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22.9.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 22 सितम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण *785 वां* सार -संक्षेप

 जाति पाँति मत पंथ व्यक्तिहित छोड़ अखंडित राष्ट्र जपें 

हम सब एक सनातनधर्मी  मंत्र जपें दिन रात तपें।


प्रस्तुत है प्रीणन ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 22 सितम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *785 वां* सार -संक्षेप


 1 = जो प्रसन्न या संतुष्ट करता है

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शिवेतर  अर्थात् जो कल्याण से इतर है उसको क्षत करना ही काव्य रचने का उद्देश्य होता है होना चाहिए

आचार्य जी की काव्य रचनाएं इसी उद्देश्य को पूर्ण करती हैं अब इसी रचना को देखिए



दिनरात तन को सोचते जो मन उसी के साथ रख

सुख मानते दिनरात जिह्वा के वशी बहुभोग  चख

वे क्या समझ सकते कि यह संसार अद्‌भुत मंच है


सब मंच मंडप पर चढ़े क्षणजीवियों का संच है


 इसलिए अपने को न उनके साथ तुम जोड़ो सखे


 शुभ दिव्य  जीवन  मन्त्र धारो वह   कि जिससे शिव लखे


शुभ शिव समर्पित दिव्य जीवन तत्व है वरदान है

यह शक्ति संयम साधना  बुद्धत्व का अवदान है



आचार्य जी का भावनात्मक आग्रह रहता है कि इन सदाचार वेलाओं को मन लगाकर हम सुनें और उनमें मनुष्यत्व को परखने वाले भावों को ग्रहण करें  सुप्त ऊर्जा को जाग्रत करें ज्ञान का अनुभव करें साधना में रमने का अभ्यास करें और अपने अन्दर इतनी क्षमता लाएं कि हम भी इसी तरह लोगों को उद्बोधित करने लगें

यह कठिन नहीं है क्योंकि हमारा देश अध्यात्मवादी देश है

भारतीय संस्कृति के हम उपासक सौभाग्यशाली हैं कि हमारा जन्म उस देश में हुआ है जिसने मनुष्य को मनुष्यत्व का बोध कराया है


भारतीय संस्कृति में ही इतनी क्षमता है जो दम तोड़ती मानव जाति को अनुप्राणित कर सके दुर्लक्ष्य की चाह रखने वाले व्यक्तियों को सबक सिखा सके


भारत का भूगोल तड़पता , तड़प रहा इतिहास है

तिनका-तिनका तड़प रहा है , तड़प रही हर सांस है |


शौर्यमय अध्यात्म की पटकथा लिखने वाले राम और कृष्ण हमारे आराध्य हैं


मन बुद्धि विचार तत्व जो हमारे शरीर की  प्राणिक ऊर्जा से संयुत हैं अद्भुत हैं

मैं कौन हूं

शिवोऽहं शिवोऽहम्

ऐसी परम्परा के वाहक हम भ्रमित क्यों रहते हैं

हमको भ्रमित नहीं रहना चाहिए

हम इतने क्षमतावान् हैं कि शून्य से शिखर तक पहुंच सकते हैं

हम गंदगी के परमाणुओं पर ध्यान न देकर आत्मबोध के साथ उन लोगों को साथ में लें जिनमें राष्ट्रनिष्ठा समाजसेवा की ललक है उनको संगठित करें

आचार्य जी ने सहज साधना को परिभाषित किया और बताया कि सहज साधना का परिणाम हमारे सामने है

आचार्य जी ने कहा गांवों को ही तीर्थ बना लें केवल स्वास्थ्य शिविर लगाना पर्याप्त नहीं है लाभार्थियों के प्रति प्रेम आत्मीयता भी आवश्यक है

वार्षिक अधिवेशन में भी प्रेम आत्मीयता के विस्तार पर ध्यान दें


ज्योत से ज्योत जगाते चलो प्रेम की गंगा बहाते चलो,

राह में आये जो दिन दुखी सब को गले से लगाते चलो…


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने वार्षिक अधिवेशन के विषय में और क्या बताया भैया पवन मिश्र भैया पंकज का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें

26.9.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 26 सितम्बर 2022(नवरात्र प्रारम्भ ) का सदाचार संप्रेषण

 सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥

जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥2॥


प्रस्तुत है प्रत्ययकारक आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 26 सितम्बर 2022(नवरात्र प्रारम्भ )

