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16.3.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 16/03/2022 का सदाचार संप्रेषण

 चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न

हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न



प्रस्तुत है पौर्तिक आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 16/03/2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in


https://t.me/prav353

आचार्य जी का प्रयास रहता है कि नित्य की इस सदाचार वेला से हम श्रोताओं की भावनाएं उत्थित हों,हम सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा पा सकें, समाज -सेवा और देश -सेवा के लिए सदैव तत्पर रहें, शिक्षा स्वास्थ्य स्वावलम्बन और सुरक्षा का आधार लेकर काम करने का जो संकल्प लिया है उसे भूल न पाएं


राजनीति से पूरा विश्व किस तरह से प्रभावित है पूरी मानवता को ध्वस्त करने का प्रयास किस तरह जारी है इसके लिए आचार्य जी ने रूस यूक्रेन युद्ध का उदाहरण लिया


यही राजनीति अपने देश पर  आज भी हावी है

जब कि हमारा देश परमात्मा की अद्भुत रचना है


हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार

उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार


जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक

व्योम-तम पुँज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक.....

बाहरी लुटेरों व्यापारियों द्वारा हमारे सनातन धर्म को नष्ट करने का प्रयास बार बार किया गया लेकिन आग सुलगती रही ऋषित्व मरा नहीं शौर्य संघर्ष करता रहा ऋषित्व चिन्तनरत रहा हमारा भी कर्तव्य है कि भारत के वास्तविक इतिहास से हम परिचित हों


आर्य समाज की स्थापना सर्वप्रथम 10 अप्रैल 1875 में, मुम्बई में स्वामी दयानंद सरस्वती के द्वारा की गई थी। इसके पश्चात स्वामी दयानंद सरस्वती ने सन् 1877 में लाहौर तथा 1878 में दिल्ली में आर्य समाज की स्थापना की। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ' वेदों की ओर लौटो ' का नारा दिया था और आठ वर्ष बाद सन् 1883 में स्वामी जी की हत्या हो गई l

आर्यसमाज के बढ़ते प्रभाव को देखकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति के साथ 28 दिसम्बर 1885 को मुंबई के गोकुल दास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1 मई सन् 1897 को रामकृष्ण परमहंस के  शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने की इस मिशन की स्थापना के केंद्र में वेदान्त दर्शन का प्रचार-प्रसार है।

आचार्य जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के त्रिसूत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि निष्क्रिय लोगों के दुश्चक्र में सक्रिय लोग किस तरह  फंस जाते हैं

आज भी स्थिति गम्भीर है इस कारण हमें अपने कर्तव्य की पहचान  करनी होगी और अपने लक्ष्य को पाना ही है यह निश्चय करना होगा

17.12.21

दिनांक 17/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

 करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥

राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥4॥

बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ॥

संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥5॥


प्रस्तुत है श्रील सुनामन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 17/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

मां सरस्वती वाणी -विधान को शक्ति,गति,मति आदि न दें तो मनुष्य कुछ कर ही नहीं सकता केवल बोल सकता है

अभिभावक का,शिक्षक का, पितृवत् व्यवहार करने वाले व्यक्ति का यह भाव होना चाहिए कि हर व्यक्ति के साथ उसका सामञ्जस्य बैठ जाए यही भाव जब विकसित हो जाता है तो इसको नीति, व्यवस्था, नियम, विधि कहते हैं

यही नीति जब राज्य व्यवस्था में रहती है तो इसे  राजनीति कहते हैं

राज्य बिना नीति के नहीं चलता है परिवार में भी राज्य व्यवस्था रहती है हमारी संस्कृति ने परिवारभाव को राज्य व्यवस्था में परिणत किया और वसुधैव कुटुम्बकम् कहा

बृहस्पतिदेव गुरु हैं गुरु अर्थात् अन्धकार को हरण करने वाला (गु =अन्धकार, रु =हरण करने वाला )

शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु हैं

सुर असुर संसार की विधि व्यवस्था है बृहस्पतिदेव के रथ का नाम नीतिघोष है यानि उसके चलने से जो स्वर निकलते हैं उसमें भी एक व्यवस्था है

इन्हें देवताओं ने अपना गुरु बनाया और शुक्राचार्य में अपार शक्तियां हैं लेकिन एक न्यूनता रह गई कि उनमें ईर्ष्या का भाव समाप्त नहीं हुआ

और असुरों को इसी भाव से समझाने की चेष्टा की जैसे समुद्रमन्थन में एक दृष्टान्त है

आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम लोग शास्त्रीय अध्ययन थोड़े थोड़े अंशों में करते चलें

चार्वाक दर्शन , विश्वामित्र द्वारा सृष्टि रचना आदि पौराणिक ज्ञान में बहुत सारे तत्त्व हैं इसी तरह गीता मानस में भी बहुत से कथानक हैं

ये सब हमारे मार्गदर्शक बन गए हैं लेकिन शिक्षा का आधार इन्हें  नहीं बनाया गया

इसके अतिरिक्त देहाध्यासी क्या है, देहाभ्यासी क्या है, भैया आशीष जोग, भैया मनीष कृष्णा, भैया पुनीत श्रीवास्तव और भैया अरविन्द तिवारी जी का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया आदि जानने के लिए सुनें