14.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०२

संगठन में अहमहमिका वृत्ति से बचें प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें 


सतयुग में राजा रन्तिदेव की कथा अत्यन्त करुणा, त्याग और भक्ति का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है।कहा जाता है कि एक समय उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। अन्न और जल का घोर अभाव हो गया। स्वयं राजा रन्तिदेव और उनका परिवार भी इस संकट से अछूता नहीं रहा। ऐसी स्थिति में उन्होंने ४८ दिनों तक उपवास(प्राजापत्य व्रत )किया, क्योंकि उनके पास खाने-पीने के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं था।

४८वें दिन बड़ी कठिनाई से उन्हें थोड़ा-सा अन्न और जल प्राप्त हुआ। जैसे ही वे उसे ग्रहण करने लगे, तभी क्रमशः कुछ अतिथि उनके द्वार पर आए—

पहले एक ब्राह्मण आया, राजा ने अपना भोजन उसे दे दिया।

फिर एक शूद्र आया, उसे भी अन्न दे दिया।

इसके बाद एक चाण्डाल अपने कुत्तों सहित आया, राजा ने शेष बचा अन्न भी उसे दे दिया।

अंत में एक प्यासा अतिथि आया, राजा ने अपना बचा हुआ जल भी उसे अर्पित कर दिया।

इस प्रकार ४८ दिनों की कठोर भूख और प्यास सहने के बाद भी, उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं रखा और सब कुछ दूसरों को समर्पित कर दिया।

तब देवराज इन्द्र ने प्रकट होकर बताया कि यह सब उनकी परीक्षा थी। इन्द्र ने कहा आपको सशरीर स्वर्ग चलना है तो राजा रन्तिदेव ने कहा—

 "न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्, कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्" 

 “मैं न तो स्वर्ग चाहता हूँ, न मोक्ष; मैं केवल इतना चाहता हूँ कि सभी प्राणियों के दुःख दूर हो जाएँ।”

(यह कथा भागवत पुराण में वर्णित है)

कितना सुखद है कि हमें भी सेवा का अवसर मिले 

सेवा धर्मः परम गहनो योगिनामप्यगम्यः

ये भाव और विचार हमारे भीतर उद्भूत हों इन सदाचार वेलाओं का यही उद्देश्य है 

सेवा करते समय आत्मानन्द की अनुभूति करें और साथ ही एक दूसरे के साथ मिलकर अपनी संस्था युगभारती परिवार की वृद्धि का आनन्द भी लें इससे हमें शक्ति प्राप्त होगी


*सङ्घे शक्ति: कलौ युगे*


संगठन के प्रति उदास रहो नहीं 

संगठन संसार का आधार है। 

संगठन सहयोग से ही सृष्टि है, 

संगठन ही मनुज का सुखसार है ॥

  है समाज वही सुखी जो संगठित

  हर अकेला भ्रमित पीड़ित दुखी है 

  शास्त्र अपना यही कहता आ रहा

  संगठित व्यक्तित्व ही मन्मुखी है ॥



हम कृपणता से कैसे बचें,हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया, हनुमान जी ने अपनी आभा समेट ली किसने कहा जानने के लिए सुनें

13.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०१

हम यह अनुभव करें कि परमात्मा

*बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥*

*आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥*


 हमारे भीतर स्थित है 

 हम प्रयास करें कि हमारे भीतर संसार के कल्याणार्थ विचार उत्पन्न हों 


आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम लोगों में जो भी लोग मन में उत्पन्न होने वाली नकारात्मक भावनाओं जैसे हीनता, मोह और भ्रम आदि से ग्रस्त हैं वे इन्हें त्याग दें । ये भावनाएँ व्यक्ति की सोच को संकुचित करती हैं और उसे सही निर्णय लेने से रोकती हैं। अत्यन्त महत्त्वपूर्ण  अधिवेशन  हमारे सामने है ,अतः हमें चाहिए कि हम उत्साह में आयें हम अपने मन को शुद्ध, स्पष्ट और सकारात्मक बनाएं । मन की उलझनों को दूर करके, एकाग्रता और आत्मविश्वास के साथ उस कार्य के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो जाएं ।

