21.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६१

 दीपक से अँधियार नहीं मिटता है, केवल छँटता है, 

अन्तस् का जब सूर्य उगेगा, तभी अँधेरा मिट पाएगा। 

अपनी बस साधना यही हो, सूर्योपासक सतत रहें। 

अपनी बात स्वयं अपने अन्तस्त्तत्वों के साथ करें ॥

काम कठिन है लेकिन, यह अँधियार मिटाना ही होगा। 

खुद को भ्रम भय कुंठाओं से सदा बचाना ही होगा।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७९ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६१

विद्या और अविद्या अर्थात् ज्ञान और कर्म को हम सहज रूप से समझने का प्रयास करें l हम अपने लक्ष्य को सुस्पष्ट करें जिसे अभी भी हम ठीक प्रकार से नहीं जान पाये हैं l


भारतवर्ष की भूमि अद्भुत है। इस पुण्यभूमि पर युगों से सतत चिन्तन की परम्परा प्रवाहित होती रही है। यहाँ का मनीषी चिन्तन केवल संसार को समझने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मनुष्य को जीवन की समस्याओं और बन्धनों से मुक्ति का मार्ग भी दिखाता है। इसी दृष्टि से हमारे उपनिषद् कहते हैं कि इस संसार में रहते हुए जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने के लिए विद्या और अविद्या—दोनों का सम्यक् ज्ञान आवश्यक है। केवल विद्या का ज्ञान पर्याप्त नहीं और केवल अविद्या का ज्ञान भी जीवन को पूर्ण नहीं बनाता। दोनों के स्वरूप, प्रयोजन और मर्यादा को भलीभाँति समझकर ही मनुष्य संसार में रहते हुए अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। अन्यथा मनुष्य भ्रमित भयभीत रहता है वह मोह से बच नहीं पाता 

अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥

तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥3॥


ब्रह्मा जी कहते हैं यह सारा चराचर जगत् तो मेरे द्वारा रचा हुआ है। जब मैं ही माया के अधीन होकर नाचने लगता हूँ, तब गरुड़ को मोह होना कोई आश्चर्य नहीं है। तदनन्तर ब्रह्मा जी सुंदर वाणी बोले- श्री रामजी की महिमा को महादेव जी जानते हैं l 

हे गरुड़! तुम शंकर जी के पास जाओ। हे तात! और कहीं किसी से न पूछना। तुम्हारे संदेह का नाश वहीं होगा।


इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय विद्यालय ( पूर्व में भारती विद्यालय ) औरास में कल सम्पन्न हुए *प्रबन्ध समिति के चयन* की चर्चा करते हुए चिरगांव और  कैलाश मोटर्स का उल्लेख क्यों हुआ,भैया मोहन जी, भैया मुकेश जी की चर्चा क्यों हुई, सात्विक भक्ति क्यों महत्त्वपूर्ण है,  आचार्य श्री जे पी जी  की किस विशेष  अनुभूति का उल्लेख आचार्य जी ने किया जानने के लिए सुनें l

20.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७८ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६०

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७८ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६०

आगामी अधिवेशन में  कमियों की ओर ध्यान न देकर हम कर्मयोद्धा आनन्द की अनुभूति करें l संगठन के प्रति सुदृष्टि रखें सुविधाओं  के प्रति विरक्ति रखें l


हमारा देश  भारत नित्य नई-नई समस्याओं से घिरता रहता है। पहले भी ऐसा ही होता रहा है, किंतु उनकी समस्याओं के समाधान के लिए सपूत सदैव तत्पर रहते हैं। हम वही राष्ट्र भक्त सपूत हैं l हमारा लक्ष्य ही है 

राष्ट्र - निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष l

भारत की धरती ही ऐसी है कि यहां जन्म लेने वाला मनुष्य पशु पक्षी भक्ति अर्थात् विश्वास की दिशा में प्रेरित होते हैं l भक्त को कभी ऐसा अनुभव नहीं होता कि उसका भगवान पराजित हो सकता है

 किन्तु गरुड़ जी को कुछ और ही अनुभव हुआ l

जब गरुड़ जी ने युद्धभूमि में जाकर श्रीराम और लक्ष्मण को मेघनाद के नागपाश से मुक्त कराया, तो उनके मन में एक सूक्ष्म अहंकार और संदेह आ गया। उन्होंने सोचा—"श्रीराम तो स्वयं ब्रह्मांड के स्वामी और भगवान हैं। भला साक्षात भगवान एक साधारण मेघनाद के सर्पों के बंधन में कैसे बंध सकते हैं? और अगर वे भगवान हैं, तो उन्हें मुक्त कराने के लिए मुझ जैसे एक पक्षी की सहायता की आवश्यकता क्यों पड़ी?" यही विचार गरुड़ जी का मोह (अज्ञान) बन गया। तो 


गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुण्डा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥

देखि सैल प्रसन्न मन भयउ। माया मोह सोच सब गयऊ॥1॥

इसके अतिरिक्त औरास की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की, भैया मोहन जी, भैया विवेक गुप्त जी, भैया मुकेश जी का उल्लेख क्यों हुआ, कम पुआल का कौन सा प्रसंग था जानने के लिए सुनें l

