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27.7.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष दशमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 27 जुलाई 2023 का सदाचार संप्रेषण 728 वां सार -संक्षेप

 साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा॥

जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू॥4॥


प्रस्तुत है हितान्वेषिन् ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष दशमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 27 जुलाई 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  728 वां सार -संक्षेप

1 : कुशलाभिलाषी



इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांत भवन में टिक रहना


किन्तु पहुंचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं ।


 महाकवि जयशंकर प्रसाद (३० जनवरी १८८९ – १५ नवंबर १९३७)की यह कविता मनुष्य को साहसिक अभियान पर चलने के लिए प्रेरित करती है। मनुष्य को मनुष्यत्व का अनुभव करने की प्रेरणा देती है l

जीवन एक लम्बी यात्रा है लेकिन यदि यह सुखद हो निरापद हो आनन्दमयी हो तो यह बात अलग है 

निर्विघ्न यात्रा के लिए हमें शौर्य प्रमंडित अध्यात्म का आश्रय लेना होगा और इसके लिए  बलशाली लोगों के एक मजबूत संगठन की आवश्यकता है जिसका इतना भय हो कि दुश्मन आंख उठाने से पहले एक बार सोचे और वह आक्रमण करे विघ्न डाले तो हम उसको परास्त कर दें समस्याएं आती रहती हैं लेकिन हमारे पास समाधान भी रहते हैं समस्या न सुलझे तो व्याकुल नहीं होना चाहिए हमें आशान्वित रहना चाहिए 

यात्रा के   पड़ावों के मंगल आयोजन होने चाहिए

मानस में व्याकुलता के पश्चात् भरत जी महाराज ने एक यात्रा का आयोजन किया है  उनके मित्र निषादराज शंकाग्रस्त हैं


जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी॥

भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी॥3॥

और कहते हैं


राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे॥

जीवन पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं॥1॥

भगवान् रामजी के प्रताप से और आपके बल से हम लोग भरत की सेना को बिना वीर और बिना घोड़े की कर देंगे । जीते जी पीछे पाँव न रखेंगे। पृथ्वी को सिर और धड़ से सजा देंगे l




ऐसा हौसला हम सबको रखना चाहिए  हमारे अन्दर भी अद्भुत विचार आ सकते हैं और हम   बड़े से बड़े काम कर सकते हैं इस ईश्वरीय लीला का अनुभव हम भी कर सकते हैं और इस पर विश्वास करें तो यह प्रतिफलित भी होती है

निषादराज को पता चलता है कि भरत तो श्री रामचन्द्रजी को मनाने जा रहे हैं।

और 

दण्डवत करते देखकर भरत जी  महाराज ने उठाकर उसको छाती से लगा लिया। जैसे स्वयं लक्ष्मण जी से भेंट हो गई हो


ये द्रवित करने वाले प्रसंग हैं

ये हमें  यदि द्रवित कर देते हैं तो इसका अर्थ है मानस हमारे अंदर प्रवेश कर रहा है

इसी कथा का विस्तार करते हुए आचार्य जी कहते हैं भक्त भगवान् से कम नहीं है भक्त और भगवान् जब एक हो जाते हैं तो भक्ति की रचना होती है

हमारे क्रान्तिकारियों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने भारत की भक्ति की

जैसे भरत के मन में राम हैं ऐसे ही इन क्रान्तिकारियों के मन में भारत समाया था जैसे चन्द्रशेखर आजाद शौर्यप्रमंडित अध्यात्म का एक ज्वलंत उदाहरण

ऐसे महापुरुष भारत की धरती पर थे हैं और आगे भी रहेंगे


अखंड भारत का संकल्प हमारा रहेगा ही

हम नित्य अपनी समीक्षा करें

टूटे सुजन मनाइए, जौ टूटे सौ बार। 


रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी भैया नीरज जी भैया अमित अग्रवाल जी का नाम क्यों लिया खली का नाम क्यों आया आदि जानने के लिए सुनें

29.12.21

विनीतात्मन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 29/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है  विनीतात्मन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 29/12/2021   का सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w


https://t.me/prav353


शब्द क्या है?

किसी विचारक ने कहा

 सब तरह के दृश्य पदार्थ कल्पना अथवा भावों या विचारों की प्रतिच्छाया या प्रतिबिम्ब ही शब्द है

शब्द एक बहुत बड़ा आधार है  शब्द के अभाव में ज्ञान का स्वयंप्रकाशत्व लुप्त हो जाता है

ऋषियों ने शब्द का बहुत महत्त्व दर्शाया है  प्रणव ॐ आदि स्वर और शब्द दोनों  है


ब्रह्म के मन में इच्छा आई, विस्फोट हुआ और स्वर निकला   ॐ

ऋषि भर्तृहरि ने शब्दाद्वैत का प्रवर्तन कर दिया

नाथ संप्रदाय में भी शब्द की उपासना की गई है राधास्वामी मत में भी शब्द (सबद )की उपासना है

