दीपक से अँधियार नहीं मिटता है, केवल छँटता है,
अन्तस् का जब सूर्य उगेगा, तभी अँधेरा मिट पाएगा।
अपनी बस साधना यही हो, सूर्योपासक सतत रहें।
अपनी बात स्वयं अपने अन्तस्त्तत्वों के साथ करें ॥
काम कठिन है लेकिन, यह अँधियार मिटाना ही होगा।
खुद को भ्रम भय कुंठाओं से सदा बचाना ही होगा।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८७९ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६१
विद्या और अविद्या अर्थात् ज्ञान और कर्म को हम सहज रूप से समझने का प्रयास करें l हम अपने लक्ष्य को सुस्पष्ट करें जिसे अभी भी हम ठीक प्रकार से नहीं जान पाये हैं l
भारतवर्ष की भूमि अद्भुत है। इस पुण्यभूमि पर युगों से सतत चिन्तन की परम्परा प्रवाहित होती रही है। यहाँ का मनीषी चिन्तन केवल संसार को समझने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मनुष्य को जीवन की समस्याओं और बन्धनों से मुक्ति का मार्ग भी दिखाता है। इसी दृष्टि से हमारे उपनिषद् कहते हैं कि इस संसार में रहते हुए जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने के लिए विद्या और अविद्या—दोनों का सम्यक् ज्ञान आवश्यक है। केवल विद्या का ज्ञान पर्याप्त नहीं और केवल अविद्या का ज्ञान भी जीवन को पूर्ण नहीं बनाता। दोनों के स्वरूप, प्रयोजन और मर्यादा को भलीभाँति समझकर ही मनुष्य संसार में रहते हुए अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। अन्यथा मनुष्य भ्रमित भयभीत रहता है वह मोह से बच नहीं पाता
अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥
तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥3॥
ब्रह्मा जी कहते हैं यह सारा चराचर जगत् तो मेरे द्वारा रचा हुआ है। जब मैं ही माया के अधीन होकर नाचने लगता हूँ, तब गरुड़ को मोह होना कोई आश्चर्य नहीं है। तदनन्तर ब्रह्मा जी सुंदर वाणी बोले- श्री रामजी की महिमा को महादेव जी जानते हैं l
हे गरुड़! तुम शंकर जी के पास जाओ। हे तात! और कहीं किसी से न पूछना। तुम्हारे संदेह का नाश वहीं होगा।
इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय विद्यालय ( पूर्व में भारती विद्यालय ) औरास में कल सम्पन्न हुए *प्रबन्ध समिति के चयन* की चर्चा करते हुए चिरगांव और कैलाश मोटर्स का उल्लेख क्यों हुआ,भैया मोहन जी, भैया मुकेश जी की चर्चा क्यों हुई, सात्विक भक्ति क्यों महत्त्वपूर्ण है, आचार्य श्री जे पी जी की किस विशेष अनुभूति का उल्लेख आचार्य जी ने किया जानने के लिए सुनें l