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6.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 06-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 मिलते रहो जुड़ते रहो मुड़कर न देखो  आपदा। 

संयुत रहो गतियुत रहो लभ शौर्य की शुभ संपदा ।।


प्रस्तुत है सूपसदन ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 06-01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

  526 वां सार -संक्षेप


¹ जिसके पास पहुंचना आसान हो


इन सदाचार संप्रेषणों की स्वीकार्यता इस कारण है कि ये संप्रेषण नित्य हमें सदाचरण के मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करते हैं, संगठन के महत्त्व को बताते हैं जब सामान्य सी जंगली असंगठित अनगढ़   जनजातियां संगठित होकर इतना बड़ा काम कर सकती हैं तो हम भी ऐसा ही कर सकते हैं

,संसारी भाव के कारण अशुद्ध हुए हम लोगों को शुद्ध करने का सहज स्वभाव का बनाने का प्रयास करते हैं, ये संसार के सत्य को भांपने नापने अपने अन्दर प्रवेश कराने की कुंजी हैं

ये संप्रेषण शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनिवार्यता बताते हैं, ये रावणत्व से दूर रहने  और रामत्व को धारण करने का उपाय हैं

ये हमारे ऋषियों चिन्तकों विचारकों मनीषियों दार्शनिकों द्वारा बताई गई सुस्पष्ट जीवनशैली को अपनाने का मार्ग हैं

धर्मरथ साथ हो तो बहुत सारे साधनों की आवश्यकता नहीं रहती

हमारा देश ऐसा है जहां समरांगण में भी सद्गुण सुनाए जाते हैं

मार्गदर्शक कृपालु सब प्रकार के अनुशासनों के देवता शौर्य पराक्रम संयम के प्रतीक हनुमान जी हमें नैराश्य से भय से भ्रम से संकटों से बचाते हैं

आइये चलते हैं लंका कांड में


जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥

ऐसे भगवान राम के समझाने पर भ्रमित 

विभीषण को अब समझ में आ गया है


सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।

एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥80 ख


हनुमान जी के माध्यम से राम तक पहुंचने वाले,हनुमान जी के भक्त , कलियुग के वाल्मीकि तुलसीदास जी ने युद्ध का अद्भुत स्वरूप प्रस्तुत किया है

उधर रावण तो इधर अंगद और हनुमान जी हैं

हनुमान जी रावण से 

कंपत अकंपन, सुखाय अतिकाय काय, कुंभऊकरन

 आदि से किस प्रकार जूझ रहे हैं कवितावली में इसका बहुत सुन्दर वर्णन है


बार-बार सेवक-सराहना करत रामु, 'तुलसी' सराहै रीति साहेब सुजानकी।

लाँबी लूम लसत, लपेटि पटकत भट, देखौ देखौ, लखन! लरनि हनुमानकी॥

5.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 05-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है मीमांसक ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 05-01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

  525 वां सार -संक्षेप


¹ अनुसंधानकर्ता



भावना के साथ की गई प्रार्थना में बल की वृद्धि हो जाती है अपनी भारतीय संस्कृति के  संस्कारों को नई पीढ़ी को संप्रेषित करना हमारा धर्म है

हम भावुक और भावक व्यक्तियों को दिये जा रहे ये संप्रेषण बिना हेतु के नहीं हैं


धरती पर चल रहे भोग काम विकारों पर हमारी पैनी दृष्टि रहे उनसे हम स्वयं तो बचते ही रहें उन पर नियन्त्रण भी रखें

बेचारगी घातक है


संयम नियम ध्यान धारणा प्राणायाम अनिवार्य इसीलिये बताये गये हैं ताकि प्राणों की शक्ति शिथिल न हो और शरीर बोझ न लगे

यम नियम ध्यान धारणा आदि को हमारी शिक्षा से दूर कर दिया गया और वह भोगमयी शिक्षा से बदल दी गई

ऐसी शिक्षा को बदलने के लिये हमें आगे आना होगा 


आइये चलते हैं लंका कांड के

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥

ऐसे 

 धर्मरथ  वाले प्रसंग में


महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥80 क॥


हे धीरबुद्धि वाले सखा!

सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार रूपी   रिपु , क्योंकि हम सार हैं तत्व हैं संसार नहीं, को भी जीत सकता है

 रावण, जिसकी साधना साधनों के लिये थी,

 पर विजय तो बहुत आसान है


मरणशील शरीर धारण किया है तो  कोई व्यक्ति अमर कैसे हो सकता है


यदि व्यक्ति अपने को अजेय (अमर )समझेगा तो सामान्य मनुष्य तो घबराने लगेगा


जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी l


करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥



भगवान् राम भी मनुष्य के रूप में आये और उन्होंने रामत्व की अनुभूति करने वाले वनवासी गिरिवासी आदि को संगठित करके अपने को अमर समझने वाले निशाचरों से धरती को मुक्त करने का संकल्प किया


आचार्य जी ने सदाचरण के अंगों का वर्णन करते हुए कथा को आगे बढ़ाया



सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।

एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥80 ख


इस धर्मरथ के वर्णन से,रावण के अन्त के बाद लंका में रावणत्व प्रवेश नहीं कर पायेगा, यह विभीषण को सुनिश्चित हो गया



भगवान् राम के पास दुविधाग्रस्त देवताओं ने मातलि सारथि के साथ स्वर्णिम दिव्य रथ को भेजा था

जब कि भगवान राम को तो धर्मरथ पर विश्वास था



युद्ध का वर्णन करते हुए आचार्य जी ने बताया कि रावण पहले दिन का रण हार जाता है

4.1.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 04-01- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् | उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् |l 



प्रस्तुत है महारम्भ ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 04-01- 2023 

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

  524 वां सार -संक्षेप


¹ बड़े बड़े कार्यों को हाथ में लेने वाला



ये सदाचार संप्रेषण हमारे अन्दर की सुप्त शक्तियों को जाग्रत करने का प्रयास, भक्ति व भाव की शक्ति को समझने की चेष्टा और उसी शक्ति से अपने सामने आ रही समस्याओं को सुलझाने का उपाय और आज भी बहुआयामी बहुत से दर्शनों को अपनाने वाले धर्म के विस्तार विश्वात्मा भारत की रक्षा में सन्नद्ध महारम्भ  हनुमान जी के कार्यों का विस्तार है उन्हीं की कृपा, छाया,योजना है, भारत मां की सेवा में हम जुटें उसका launchpad हैं 



स्वयं के काम पर ईमान रखना देशसेवा है, 

कि अपने धर्म का सम्मान रखना देशसेवा है, 

सदा सद्भाव से सहयोग करना देशसेवा है, 

पड़ोसी से मधुर संबंध रखना देशसेवा है, 

प्रकृति से प्रेम करना भी अनोखी देशसेवा है, 

मितव्ययिता सरलता और शुचिता देशसेवा है, 

सहज अक्रोध धीरज और मुदिता देश सेवा है

सुसंगति और सेवा भावना भी देशसेवा है।




डा हेडगेवार  भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रारम्भ करने के बाद शुरुआती दिनों में हनुमान जी की मूर्ति के सामने भारतभक्ति आदि की प्रतिज्ञा करवाते थे

आजकल लंका कांड में धर्मरथ का प्रसंग चल रहा है



आचार्य जी ने मानस -पीयूष की चर्चा की

महात्मा श्री अंजनी नन्दन जी शरण  द्वारा सम्पादित "मानस-पीयूष" श्रीरामचरितमानस की सबसे बृहत् टीका है। यह  ग्रन्थ अनेक  रामायणियों,चिन्तकों,विचारकों,  कथावाचकों की व्याख्याओं का एक  उत्कृष्ट संग्रह है।


जिनका भाव सुदृढ़ होता है उनके अन्दर का विश्वास भी सुनिश्चित हो जाता है यहां विभीषण भ्रमित हैं तभी कहते हैं


नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥



उस भ्रम को दूर करने के लिये प्रभु राम कहते हैं वह रथ तो दूसरा ही है जिससे विजयश्री मिलेगी


परमात्मा का भजन आवश्यक है राम राम कहने से भगवान् शिव का भजन होना अद्भुत है


सारथि सुजाना हो जैसे ढीले पहिये को सही करने वाली नीतिकुशल त्यागमयी नारी कैकेयी थीं रथी दशरथ के लिये

 आचार्य जी ने बर बिग्यान बिरति चर्म संतोष कृपाना आदि की व्याख्या की

इतनी चीजों को रखने वाला सारे शत्रुओं को जीत लेगा