19.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७७ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५९ आगामी अधिवेशन की तैयारी में जुटे रहें l हम जिज्ञासु श्रोता बनकर इन सदाचार वेलाओं का लाभ उठाने की सतत चेष्टा करें। यहाँ व्यक्त होने वाले विचारों को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। यदि इनके माध्यम से प्राप्त जीवन-दृष्टि हमारे अन्तर्मन को दृढ़ बनाती है , विवेक को जाग्रत करती है और कर्म के प्रति हमें निरन्तर प्रेरित करती है तब जीवन-यात्रा में आने वाली विषम परिस्थितियाँ हमें विचलित या व्याकुल करने के स्थान पर हमारे धैर्य, पुरुषार्थ और आत्मविश्वास को और अधिक पुष्ट करेंगी तथा हम प्रत्येक परिस्थिति को स्वीकार करते हुए प्रसन्नता, संतुलन और आनन्द के साथ अपनी जीवन-यात्रा चलाने में समर्थ होंगे। हम सनातन धर्म में अटूट विश्वास रखते हैं हमारा सनातन धर्म अद्भुत है जिसमें मानव जीवन शैली का दिव्य विधान निहित है, जो जड़ में चेतन का बोध कराता है, असार के साथ सार का ज्ञान प्रदान करता है, सद्भाव समन्वित जीवन को उचित ठहराता है,संयम, तप, त्याग, दान, परोपकार,संतोष,शक्ति, शौर्य इस धर्म के आभूषण हैं l इसी सनातन जीवन-दृष्टि का अत्यन्त सहज, सरस और जीवन्त स्वरूप हमें रामचरितमानस में दिखाई देता है। रामचरितमानस केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन को आलोकित करने वाली ज्ञान-गंगा है। यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥ तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥1॥ मां भवानी प्रश्न कर रही हैं हे कृपालु प्रभु! श्रीराम का यह पवित्र और अत्यन्त मनोहर चरित्र काकभुशुण्डि जी को कहाँ से प्राप्त हुआ? हे कामदेव के शत्रु भगवान शिव! आपने यह अद्भुत रामकथा काकभुशुण्डि जी से किस प्रकार सुनी? यह प्रसंग मेरे लिए अत्यन्त कौतूहल और जिज्ञासा का विषय है। अतः कृपापूर्वक मुझे विस्तार से बताइए। इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, नारदमुनि का उल्लेख क्यों हुआ,भैया विनय वर्मा जी का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें l

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७७ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५९

आगामी अधिवेशन की तैयारी में जुटे रहें l


हम जिज्ञासु श्रोता बनकर इन सदाचार वेलाओं का लाभ उठाने की सतत चेष्टा करें। यहाँ व्यक्त होने वाले विचारों को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। यदि इनके माध्यम से प्राप्त जीवन-दृष्टि हमारे अन्तर्मन को दृढ़ बनाती है , विवेक को जाग्रत करती है और कर्म के प्रति हमें निरन्तर प्रेरित करती है तब जीवन-यात्रा में आने वाली विषम परिस्थितियाँ हमें विचलित या व्याकुल करने के स्थान पर हमारे धैर्य, पुरुषार्थ और आत्मविश्वास को और अधिक पुष्ट करेंगी तथा हम प्रत्येक परिस्थिति को स्वीकार करते हुए प्रसन्नता, संतुलन और आनन्द के साथ अपनी जीवन-यात्रा चलाने में समर्थ होंगे।

हम सनातन धर्म में अटूट विश्वास रखते हैं हमारा सनातन धर्म अद्भुत है जिसमें मानव जीवन शैली का दिव्य विधान निहित है,  जो जड़ में चेतन का बोध कराता है, असार के साथ सार का ज्ञान प्रदान करता है, सद्भाव समन्वित जीवन को उचित ठहराता है,संयम, तप, त्याग, दान, परोपकार,संतोष,शक्ति, शौर्य इस धर्म के आभूषण हैं l


इसी सनातन जीवन-दृष्टि का अत्यन्त सहज, सरस और जीवन्त स्वरूप हमें रामचरितमानस में दिखाई देता है। रामचरितमानस केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन को आलोकित करने वाली ज्ञान-गंगा है।


यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥

तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥1॥

मां भवानी प्रश्न कर रही हैं 

हे कृपालु प्रभु! श्रीराम का यह पवित्र और अत्यन्त मनोहर चरित्र काकभुशुण्डि जी को कहाँ से प्राप्त हुआ? हे कामदेव के शत्रु भगवान शिव! आपने यह अद्भुत रामकथा काकभुशुण्डि जी से किस प्रकार सुनी? यह प्रसंग मेरे लिए अत्यन्त कौतूहल और जिज्ञासा का विषय है। अतः कृपापूर्वक मुझे विस्तार से बताइए।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,

नारदमुनि का उल्लेख क्यों हुआ,भैया विनय वर्मा जी का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें l

18.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष सप्तमी /अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७६ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५८

