अज्ञान दूर हो, विवेक जाग्रत हो, मन निर्मल हो, कर्म निष्काम हों और जीवन धर्ममय बने।

हम श्रीकृष्ण के गीता-संदेश को अपने जीवन में उतारें—

कर्तव्य करते रहें, फल की आसक्ति त्यागें और प्रत्येक कर्म को परमात्मा को समर्पित करें।

भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से हमारे अंतःकरण में प्रेम, भक्ति, शुचिता, संयम और आत्मबोध का प्रकाश प्रज्वलित हो।

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…”

🙏 जय श्रीकृष्ण! 🦚

हरे कृष्ण। )



युवा फिल्म निर्माता अनुप्रिया नागर की नीम करौली बाबा पर आधारित फिल्म 'हनुमान अंश' की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की, रामकथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया, समर्पित भक्ति क्या है,चिरं शृणोति क्या है जानने के लिए सुनें l

3.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४३

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४३


हम अपने भीतर स्थित दिव्य तत्त्व को पहचानें, अपने जीवन को व्यवस्थित एवं मर्यादित करें और अपने प्रत्येक कर्म को लोकमंगल की भावना से जोड़ें l संगठन में व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा न रखें l


श्रीरामचरितमानस में अवगाहन करते हुए हम अपने जीवन को अधिक व्यवस्थित, संयमित, शान्त और आनन्दमय बनाने का सतत प्रयास करें। मानस केवल पढ़ने का ग्रन्थ नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली अमूल्य साधना है। माया मनुष्य बनकर प्रभु राम ने जो सांसारिक लीला की उस पर हम विश्वास करें l  इस ग्रंथ के आदर्शों और शिक्षाओं को अपने आचरण में उतारकर हम अपने भीतर शान्ति, सद्भाव, संयम, शौर्य, पराक्रम, तप, त्याग और आनन्द का विकास कर सकते हैं।

हम सबके जीवन में इस साधना का भाव जाग्रत हो और हम मानस के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक एवं मंगलमय बना सकें—इसी दिशा में आचार्य जी निरन्तर हमारा मार्गदर्शन और प्रयत्न कर रहे हैं।

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।

मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥23॥


चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से पृथ्वी को उसी प्रकार परिपूर्ण करता है, जितना उसके लिए आवश्यक है और सूर्य भी उतना ही तपता है, जितना आवश्यक है। बादल भी जब जल की आवश्यकता होती है, तभी माँगने पर पर्याप्त वर्षा करते हैं।

अर्थात् श्रीरामचन्द्र जी के राज्य में प्रकृति भी मर्यादा और संतुलन के अनुरूप कार्य करती है। न अधिक गर्मी, न अनावश्यक वर्षा और न ही जल का अभाव—सब कुछ आवश्यकता और लोककल्याण के अनुरूप है।




आचार्य जी नित्य हमें आगामी अधिवेशन के लिए  भी प्रेरित कर रहे हैं। हमें दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि वहाँ हमें व्यवस्थित, अनुशासित, संयमित, चिन्तनशील एवं प्रेममय वातावरण प्राप्त होगा, जो हमारे मन और जीवन को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

हम सभी अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में निरन्तर व्यस्त रहते हैं। दैनिक जीवन की भागदौड़ और एकरसता के कारण मन कभी-कभी ऊब और थकान का अनुभव करने लगता है। ऐसे समय में यह अधिवेशन हमारे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मीय मिलन, सामूहिक चिन्तन, आनन्द और आत्मशुद्धि का अवसर बनेगा।

वहाँ का अनुशासित वातावरण, आत्मीयता से भरे साथी , सार्थक संवाद और प्रेरणादायी चिन्तन निश्चित ही हमारे भीतर नई स्फूर्ति और उत्साह का संचार करेंगे। अतः हम पूर्ण उत्साह और सकारात्मक भाव के साथ इस अधिवेशन की प्रतीक्षा करें, अपना शुल्क प्रदान करें और वहाँ प्राप्त होने वाले आनन्द तथा प्रेरणा को अपने जीवन और कार्यक्षेत्र में भी साथ लेकर लौटें।


इसके अतिरिक्त ओशो की चर्चा क्यों हुई,भैया रवि जी, भैया संपूर्ण सिंह जी, भैया मोहन जी, भैया यज्ञदत्त जी के नाम क्यों आये, परिवार कैसे चलता है जानने के लिए सुनें l