यह अधिवेशन समाज को यह निश्चिन्तता देने के लिए है कि अभी भारतीय संस्कृति जीवित, जाग्रत और सचेत है और यह संस्कृति हम भारतीयों के माध्यम से संपूर्ण विश्व को संदेश देना चाहती है कि शिक्षा अत्यन्त विशिष्ट है शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम को रट लेना या परीक्षा में अंक प्राप्त कर लेना नहीं है। वास्तविक शिक्षा वह है, जो मनुष्य के भीतर ज्ञान के साथ-साथ विवेक, संस्कार और जीवन जीने की कला का विकास करे। यदि शिक्षा केवल नौकरी प्राप्त करने का साधन बनकर रह जाए, तो उसका उद्देश्य सीमित हो जाता है। शिक्षा का मूल लक्ष्य व्यक्ति को सक्षम, सजग और समाजोपयोगी बनाना है, न कि केवल आजीविका अर्जित करने वाला एक साधन मात्र।

भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित थी। वहाँ विद्यार्थी केवल शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं करते थे, बल्कि जीवन के प्रत्येक पक्ष को समझते थे। गुरु के सान्निध्य में रहकर वे अनुशासन, संयम, सेवा, आत्मनिर्भरता और नैतिक मूल्यों का अभ्यास करते थे। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, आत्मविकास और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना जाग्रत करना था।

गुरुकुलों में प्रकृति के निकट रहकर विद्यार्थी सरल जीवन और उच्च विचार का अनुसरण करते थे। वहाँ ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यवहार, अनुभव और अभ्यास के माध्यम से आत्मसात किया जाता था। विद्यार्थी अपने गुरु से केवल विषयज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन भी प्राप्त करते थे।

इसके अतिरिक्त 

भैया संतोष मिश्र जी १९८८आचार्य जी से क्या पढ़ना चाहते हैं? हनुमान जी ने विद्या कैसे ग्रहण की? किसने किसने अपने मनुष्यत्व को पहचान लिया?   जानने के लिए सुनें

12.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१८ वां* सार -संक्षेप

 संगठन के प्रति उदास रहो नहीं 

संगठन संसार का आधार है। 

संगठन सहयोग से ही सृष्टि है, 

संगठन ही मनुज का सुखसार है ॥

  है समाज वही सुखी जो संगठित

  हर अकेला भ्रमित पीड़ित दुखी है 

  शास्त्र अपना यही कहता आ रहा

  संगठित व्यक्तित्व ही मन्मुखी है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २००


जब पदाधिकारी अपने कार्यकर्ताओं पर अटूट विश्वास रखते हैं, तो कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास और उत्साह बढ़ता है। वे अपने दायित्वों को अधिक निष्ठा और समर्पण के साथ निभाते हैं। इसी प्रकार, साधारण सदस्य भी यदि एक-दूसरे पर विश्वास रखें, तो आपसी सहयोग और एकता शक्ति उत्पन्न करती है। हम आत्मविश्वासी भी बनें l 

आत्मोन्नाति के उपायों में डायरी लेखन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l

आगामी अधिवेशन के लिए उत्साह से संपन्न होकर कार्यों में सहयोग प्रारम्भ कर दें l 



अद्भुत है हमारा सनातन धर्म l इसका मूल स्वरूप अत्यन्त लचीला, व्यापक और जीवनोपयोगी है। इसमें कर्मकाण्ड केवल कठोर नियमों का बंधन नहीं, बल्कि साधना का मार्गदर्शन है। उदाहरणार्थ यदि पूजा में पुष्प उपलब्ध न हों, तो अक्षत अर्पित करने का विकल्प दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि धर्म बाहरी सामग्री से अधिक भाव और श्रद्धा को महत्व देता है। वस्तु का अभाव साधना में बाधा न बने, इसलिए विकल्प की व्यवस्था रखी गई है।