इसी तरह कबीर भी शब्द पर बहुत जोर देते दिखे हैं

हम लोगों को एक दूसरे पर जो विश्वास है उसी कारण हम एक दूसरे के शब्द सुनते हैं यह शब्दमय संसार हमारे आसपास प्रसरित हो रहा है यह भगवान् की कृपा है

इन शब्दों के आधार पर हम आनन्द भी ले सकते हैं और व्यवहार भी कर सकते हैं

सीमा पर ललकार हो या स्वर में बंधा राग हो दोनों में रोमांच है


विवाह के समय भगवान् राम के स्वरूप का वर्णन इस प्रकार से मानस में है 

राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।।

गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा।।


राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।।

जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।।

देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।।

डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।।

रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।।

पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई।।


दोहा/सोरठा

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।

जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।।


बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥

जनक जाति अवलोकहिं कैसें। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥

सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी॥

जोगिन्ह परम तत्त्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा॥

हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता॥

रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया॥



मानस के प्रसंग बहुत प्रभाव डालते हैं आचार्य जी चाहते हैं हमें भी पहले अनुभूति प्राप्त हो फिर अभिव्यक्ति प्राप्त करें


तुलसीदास के जीवन, परिस्थितियां, भाव, भाषा,भक्ति और उस समय के परिवेश पर हम लोग विचार करें कि उस समय कितना भीषण समय था ऐसे कठिन समय में जिस साहित्य का उन्होंने सृजन किया तो यह परमात्मा की ही कृपा है

अपनी बेचारगी इस तरह की सदाचार वेला से दूर करने का हम लोग प्रयास करें

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने रमेशभाई ओझा, मैथिली शरण गुप्त का नाम क्यों लिया आदि जानने के लिए सुनें

23.12.21

दिनांक 23/12/2021 (पौष कृष्ण चतुर्थी )का सदाचार संप्रेषण

 सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।


सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।18.48।।


प्रस्तुत है  श्रुतपारदृश्वन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 23/12/2021 (पौष कृष्ण चतुर्थी )का सदाचार संप्रेषण


< 23 दिसंबर 1921 को रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1913 में प्राप्त नोबेल पुरस्कार राशि से विश्वभारती की स्थापना की थी 

यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्

(यजुर्वेद 32/8) >




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आज की सदाचार वेला में संसार के सत्य और संसार के सत्य के साथ सांसारिकता के संबन्ध को समझाने का प्रयास किया गया है

प्रचुर मात्रा में उपलब्ध,अनेक संतों, विद्वानों,ज्ञानियों, कर्मयोगियों द्वारा व्याख्यायित गीता और मानस के संपर्क में हम जितना अधिक रहेंगे उतना ही संसार को समझने और सांसारिक व्यवहारों को करने का सलीका प्राप्त हो जायेगा

स्वाध्याय (यानि अपने रोग की दवा )अत्यधिक अनुपम निधि है

अपने रोग की दवा हम स्वयं नहीं कर पाते समस्या कुछ निदान कुछ

समस्याओं के संधान के तरीके भी अलग अलग हैं जिसको कोई तरीका सलीका मिल जाता है उसके अन्दर सहज या सामयिक आकर्षण पैदा हो जाता है समझदार के मन में थोड़ी देर के लिए ये आकर्षण रहते हैं और फिर विलीन हो जाते हैं

बच्चे उलझे रहते हैं

गीता के 15 वें अध्याय में


ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।


छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।15.1।।

की व्याख्या करते हुए आचार्य जी ने बताया कि मन क्या है भाषा क्या है अभिव्यक्ति क्या है इस तरह के अनन्त प्रश्नों का जिसे सहज उत्तर मिल जाता है उसे ज्ञानी कहते हैं

किसी की बात हमें अच्छी लगती है किसी की बात खराब

इन्हीं सारे रहस्यों को गीता मानस में समझाया गया है

गीता का कथात्मक स्वरूप गूढ़ हैऔर मानस का सरल

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा


गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।


अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि


कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।।15.2।।

की व्याख्या करते हुए आचार्य जी ने बताया कि संसार की वास्तविकता में पिपीलिका वृत्ति भी होती है

संसार के प्रपंचों  से जो व्यक्ति तत्त्व निकाल लेता है वही ज्ञानी है

उसी को शिक्षा देने का अधिकार है

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते


नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।


अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल


मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।15.3।।

ततः पदं तत्परिमार्गितव्य


यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।


तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये


यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।15.4।।

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा


अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।


द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै


र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।15.5।।

इन ज्ञान की सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए हमारे अन्दर शक्ति बुद्धि विचार आये और संसार में हम आवश्यकता पड़ने पर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सकें गीता यह है l

20.12.21

दिनांक 20/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

 यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।


तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।18.78।


जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।



प्रस्तुत है तेजस्वत्  त्रपिष्ठ आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 20/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

