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21.10.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आश्विन् मास शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 21 अक्टूबर 2023 का सदाचार संप्रेषण *814 वां*

 बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥


प्रस्तुत है ज्ञान -कुशूल ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  आश्विन् मास शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 21 अक्टूबर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *814 वां* सार -संक्षेप


 1 ज्ञान का भण्डार 




06:21 , 16.59 MB, 16:54



भारतीय आर्ष चिन्तन, जो अत्यन्त गहन प्रभावशाली कल्याणकारी रहा है, का अनुसरण  करती इन सदाचार  वेलाओं का मूल उद्देश्य है कि उस महत् के अंश हम सत्कर्मों में संलग्न रहने का प्रयास करें ,शरीर मन बुद्धि चैतन्य का सामञ्जस्य बैठाते हुए सक्षम समर्थ शक्तिशाली बनें, हमारा प्रयास रहे कि  हम षड्विकारों से मुक्त रहें ,हम यज्ञीय भाव को आत्मसात् करते हुए समाज -हित और राष्ट्र -हित के पवित्र कार्य करते चलें,हम आत्मस्थ होकर इस संसार-रत्नाकर के रहस्य को समझें  सुलझाएं ,मुमुक्षु बनें

हम राष्ट्रभक्त यह अनुभव करें 

कि भारत पुनः विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर है


आइये प्रवेश करें आज की वेला में


हमें यह अनुभव करना चाहिए कि हम उस परमात्मा के अंश होने के कारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं

चिदानन्द रूपस्य शिवोऽहं शिवोऽहम्

शक्ति की अनुभूति करें 

 कोई दूसरा जो कह रहा है वही सही है इसे ही हम सत्य न मान लें यदि मुझे अनुभव हो रहा है कि वह ठीक है तभी उसे ठीक समझें

मुझे बहुत लोगों से प्रेरणा मिलती है लेकिन पराश्रयता कहीं से नहीं मिलती यही अनुभव करें 

हमें तो स्वयं अपना कल्याण करना है

हम आत्म को विस्मृत न करें

आत्मबोध आत्मशोध अत्यन्त आवश्यक है


*त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।*

*ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥*


अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।


निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।12.13।।


सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।


मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।



जो भूतमात्र के प्रति  द्वेषरहित रहने वाला  मित्र करुणावान्  ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम, क्षमावान्, संयतात्मा, दृढ़निश्चयी,योगी, सदा सन्तुष्ट रहने वाला  अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है वही मेरा भक्त है मुझे प्रिय है।।


जो होना होता है वह होकर रहता है शुभ अशुभ काल नहीं होता

हमारा कर्मसिद्धान्त प्रत्येक क्षण का है 

हमारा कर्मसिद्धान्त पौरुष को जाग्रत करते रहने का एक माध्यम है 

वर्तमान का कर्म भविष्य का भाग्य बनता है 


करम गति टारै नाहिं टरी ॥

मुनि वसिष्ठ से पण्डित ज्ञानी, सिधि के लगन धरि ।

सीता हरन मरन दसरथ को, बनमें बिपति परी ॥ १॥

कहॅं वह फन्द कहाँ वह पारधि, कहॅं वह मिरग चरी ।

कोटि गाय नित पुन्य करत नृग, गिरगिट-जोन परि ॥ २॥

पाण्डव जिनके आप सारथी, तिन पर बिपति परी ।

कहत कबीर सुनो भै साधो, होने होके रही ॥ ३॥



हम इस ओर भी ध्यान दें कि

क्या अंग्रेजी के लिए हिमायती होना बहुत आवश्यक है

यह भाषा हमारे ऊपर छल से लाद दी गई हमें भ्रामक जाल में फंसा दिया गया

यह भाषा जिसने हमारे रीतिरिवाजों हमारी परंपराओं  पर प्रहार किया हो हमारा आत्मबोध भ्रमित किया हो वह वितृष्णा के योग्य है



आचार्य जी ने इस ओर भी संकेत किया स्वयं वयसनों को त्यागकर हम दूसरों को व्यसनों को त्यागने की सलाह दें तभी दूसरों पर इसका प्रभाव पड़ेगा 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने स्वास्थ्य शिविर के बारे में क्या बताया vintage car rally की चर्चा क्यों की

जानने के लिए सुनें

14.6.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आषाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी ,विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 14 -06- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।


इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।18.64।।



प्रस्तुत है अभ्यमित्र्य ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष

दशमी ,विक्रम संवत् 2080

  तदनुसार 14 -06- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


  685 वां सार -संक्षेप

1 वह योद्धा जो वीरतापूर्वक दुश्मन का सामना करता है



हम मनुष्य रूप में जन्मे हैं हमें मनुष्यत्व की अनुभूति होनी चाहिए  प्रेम सद्भाव आत्मीयता मनुष्य का चरित्र प्रकट करते हैं पौरुष पराक्रम विश्वास मनुष्यत्व का विस्तार है गीता मानस आदि ग्रंथ यही सिखाते हैं कि मनुष्य रूप में जन्म लेने के कारण मनुष्यत्व आवश्यक है


जिन्हें भी मनुष्यत्व की अनुभूति होती है वे सत्कर्म करते हुए संसार की समस्याओं से आसानी से छुटकारा पा लेते हैं


नई पीढ़ी को संस्कारित प्रशिक्षित करने के लिए घर का वातावरण सही करने की आवश्यकता है  कुछ क्षण ऐसे निकालें कि परिवार के सारे लोग एक स्थान पर एकत्र हो सकें आनन्द के क्षण व्यतीत करें विवादरहित चर्चा करें