यह धर्म मनुष्य को शृंखला में नहीं बांधता, बल्कि उसे विचार करने की स्वतंत्रता देता है। वह यह सिखाता है कि परिस्थिति के अनुसार अपने आचरण को कैसे ढालना चाहिए। नियम मार्गदर्शक हैं, परन्तु उनका उद्देश्य जीवन को सरल और संतुलित बनाना है, न कि उसे कठिन बनाना। पूजन में बैठने का निर्देश अवश्य दिया जाता है वह इस कारण कि मनुष्य एकाग्र होकर अपने भीतर झाँक सके और उस परम सत्ता का स्मरण कर सके, जो इस सृष्टि की रचना करने वाली है। हम इस संसार में उपस्थित हैं, परन्तु हमारा अस्तित्व किसी उच्चतर शक्ति पर आधारित है। पूजन उसी शक्ति के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और स्मरण का माध्यम है।


भैया संजय गर्ग जी, भैया शुभेन्दु शेखर जी, भैया रमेश गुप्त जी,  न्यायमूर्ति भैया सुरेश गुप्त जी, भैया पुनीत जी, भैया अरविन्द जी, भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ,आज दिल्ली के कार्यकर्ताओं की बैठक में लगभग कितने लोग उपस्थित होने वाले हैं कल  गुरुग्राम के कार्यक्रम में कितने सदस्य उपस्थित रहे, आगामी अधिवेशन के कार्यक्रम स्थल की चर्चा क्यों हुई,  स्वामी प्रेमानन्द के गांव का नाम किस कारण आया, देशभक्ति क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

11.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१७ वां* सार

 गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥

जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥1॥

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥

चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥2॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९९

ब्रह्मवेला में जागरण मन को उत्फुल्ल करने का एक अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय है इस जागरण के साथ प्रकृति के दर्शन का भी प्रयास करें तो यह निश्चित रूप से आनन्द में वृद्धि करेगा l दंभ से बचें l आगामी अधिवेशन के लिए पूर्णरूपेण समर्पित होवें l 


इन सदाचार संप्रेषणों के माध्यम से जो कुछ व्यक्त किया जा रहा है, वह बौद्धिक जानकारी  या विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं है। यह आचार्य जी के हृदय से उत्पन्न अनुभूतियों, संवेदनाओं और अंतरंग भावों की अभिव्यक्ति है। हमें इन संप्रेषणों का लाभ उठाना चाहिए l


किसी भी कार्य के लिए हमें अच्छे से अच्छा प्रयास करना चाहिए अर्थात् पूर्ण समर्पण,मन, बुद्धि और सामर्थ्य के साथ कार्य करना चाहिए l ऐसा प्रयास हमारे भीतर आत्मविश्वास पैदा करता है,हमारी क्षमताओं को विकसित करता है l यह भी महत्त्वपूर्ण है कि प्रयास केवल परिणाम के लिए न हो, बल्कि स्वयं कर्म की उत्कृष्टता के लिए हो। जब हम अपने कर्म को श्रेष्ठ बनाते हैं, तो वह स्वयं ही एक साधना बन जाता है।साथ ही जीवन की अनिश्चितता को  भी हम स्वीकारें । संसार में हर परिणाम हमारे नियंत्रण में नहीं होता। अनेक बाहरी परिस्थितियाँ, समय, संयोग और अन्य लोगों के निर्णय भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। यदि हम केवल अच्छे परिणाम की अपेक्षा रखेंगे तो विपरीत होने पर टूट भी जाएंगे अतः जब हम पहले से ही यह समझ लें कि परिणाम कुछ भी हो सकता है, तो हमारा मन संतुलित रहता है। हम सफलता में अहंकार से नहीं भरते और असफलता में निराशा में नहीं डूबते ।