मनुष्य जीवन प्रयासों (कुछ सायास कुछ अनायास )की एक प्रयोगशाला है

यह सदाचार संप्रेषण अपने विकारों को दूर करने की एक उत्तम व्यवस्था है

क्योंकि हम सात्विक पथ पर चलते हुए बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने का मन में एक भाव धारण किये हुए हैं तो हमें ईर्ष्या कुण्ठा कलह जो सब दुःख हैं इनसे बचना चाहिए

बहुत सारे सांसारिक भयों के मध्य निर्भय होकर चलने का भाव हमारे ग्रन्थों में मिलता है

महाभारत के भीष्म पर्व में भी निर्भय होकर चलने का भाव मिलता है

महाभारत के अनुसार द्यौ नामक वसु, जो ज्ञान का आधार और शक्ति के पुञ्ज हैं, ने गंगापुत्र भीष्म के रूप में जन्म लिया था।

हमारे यहां की चिन्तन व्यवस्था बहुत गहन है

हमें तो गर्व करना चाहिए कि हमारे यहां बहुत सारे ग्रन्थ, शब्दों के बहुत सारे अर्थ, भाषा में बहुत  सारे अक्षर व्यञ्जन शब्द उच्च कोटि का व्याकरण है वैविध्य को व्यवस्थित रूप से रखना कम आश्चर्य की बात नहीं

आचार्य जी ने कहा हम लोग गीता मानस का नियमित अध्ययन करें

सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: |

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् || 10||


या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।


यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69।।


विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।


निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति।।2.71।।


ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।


तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।3.1।।


को उद्धृत करते हुए आचार्य जी ने कहा युद्ध भी एक कर्म है यज्ञ हवन भी कर्म है शान्ति और संघर्ष मनुष्य के विवेक पर आधारित हैं

हमारा कर्म क्या है धर्म क्या है इस पर विचार करें समय पर कठोर हों समय पर मृदु हों

इसके अतिरिक्त बिजली से इलाज का क्या आशय है

भैंस की भाषा को क्या हम श्रेष्ठ भाषा कहेंगे किसने कहा 

कौन दो सहपाठी  आमने सामने आ गये? आदि जानने के लिए सुनें

9.12.21

दिनांक 09/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है क्षान्त आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 09/12/2021 का सदाचार संप्रेषण


संसार है संसार में समस्याएं आती हैं और उनके समाधान के लिए प्रयत्नशील हुआ जाता है  और अपने साथी सहयोगियों का सहयोग लेकर आगे फिर जीवनयात्रा प्रारम्भ हो जाती है और जो अध्यात्म का संस्पर्श करते हैं वो कहते हैं

जो करता है  परमात्मा करता है

और परमात्मा सब अच्छा ही करता है


और इसके अन्तिम भाग परमात्मा सब अच्छा ही करता है को आत्मसात् करने में अत्यधिक अभ्यास की आवश्यकता होती है सभी को यश की कामना होती है व्यवसाय को करते हुए यशस्विता को प्राप्त करने की व्यवसायी को प्रच्छन्न कामना रहती है और यह कामना जब भावों में बदल जाती है और भाव  उदात्त हो जाते हैं तो उनके अन्दर कुछ वैशिष्ट्य आ जाता है

जो विद्यार्थी विद्यालय के छात्रावास में रहे हैं  वो प्रातःस्मरण करते थे


अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः॥

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।’

(आचार्य जी चिरजीविता के बारे में कल विस्तार से बताएंगे )


अर्जुन के प्रश्न ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है तो भगवान् श्रीकृष्ण का उत्तर है

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।

भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।8.3।।

परम अक्षर (अविनाशी) तत्त्व ब्रह्म है, स्वभाव (अपना स्वरूप) अध्यात्म कहा जाता है,भूतों के भावों को उत्पन्न करने वाला विसर्ग (यज्ञ प्रेरक बल) कर्म नाम से जाना जाता है।।

गीता मानस देखकर आनन्दित हो जाना यह भाव बना रहे तो हमें संसार में जीने का सलीका और साहस दोनों मिल जाते हैं 

ज्ञान वह जो समय पर काम दे जाए भाव वह जो समय पर उठ जाए विचार वह जो समय पर कारगर हो जाए कर्म वह जो समय पर क्रियाशील हो जाए तो हमें पश्चात्ताप नहीं होगा

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया डा उमेश्वर जी भैया राजेश मल्होत्रा जी भैया मुकेश गुप्त जी की चर्चा क्यों की स्वामी रामतीर्थ क्या कहते थे आदि जानने के लिए सुनें

5.12.21

दिनांक 05/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है धूतगुण आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 05/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