हमें यदि आत्मबोध रहता है तो हम अपने को छोटा महसूस नहीं करेंगे और तत्त्वबोध रहता है तो दम्भ नहीं करेंगे


ॐ सह नाववतु ।

सह नौ भुनक्तु ।

सह वीर्यं करवावहै ।

तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

यह जीवन मन्त्र है 

हम इन सिद्धान्तों का पालन करते हुए समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी जीवन जीने के लिए संकल्पित हैं


देशसेवा किस प्रकार हम कर सकते हैं आचार्य जी ने विस्तार से इसके लिए परामर्श दिया

कर्मों को संस्कारवान बनाना चाहिए

मनुष्य के संस्कार के लिए हमारे यहां बहुत से मार्ग हैं

निर्गुंणोपासना भी है सगुणोपास्ना के साथ, शुद्धाद्वैत  द्वैत  केवलाद्वैत  द्वैताद्वैत हैं


धर्म का अर्थ कर्तव्य है  आचार्य जी ने आत्मविस्तार को समझाया



एक तुम, यह विस्तृत भू-खंड प्रकृति वैभव से भरा अमंद,

कर्म का भोग, भोग का कर्म, यही जड़ का चेतन--आनंद।

अकेले तुम कैसे असहाय यजन कर सकते? तुच्छ विचार।

तपस्वी! आकर्षण से हीन कर सके नहीं आत्म-विस्तार।

दब रहे हो अपने ही बोझ खोजते भी न कहीं अवलंब,

तुम्हारा सहचर बन कर क्या न उऋण होऊँ में बिना विलंब?

समर्पण लो--सेवा का सार, सजल-संसृति का यह पतवार,

आज से यह जीवन उत्सर्ग इसी पद-तल में विगत-विकार,

दया, माया, ममता लो आज, मधुरिमा लो, अगाध विश्वास,

हमारा हृदय-रत्न-निधि स्वच्छ तुम्हारे लिए खुला है पास।

बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल,

विश्व-भर सौरभ से भर जाय सुमन के खेलो सुंदर खेल।"



आचार्य जी ने परामर्श दिया कि तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावल्ली को हम ठीक तरह से समझें इसी प्रकार प्रश्नोपनिषद भी महत्त्वपूर्ण है

तप अत्यन्त महत्त्व का है

घर का अनुशासन विद्यालय के अनुशासन से कम नहीं होना चाहिए

हम लोग आचार्य जी से प्रश्न करें 

ग्रामविकास का कार्य किसे मिला आदि जानने के लिए सुनें

6.6.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 6 जून 2022 का सदाचार संप्रेषण

 न तोयपूत देहस्य स्नानमित्यमिधीयते। स स्नातो यस्य वै पुँसः सुविष्शुद्धं मनामतम्।


पानी से शरीर धोना ही स्नान नहीं है यदि हम अन्तःशुद्धि भी कर लें तो वह स्नान है



प्रस्तुत है जारूथ्य आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 6 जून 2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w


जीवन की यात्रा में सुख और दुःख आते रहते हैं इसी अवस्थाद्वय के कारण कभी हम उल्लसित रहते हैं और कभी ऊबते हैं प्रसन्न जीवन का सीधा और सरल सूत्र है कि हम वर्तमान में जीना सीखें

वर्तमान में न रहने पर अनुभूति दूर हो जाती है भूतकाल में जाने पर बहुत से ऐसे विचार आते हैं जो परेशान करते हैं भविष्यकाल में जाने पर उसमें संभावित बाधाओं के विचार से भी परेशान होते हैं


इन परेशानियों से दूर होने के लिये जिस मार्ग का अनुसरण महापुरुषों ने किया है उसे हम अपनायें

वेदा विभिन्नाः स्मृतयो विभिन्ना नासौ मुनिर्यस्य मतं न भिन्नम् । धर्म्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥


हमारे मन का चांचल्य एक विचित्र रूप धारण कर लेता है चंचलता के उत्तर स्वयं देने लगता है इन भावों और विचारों में गहराई से प्रवेश करने पर


इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।


मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।3.42।।


एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।


जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।3.43।।



 बुद्धि से परे आत्मा को जानकर बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके, हे महाबाहो ! तुम इस  कामरूप शत्रु को मारो।।



आत्म और अनात्म भाव अध्यात्म का मूल विषय है इसके अन्दर हमारा यदि चंचु प्रवेश ही है तो भी जितनी देर हम इन भावों को समझते हैं उतनी देर आनन्दार्णव में तैरते रहते हैं

ज्ञान का वर्धन तो नाममात्र का हो सकता है लेकिन इन सदाचार संप्रेषणों का मूल उद्देश्य है हमें आत्मबोध की अनुभूति होवे


आनन्दमय स्थिति तब आती है जब हम शरीर से निकलकर आत्म तक पहुंचते हैं और आत्म में पहुंचकर उसकी अनुभूति भी करना आवश्यक है


कल के कार्यक्रम में हम सब लोगों को आनन्द की अनुभूति हुई

अध्यात्म से संबन्धित प्रश्न और उत्तर  के कार्यक्रम भी हमें करने चाहिये


सम्राट पृथ्वीराज फिल्म में हिन्दुत्व का बोध कराया गया हिन्दुत्व शौर्य शक्ति से संयुत रहे इसमें रामत्व प्रवेश करे

रामत्व धोखा नहीं खाता खाता भी है तो आंशिक रूप से और उसका निवारण भी कर लेता है


आचार्य जी  अपने स्वाध्याय से हमें उत्साहित करते हैं हम भी नवोदित पीढ़ी को उत्साहित करें

आचार्य जी ने मास्क के लिये क्या बताया खुलापन कहां आये आदि जानने के लिये

सुनें