यह दृष्टिकोण हमें भयमुक्त भी बनाता है। जब हमें यह स्वीकार होता है कि हम हर परिणाम के लिए तैयार हैं, तब हम जोखिम लेने से नहीं डरते। हम नए कार्यों में आगे बढ़ते हैं, क्योंकि हमें असफलता का भय रोक नहीं पाता। यही भाव हमें सच्चे अर्थों में कर्मयोगी बनाता है l इस परिवर्तनशील क्षरणशील मरणधर्मा संसार में यही पौरुष की परिभाषा है l 


परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते। स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ॥

जो इस वंश, जो परमात्मा के अंश से उत्पन्न है, की चिन्ता करता है वह मानव वंश है l


भैया अरविन्द तिवारी जी, भैया मोहन जी, भैया प्रदीप जी का उल्लेख क्यों हुआ,आचार्य जी ने किस डेढ़ कदम की चर्चा की,पं दीनदयाल जी ने किस सूत्र पर भविष्य का बृहद् वितान ताना जानने के लिए सुनें

10.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१६ वां* सार -संक्षेप

 न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।

गृहं तु गृहिणीहीनं कान्तारादतिरिच्यते॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९८

अपने अंतःकरण के विचारों और व्यवहार को शुद्ध एवं पवित्र बनाए रखें आहार-विहार के संबंध में उचित-अनुचित का विवेक बनाए रखें और सदैव इस पर सजग दृष्टि रखें इसके लिए Society को इंगित न करें । अपने आचरण तथा वाणी में कटुता का परित्याग करें और मधुरता एवं विनम्रता को अपनाएँ।



यह हमारा सौभाग्य है कि हम प्रतिदिन इन वेलाओं से सदाचारमय विचार ग्रहण कर रहे हैं ताकि हमारा अंतःकरण शुद्ध एवं पवित्र बना रहे, विवेक जाग्रत हो और हमारा आचरण तथा वाणी सदैव मधुर, विनम्र और कल्याणकारी बनी रहे।

हमें चाहिए कि हम उन व्यक्तियों को अपने निकट स्थान दें, जो हमारे हित, उन्नति और कल्याण की भावना रखते हैं। ऐसे लोग न केवल सही मार्गदर्शन करते हैं, अपितु कठिन परिस्थितियों में भी सहायक बनकर जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने में योगदान देते हैं।

इसके विपरीत, जो व्यक्ति अहित की भावना रखते हैं, भ्रम उत्पन्न करते हैं या अनुचित मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं, उनसे यथासंभव दूरी बनाए रखना ही उचित है। ऐसे लोगों का संग न केवल विचारों को दूषित करता है, बल्कि जीवन की दिशा को भी विचलित कर सकता है l

हमारे राष्ट्र की शिक्षा अत्यन्त विलक्षण थी जिसके कारण आज भी हम जीवित हैं जाग्रत हैं उत्साहित हैं और चैतन्ययुक्त हैं l हम गृहस्थाश्रमी हैं और गृह में पत्नी के साथ रहते हैं। पत्नी का स्थान सर्वोपरि है l पत्नी को ‘गृह’ भी कहा गया है, क्योंकि वही घर की आधारशिला, व्यवस्था और जीवन-संवेदना का केंद्र होती है। उसके बिना घर केवल एक भवन मात्र रह जाता है, जिसमें न आत्मीयता होती है, न ही जीवंतता।“बिन घरनी घर भूत का डेरा”, अर्थात् पत्नी के बिना घर सूना, निर्जीव और शून्य-सा प्रतीत होता है।


इसके अतिरिक्त उपकुर्वाण ब्रह्मचारी और नैष्ठिक ब्रह्मचारी में क्या अन्तर है, आचार्य जी दिल्ली क्यों जा रहे हैं, ज्येष्ठाश्रम क्या है द्विज क्या है अभिनन्दनीय कर्म क्या हैं श्वानवृत्ति क्या है जानने के लिए सुनें