आप किसी एक विषय पर अपने मानस को केन्द्रित कर लें  चाहे वह वस्तु पर हो तत्त्व पर हो व्यक्ति पर हो  या सिद्धान्त आदि पर हो तो ध्यान केन्द्रित करने पर अपने अन्दर के विचारों का विकास प्रारम्भ हो जाता है और इसके अभ्यास की आवश्यकता हैl ध्यान योग के लिए गीता का छठा अध्याय है

बहुत सारे ग्रंथ तो हीन मानसिकता के चलते नष्ट कर दिये गये उसके बाद भी काफी ग्रन्थ सुरक्षित हैं क्योंकि हम श्रुति के अनुयायी हैं हम सदैव संघर्षशील रहे हैं

हमें हिन्दू क्यों कहा जाता है इसके लिए आचार्य जी ने बताया कि सबसे पहले हिन्दू शब्द का प्रयोग तन्त्र शास्त्र (जो शिव प्रणीत है )के एक ग्रन्थ मेरुतन्त्रम्  (इसमें 35 प्रकाश हैं )में हुआ है


हिन्दू दो शब्दों को मिलाकर बना है हीन और दूष अर्थात् हीन वृत्तियों को नष्ट करने वाले को हिन्दू कहा जाता है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आग्रहपूर्वक हिन्दू शब्द को ग्रहण किया

रज्जू भैया ने कहा था आज हमें आग्रही हिन्दू बनना है

हम लोग संस्कार पर विश्वास करते हैं संस्कार के लिए भी शक्ति की आवश्यकता होती है लेकिन स्नेह की सलिला के साथ

हमारा युगधर्म शक्ति उपासना है शक्ति भारत -भक्ति के साथ विचार उदात्त व्यवहार के साथ भाव राष्ट्र के साथ

गीता और मानस का अध्ययन तो करें लेकिन स्वाध्याय भी साथ में हो

जब हमें स्वयं उत्तर मिलने लगेंगे तो हमारा अध्ययन सार्थक होगा

हमारा भाव सदा भारत मां के चरणों में समर्पित करने का बना रहना चाहिए

आचार्य जी ने कश्मीर पर हमले के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के त्याग की चर्चा की

आचार्य जी ने Emergency  की भी चर्चा की

4.12.21

दिनांक 04/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है सानुक्रोश आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 04/12/2021 का सदाचार संप्रेषण

आचार्य जी का कहना है कि हम प्रबुद्ध श्रोता दुर्गुणों को पचाएं और सद्गुणों को प्रचारित करें

पापान्निवारयति योजयते  हिताय

गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति  |

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले

सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति  सन्ताः || -भर्तृहरि (नीतिशतक)

संतों का कहना है कि सच्चे मित्र के लक्षण

हैं कि वह हमें पाप के कार्यों को करने से रोकता है, हमारे हित के कार्यों को करने हेतु 

 हमें  प्रेरित करता है, हमारी गोपनीय बातों को नहीं बताता ,विपत्ति के समय में  हमारा साथ नहीं त्यागता व आवश्यकता  पर  सहायता हेतु तत्पर रहता है |

आसुरी स्वभाव में कई विकार हैं और दैवीय स्वभाव में विचारों की तुलना में विकार बहुत कम हैं हमें दैवीय गुणों को अपनाना चाहिए 

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्,

                         ज्ञानयोगव्यवस्थितिः   ।

       दानं  दमश्च   यज्ञश्च,

                        स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।

                                        (गीता 16/1)

श्रीभगवान् बोले -- भय का सर्वथा अभाव; अन्तःकरण की शुद्धि; ज्ञान के लिये योग में दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियों का दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालन के लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणी की सरलता।


अहिंसा सत्यमक्रोधस्,

                         त्यागः शान्तिरपैशुनम्।

       दया    भूतेष्वलोलुप्त्वं,

                         मार्दवं     ह्रीरचापलम्।।

                                      (गीता 16/2)

अहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसार की कामना का त्याग; अन्तःकरण में राग-द्वेषजनित हलचल का न होना; चुगली न करना; प्राणियों पर दया करना सांसारिक विषयों में न ललचाना; अन्तःकरण की कोमलता; अकर्तव्य करने में लज्जा; चपलताका अभाव।

तेजः क्षमा धृतिः शौचं,

                          अद्रोहो नातिमानिता।

       भवन्ति  सम्पदं  दैवीं,

                          अभिजातस्य भारत।।

                                     (गीता 16/3)

तेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीर की शुद्धि, वैर भाव का न रहना और मान को न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए मनुष्य के लक्षण हैं।

किसी से सहायता प्राप्त हो रही है तो प्रसाद मानकर उसे ग्रहण करें l संसार में संघर्ष करने के लिए पात्रता लाएं l कोरोना के नये Variant Omicron के लक्षण घातक हैं विज्ञान की उपेक्षा न करें अध्यात्म को अपने साथ रखें