 पदचिह्न बनाते राह, 

रास्ते अपने आप नहीं बनते। 

राहें संसार सजाती हैं, 

मोहक वितान जिनपर तनते ॥

राहें ही नहीं अगर होंगी ,

भटकेंगे कहाँ किधर व्याकुल। 

हर बियाबान भरमाएगा, 

दहलाएगा ढीला दलदल ॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  सप्तमी /अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७६ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५८

हम सद्चिन्तन कर संगठन सूत्र तैयार करें, कुंठा निराशा भय भ्रम व्यामोह का त्याग करें, भारत में वैदिक लोकतन्त्र स्थापित हो इस दिशा में अपने प्रयास करते रहें l



अद्भुत है यह भारतभूमि, जहाँ युग-युग में अनेक तत्त्वज्ञ ऋषि-महर्षि, मनीषी, ज्ञानी, वीर और पराक्रमी पुरुष जन्मे, जिन्होंने अपने तप, ज्ञान, साधना और पुरुषार्थ से इस भूमि को आलोकित किया। किन्तु समय-समय पर अनेक दुष्प्रयास इस पवित्र भूमि के जीवन-मूल्यों को कालुष्य से भरने, उसकी मौलिक चेतना को दुर्बल करने और उसकी सनातन जीवन-दृष्टि से समाज को विमुख करने के होते रहे हैं। किंतु भारत की विशेषता ही यह है कि प्रत्येक संकट के बीच उसकी अन्तर्निहित चेतना जाग्रत होती रही है और किसी न किसी महापुरुष, मनीषी या लोकनायक के माध्यम से समाज को पुनः अपनी मूल दिशा का बोध होता रहा है।


आज की दिशाविहीन शिक्षा शक्ति, शौर्य और पराक्रम का बोध नहीं कराती, जबकि हमारी परम्परागत शिक्षा मनुष्य के भीतर ऐसी जीवनदृष्टि का निर्माण करती थी जिसमें ज्ञान के साथ शक्ति शौर्य , विनय के साथ स्वाभिमान और भक्ति के साथ कर्मशीलता का समन्वय होता था। वह केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने वाली साधना थी; उसमें विद्यार्थी अपने सामर्थ्य को पहचानता, उसे अनुशासन में ढालता और राष्ट्र तथा समाज के हित में लगाने का संकल्प ग्रहण करता था। भगवान राम हमारे लिए मर्यादा के साथ शौर्य के भी आदर्श हैं ।अध्यात्म भी व्यवहार के रूप में भगवान राम ने किस प्रकार दिखाया है वह अद्भुत है


जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने ओमेन्द्र रत्नु का नाम क्यों लिया, राणा लाखा, राणा कुम्भा का उल्लेख क्यों हुआ,प्रेम का प्रकाश किसे देना चाहिए,भारत के लोकतन्त्र को एक कविता में आचार्य जी ने किस प्रकार परिभाषित किया जानने के लिए सुनें l

17.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष षष्ठी / सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५७

 नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होई धर्म ब्रतधारी॥

धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥1॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  षष्ठी / सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७५ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५७

हम अपने प्रयास करें उसमें सफलता असफलता का आकलन न करें प्रयास मनुष्य करता है और उसको सफलीभूत परमात्मा करता है l चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति करें l



संसार का यह शाश्वत सत्य है कि जो चाहिए, उसके लिए पुरुषार्थ करें और जो प्राप्त है, उस पर विश्वास रखें। प्रयास भविष्य को सँवारने का साधन है और विश्वास वर्तमान को स्वीकार करने की शक्ति देता है। संसार का जीवन इसी संतुलन पर चलता है।

यही अध्यात्म का चिन्तन भी हमें सिखाता है—कर्म में पुरुषार्थ और परिणाम में विश्वास। जो हमारे हाथ में है, उसके लिए पूरी निष्ठा से प्रयत्न करना और जो हमारे वश में नहीं है, उसे ईश्वर के विधान पर छोड़ देना ही जीवन की सहजता है।

किन्तु अध्यात्म का अर्थ संसार से विमुख हो जाना नहीं है। अध्यात्म के साथ संसार के साथ चलना भी आवश्यक है। जीवन की वास्तविक साधना यही है कि भीतर से हम सत्य, संयम, संतोष और विश्वास से जुड़े रहें तथा बाहर से समय, परिस्थिति और देश,समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप कर्मशील बने रहें। भारत की सात्विक मनीषा इसी का अनुमोदन करती है l श्रीरामचरितमानस इसी समन्वित जीवन-दृष्टि का अत्यन्त सजीव और प्रेरणादायी स्वरूप हमारे सामने रखता है।


गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥

राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥1॥

 हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्ज्वल पवित्र कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी की वैसी पूरी वर्णित कर डाली। श्री राम जी के चरित्र अनन्त हैं। वेद और मां सरस्वती भी उनका वर्णन भी नहीं कर सकते॥1॥

अबोध बालक, पागल और  सात्विक भक्त में क्या कोई अन्तर है? कलियुग का वेद कौन सा है? श्रद्धा और भक्ति कैसे जाग्रत करें? जानने के लिए सुनें l