काल से संघर्ष करना मानव का पौरुष का गुण है नियम संयम का ध्यान रखें Mask का उपयोग करें काढ़े का सेवन करें l मसालों का सेवन न करें अमुक नमक न खाएं आदि व्यापार का विकृत तौर तरीका भी घातक है  यहां आत्मसमीक्षा अवश्य करें l

अध्यात्म और विज्ञान का सामञ्जस्य करें l गीता मानस 

का अध्ययन अवश्य करें l

27.11.21

दिनांक 27/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है आचक्षुस् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 27/11/2021 का सदाचार संप्रेषण


प्रापञ्चिक जगत् में रहते हुए सदाचार की ओर उन्मुखता तत्परता जिज्ञासा मनुष्य का पुरुषार्थ है

आचार्य जी का कहना है भगवान् की कृपा से ही यह सदाचार वेला चल रही है इसमें किसी को दम्भ नहीं करना चाहिए

लिखन बैठि जाकी छबी, गहि-गहि गरब गरूर। भए न केते जगत के, चतुर चितेरे कूर॥ - बिहारी


इस अपूर्व सुंदरी   का चित्र बनाने के लिए, न जाने कितने  अहंकारी चित्रकार आए, परन्तु सब  असफल सिद्ध हो गए। भाव यह है कि इस रमणी की सुन्दरता की छवि, पल-पल बदलती रहती है। वह चित्र बनाकर जैसे ही चित्र और  सुंदरी का मिलान करता है, उसे भिन्नता दिखाई देती है।  उसका महान चित्रकार होने का  अहंकार चूर हो जाता है।


क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः

प्रतिक्षण जो नवीनता को प्राप्त करे वह ही रमणीयता का स्वरूप है ।

जो स्वस्थ है वह न तन का और न मन का दास होता है स्वस्थ अर्थात् अपने में स्थित है जो l

भैया संदीप शुक्ल जी (बैच 1983) की बिटिया का संदीप जी से प्रश्न था कि कन्यादान क्या है

आचार्य जी ने इसका बहुत अच्छा अर्थ बताते हुए कहा कि परमात्मा भी जब आत्मदान करता है तो सृष्टि की रचना होती है यज्ञ दान तप कभी न त्यागें

गीता के सोलहवें अध्याय में

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌ ॥ (१) का 

और 17 वें का 25 वां,18 वें से 43 वां का अध्ययन करें l

दान सुपात्र को ही करें l

प्रकृति के स्थानान्तरण के मूल में भी दान है l जो व्यक्ति जितने स्थान बदलता है उतना ही विकसित होता है l

गीता मानस का अध्ययन करें

देश को इस समय जागरूक व्यक्ति की आवश्यकता है इसलिए हमें जाग्रत होना है 

 इसके अतिरिक्त विश्वामित्रीय सृष्टि क्या है,बीजू आम क्या है ऋषि कन्या क्या है आदि जानने के लिए सुनें 👇

25.11.21

दिनांक 25/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है चोक्ष आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 25/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

स्थान : उन्नाव

जिस प्रकार कथावाचक को अपने अन्दर के भाव व्यक्त करने के लिए किसी को यजमान बनाना पड़ता है इसी तरह आचार्य जी का ध्यान इस वायवीय कथा को कहते समय किसी श्रोता पर केन्द्रित हो जाता है 

आचार्य जी ने बताया कि उन्होंने अध्यापन से बहुत कुछ सीखा विवेक जाग्रत हुआ भाव जाग्रत हुए बहुत से सद्गुण विकसित हुए


हमें मृत्यु से भयभीत नहीं होना चाहिए अपितु जिज्ञासा होनी चाहिए जिज्ञासा उन्हीं की बढ़ती है जो स्वस्थ होते हैं

व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है प्राणायाम से प्राण, प्राण प्राणिक शक्ति है आन्तरिक शक्ति है ऊर्जा है जो शरीर को चलाती है जब हम बोझ उठाते हैं तो हमारा हाथ नहीं उठाता अपितु हाथ के अन्दर की ऊर्जा उठाती है


गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च ।

नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च ।।


जो मनुष्य सदैव गीता का पाठ करता है और प्राणायाम में तत्पर रहता है, उसके इस जन्म में और पूर्वजन्म में किये हुए सारे पाप  नष्ट हो जाते हैं ।

पाप बोझ हैं पुण्य हल्कापन है मन के अन्दर बोझिल करने वाली कामनाएं अधोगतिज हो जाती हैं

जिस प्रकार आचार्य जी शिक्षक रूप में कक्षा में जाकर हम लोगों पर दृष्टिपात् करते थे उसी प्रकार हम लोगों के सामने भी गृहस्थ-आश्रम रूपी उच्च कोटि का विश्वविद्यालय है जहां माता पिता अभिभावक आदि के अनुभवों का लाभ लेना चाहिए उन्हें प्रसन्न रखना चाहिए अपितु संपूर्ण विश्वविद्यालय पर दृष्टि रखनी चाहिए अन्यथा जीवन की कथा व्यथा बन जाएगी हमें कहीं वीरत्व धारण करना होगा कहीं शान्त रहना होगा दैन्यभाव हानिकारक है

मानस गीता बहुत अच्छे ग्रन्थ हैं

मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने।


सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम्॥



मनुष्य स्नान करके प्रतिदिन अपने को स्वच्छ कर सकता है, लेकिन यदि कोई भगवद्गीता रूपी पवित्र जल में एक बार भी स्नान कर ले तो वह भौतिक जीवन (भवसागर) की मलिनता से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है ।


सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥

कहीं राम कहीं कृष्ण कहीं अर्जुन बनने की स्थिति हमारे सामने आती रहती है इन सब का समन्वय सामञ्जस्य बैठाकर आनन्दित होकर जीवन को चलाना चाहिए

और हमें इस सदाचार वेला का भी आनन्द लेना चाहिए


इसी प्रकार युगभारती संगठन राष्ट्र के लिए है राष्ट्र से ही हमारी पहचान है यहां हमारा जन्म हुआ है यह दिव्य स्थान है

जब विद्यालय में पानी नहीं रहता था तो आचार्य जी अपने छात्रों को कहां ले जाते थे आदि जानने के लिए सुनें

22.11.21

दिनांक 22/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 कि आई ब्रह्मवेला फिर उठो जागो जगाओ ना!

नये इस नित्य नूतन जन्म का उत्सव मनाओ ना!

रहे यह ध्यान आलस के प्रमादी घन न छा जाएं ,

निशा को दो बिदाई अब उषोत्सव-गीत गाओ ना !


प्रस्तुत है श्रेयोभिकांक्षिन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 22/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

मानस,गीता, उपनिषद्, विवेक चूडामणि और अन्य धार्मिक ग्रंथों का संस्पर्श करके इस सदाचार वेला को आचार्य जी पल्लवित करते रहे हैं l

मनीषी चिन्तक विचारक एकाग्रचित्त होकर अपने को किसी उद्देश्य में लगा लेते हैं l

आचार्य जी को अपने शिक्षकत्व पर गर्व है और आगे भी रहेगा l


एहि महँ रघुपति नाम उदारा।

 अति पावन पुरान श्रुति सारा ll 

मंगल भवन अमंगल हारी।

 उमा सहित जेहि जपत

पुरारी॥

तुलसीदास जी ने राम की कथा के गायन के लिए बहुत सारे ग्रंथों का अध्ययन किया था

आचार्य जी हम लोगों को अभी भी शिक्षार्थी मान रहे हैं और इसी कारण वो चाहते हैं कि हम संतुष्ट हो जाएं


जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता॥

हँसिहहिं कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी॥

 देश की नाव लहरों में झूल रही है तो इस समय हमारा कर्तव्य जाग्रत होने का है पहले हमें देश बचाना है

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजनीति अर्थनीति आचरणशास्त्र इतिहास आदि बहुत कुछ है उसे पढ़ना चाहिए

देश की मनीषा  राष्ट्र के भाव के साथ यदि जुड़ती नहीं है तो हमेशा खतरा बना रहता है

हमने संघर्ष किये हैं और विजय भी प्राप्त की है



भारत के कण कण में अंकित , गौरव गान हमारा हैं! हम हिंदू ऋषियों के वंशज , हिंदुस्तान हमारा हैं!!                                    अंकित हैं इतिहास हमारा,त्यागपूर्ण बलिदानों से ।                        कौन नहीं हैं परिचित जग में,हिंदूवीर संतानो से ।                              रिपु से बातें हमने की हैं,बाणो और कृपाणों से ।                        मातृभूमि मानी हैं हमने,बढ़कर अपने प्राणों से ।                            हिंदुस्तान हमारा हैं बस,यही हमारा नारा हैं ।                             हम हिंदू ऋषियों के वंशज, हिंदुस्तान हमारा हैं!!                                          हम हैं वही जिन्होने रिपु दल को बहु नाच नचाये थे ।                          पथ से भटके अखिल विश्व को , हम ही राह पर लायें थे ।                  रहे विश्वगुरू हमसे ही सब, शिक्षा पाने आये थे!                                         अब भी शक्ति भुजाओं में, वीरों का हमें सहारा हैं!!


हरिसिंह नलवा, गुरु गोविन्द सिंह,रणजीत सिंह,महाराणा प्रताप, शिवाजी आदि वीरों की,ऋषियों की बहुत लम्बी सूची है जिसे पढ़ाने की आवश्यकता है स्वयं तो पढ़ने की है ही 

हम कभी पराभूत नहीं हुए हैं

प्रातःकाल की इस सदाचार वेला का सदुपयोग करना चाहिए धरातल पर उतरकर काम करना चाहिए

प्रयास केन्द्र में एक बैठक होनी चाहिए

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया शशि शर्मा  का भैया आशीष जोग का नाम क्यों लिया आदि जानने के लिए सुनें

12.11.21

दिनांक 12/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है शक्ल आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 12/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

आचार्य जी ने अपना एक अनुभव बताया कि नींद न आने पर वे हनुमान चालीसा की शरण में चले जाते हैं तो नींद आ जाती है

आचार्य जी ने आज हमारा परिचय श्वेताश्वतर उपनिषद् से कराया

ऋषियों के सामने ब्रह्म का एक हरि रूप उभरा होगा


किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठाः।

अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु

 वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्‌॥


ब्रह्म पर चर्चा करते हुए ऋषिगण प्रश्न करते हैं: क्या ब्रह्म (जगत का) कारण है? हम कहाँ से उत्पन्न हुए, किसके द्वारा जीवित रहते हैं और अन्त में किसमें विलीन हो जाते हैं? हे ब्रह्मविदो! वह कौन अधिष्ठाता है जिसके मार्गदर्शन में हम सुख-दुःख के विधान का पालन करते हैं?

कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या।

संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः॥


काल, प्रकृति, नियति, यदृच्छा, जड़-पदार्थ, प्राणी इनमें से कोई या इनका संयोग भी कारण नहीं हो सकता क्योंकि इनका भी अपना जन्म होता है, अपनी पहचान है और अपना अस्तित्व है। जीवात्मा भी कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह भी सुख-दुःख से मुक्त नहीं है।

मानस में 

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।

संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥

विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है, किन्तु संत रूपी हंस दोष रूपी जल को छोड़कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं

:

* अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥

काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं॥

विधाता जब इस प्रकार का (हंस का सा) विवेक देते हैं, तब दोषों को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता है। काल स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग (साधु) भी माया के वश में होकर कभी-कभी भलाई से चूक जाते हैं l

सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥

खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥

भगवान के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुःख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं, परन्तु उनका कभी भंग न होने वाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता

मन पर ही आचार्य जी ने अपनी रची एक बहुत अच्छी कविता सुनाई


मन कभी अतल गहराई या गगन समान ऊंचाई में.....


 कविता का भाव लेखन का भाव,निर्माण का भाव,संगठन का भाव, सामाजिक विचारणा का भाव,कर्म का भाव आदि स्वभाव है

भाव अपना क्रियाशीलता का है वैचारिक हो या मानसिक हो मन तो प्रेरक है इसलिए मन की साधना होती है


तुलसी आदि कवियों ने मन के साथ सामंजस्य बैठाने का प्रयास किया है

मन मनुष्य का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है


आचार्य जी ने

सुनि रन घायल लखन परे हैं....का अत्यन्त मार्मिक प्रसंग सुनाया इन प्रसंगों को जो अंदर तक हमें भिगो देते हैं अपने परिवारों को सुनाएंगे तो संस्कार अवश्य विकसित होंगे विचार पल्लवित होंगे  और सामर्थ्य भी आयेगा

11.11.21

दिनांक 11/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है हमारे औन्नत्य के लिए प्रयासरत अमत्सर आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 11/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

प्रातःकाल हमें आत्मसमीक्षा और आत्मभाव का प्रक्षालन भी करना चाहिए l

सरस्वती पत्रिका के संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को उनकी पत्नी  सुहागरात पुस्तक लिखने पर भावावेग में आकर कई बातें कह गईं लेकिन इस बात ने आचार्य महावीर का मार्गदर्शन कर दिया और फिर उन्होंने सरस्वती पत्रिका का संपादन किया 

 वे संपादक धर्म का पालन करने के कारण काट छांट करने के लिए मना करने वाले विद्वान लेखकों के लेख सादर वापस कर देते थे l

आचार्य जी ने कहा हम लोग मानस और गीता का पाठ अवश्य करें

बालकांड और उत्तरकांड अत्यधिक दार्शनिक और तत्त्वपूर्ण हैं और बाकी में कथा के साथ दर्शन चला है

मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।

गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥

प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी

भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥

भाव अच्छा हो भाषा अच्छी नहीं होती तो भी अच्छी लगती है

आचार्य जी ने एक अत्यन्त रोचक प्रसंग बताया कि एक बंशी वाले बाबा टीन की गाड़ियों से डरते थे  ( हमें इस बात में गहराई देखनी चाहिए ) उनके एक शिष्य अपने सरौंहा गांव के पास कहीं रहते हैं l

टीन आश्रम का छाजन बन जाए तो पूज्य और किसी कबाड़ी के यहां रहे तो बेकार

प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।

दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग॥

स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।

गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥

को उद्धृत करते हुए आचार्य जी ने बताया  कि आपका प्रयास रहता है कि हमारे अन्दर राष्ट्रभाव जाग्रत हो त्याग तपस्या के साथ शौर्य जागे

हम लोग भाषा वाणी पर न जाकर भाव पर जाएं


हम स्वाध्याय करें चिन्तन मनन करें निदिध्यासन करें

परमात्मा हमारे अन्दर है यह भाव सदैव रहना चाहिए

मानस का मूल भाव  बोध यही है कि हम भी संगठित होएं जैसे मानस में तुलसी जी ने भगवान राम का सांगठनिक स्वरूप दिखाया है

3.11.21

दिनांक 03/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है यतात्मन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 03/11/2021 का सदाचार संप्रेषण


आचार्य जी ने बताया पश्चिम यथार्थ तो देखता है लेकिन हम जीवन में उत्साह और जीवन में सातत्य देखते हैं


गगन के उस पार क्या,

पाताल के इस पार क्या है?

क्या क्षितिज के पार? जग

जिस पर थमा आधार क्या है?

दीप तारों के जलाकर

कौन नित करता दिवाली?....

-श्याम नारायण पांडेय


हर जिज्ञासु दीवार के उस पार देखना चाहता है संसार का जिज्ञासु भाव एक धन है l


तुलसीदास जी ने सबसे पहले 

हनुमान चालीसा जानकी मंगल पार्वती मंगल लिखे

और मानस में सबसे पहले अयोध्या कांड लिखा राम के कार्य को मांगलिक रूप से प्रारम्भ किया 

बाल कांड अत्यन्त व्यवस्थित ज्ञान का आधार है और भिन्न प्रकार की समस्याओं का समाधान है

आचार्य जी ने बी एन एस डी इंटर कालेज के पूर्व प्रधानाचार्य श्री सद्गुरु शरण अवस्थी और बारानिकोह से संबन्धित एक रोचक जानकारी दी और बताया कि सद्गुरु जी के अनुसार राम चरित मानस में  उन्नीस हजार शब्दों का प्रयोग हुआ है

क्या तुलसी जी की तुलना मिल्टन शेक्सपीयर आदि से की जा सकती है जिन्होंने छह से आठ हजार शब्दों का ही प्रयोग किया था

हमारे सचमुच के तत्त्व को बहुत नीचे गिराया गया हमारे भाव को कुण्ठित किया गया

हमारे ज्ञान के अथाह भण्डार को कम आंका गया

लेकिन अब इस आत्मबोध को जगाने की आवश्यकता है कि हमारा ज्ञान अत्यन्त अथाह है और इसकी तुलना कहीं से नहीं की जा सकती


वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥1॥


भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।

याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥2॥

 

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥3॥

आदि की अत्यन्त लम्बी व्याख्या की जा सकती है

इसके अतिरिक्त आचार्य जी जब एक शादी में गये थे तो क्या घटना घटी और आचार्य जी ने जे पी आचार्य जी का उल्लेख क्यों किया आदि जानने के लिए सुनें 👇

7.10.21

दिनांक 07/10/2021 (नवरात्र का प्रथम दिवस ) की सदाचार वेला

 यह सदाचार वेला पूरे दिन हमें ऊर्जा देने की वैचारिक ओषधि है स्थितप्रज्ञ आचार्य श्री ओम शंकर जी का सदैव प्रयास रहता है कि यह वेला सार्थक बने आज दिनांक 07/10/2021 (नवरात्र का प्रथम दिवस ) की सदाचार वेला अपनी सार्थकता कैसे सिद्ध कर रही है आइये देखते हैं

कुछ लोग नवरात्र के व्रत अत्यन्त श्रद्धा संयम सेवा समर्पण नियम के साथ करते हैं व्रत अर्थात् संकल्प

सत्य की अपने यहां बहुत महिमा है जैसे एक शब्द है सत्यव्रत

भ्रमित होने पर सत्य का पक्ष लेने के लिए ही कहा जाता है

सत्य का अर्थ है त्रिकाल से अबाधित

वेद अर्थात् ज्ञान, शास्त्र अर्थात् शिक्षा

तैत्तरीय उपनिषद् में शिक्षावल्ली नामक छोटा सा अध्याय है जिसमें स्वरों व्यंजनों का सही उच्चारण आदि बताया गया है

वैदिक मन्त्रों में उच्चारण की क्रिया अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है

यह भी देखा जाता है कहां उतार है कहां चढ़ाव है इस प्रकार की भाषा मन्त्र बन जाती है इसी कारण शाप भी अत्यधिक महत्त्व का होता था और लोग इससे बचते थे

भारत को संपूर्ण विश्व विश्वगुरु मानने के लिए विवश था क्योंकि भारत की भक्ति शक्ति विचार आचरण अनुपमेय था

आचार्य जी इसमें भी प्रयासरत हैं कि हम भारत के सशक्त प्रहरी रक्षक बन जाएं

भारत वह धरती है जो व्यक्ति के पीछे नहीं तत्त्व के पीछे चलती है

आपने मानस से एक प्रसंग लिया 

प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।

सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब॥269॥

इसके अतिरिक्त सुभद्रा माता जी भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी श्री कृष्णदेव जी पू o गुरु जी आदि के प्रसंग क्या थे जानने के लिए सुनें