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

सार -संक्षेप 2/59


प्रत्ययकारकः =विश्वास पैदा करने वाला



आत्म का विस्तार जब व्यवहार में प्रकट होता है तब समाज की व्यवस्थाएं हमारे मनोनुकूल बनती हैं इसी मनोनुकूल वातावरण से हम उत्साहित होते हैं ऐसा वातावरण न हो तो हम कुंठित होते हैं 




सांकेतिक व्यवहार /कार्य भी अत्यन्त उपयोगी होते हैं इनसे सिलसिला संयुत रहता है जैसे

कल संपन्न हुआ वार्षिक अधिवेशन जिसे वार्षिक सम्मेलन कहा जाये तो ज्यादा उचित होगा क्योंकि यह अल्पकाल का था चिन्तन अभिव्यक्ति उत्साह का मिलाजुला स्वरूप अधिवेशन है इस सम्मेलन की समीक्षा बैठक अवश्य करें जो सदस्य नहीं आ पाये उनका कुशल क्षेम पूछें


हमारे यहां शिक्षार्थियों को कभी समाज  संपोषित किया करता था ज्ञान और व्यवहार का सामञ्जस्य हमारे देश की शिक्षा की थाती है



आइये अरण्य कांड में प्रवेश करते हैं


चले राम मुनि आयुस पाई, तुरतहि पंचवटी नियराई।



पंचवटी गोदावरी के उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर से लगभग  32 कि.मी.दूर है 


पंचानां वटानां समाहार इति पंचवटी'। ये पांच वट हैं अशोक अश्वत्थ आमलक वट और विल्ब


गङ्गे ! च यमुने! चैव गोदावरी! सरस्वति! नर्मदे! सिंधु! कावेरि! जलेSस्मिन् सन्निधिं कुरु।।

स्नान करते समय यह मन्त्र हम लोग बोलते हैं सन्ध्योपासन में संपूर्ण आर्यावर्त का चिन्तन करते हैं

ऐसी विलक्षण संस्कृति है हमारी , हम लोग अपने को पहचानने की कोशिश करें


गीधराज सै भेंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।

गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ॥13॥


जटायुं जी भगवान् राम को आश्वस्त करते हैं कि आप लोग मेरी छत्रछाया में सुरक्षित हैं अपने लोगों की छाया में परिवार भी सुरक्षित रहते हैं


जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा॥

गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए॥1॥


खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गुंजत छबि लहहीं॥

सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा॥2॥


एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥

सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥3॥



मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥

कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥4॥



ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।

जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥14॥



थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥

मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥1॥


इसके बाद राम गीता प्रारम्भ होगी


भैया दृश्यमुनि, श्री योगेन्द्र भार्गव, भैया डा अमित गुप्त

भैया डा पङ्कज

 भैया मनीष कृष्णा, भैया विधुकांत का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया आदि भी जानने के लिये सुनें

12.9.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 12 सितम्बर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 शास्त्रप्रतिष्ठा गुरुवाक्यनिष्ठा

          सदात्मदृष्टिः परितोषपुष्टिः ।

     चतस्र एता निवसन्ति यत्र

          स वर्तमानोऽपि न लिप्यतेऽघैः ॥ १॥


प्रस्तुत है चञ्चुर आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 12 सितम्बर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

सार -संक्षेप 2/45


यह सदाचार संप्रेषण आचार्य जी  प्रयास केन्द्र के उसी स्थान से कर रहे हैं जिस स्थान से कई वर्ष पूर्व पहला संप्रेषण किया था यहां 

पक्षियों के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं प्रातःकाल का अत्यन्त सुरम्य वातावरण है हरीतिमा छाई है

आगामी वार्षिक अधिवेशन को अत्यन्त सफल बनाने के लिये आचार्य जी अपने सुझाव दे रहे हैं


युगभारती स्वदेशानुराग से परिपूर्ण सक्रिय रहे इसके लिये आचार्य जी के विचार अत्यन्त प्रासंगिक हैं

जो थोड़ा है उसे बहुत समझना चाहिये संतोष बहुत बड़ा धन है

लेकिन प्रयास अवश्य करना चाहिये हम लोग क्लब संस्कृति से अलग हैं हमारी एक दिशा है  हम देखें कि राष्ट्र की सेवा में राष्ट्र के शक्ति संवर्धन में हम कितना प्रयास कर रहे हैं इसका चिन्तन भी होना चाहिये

हमें भूलना नहीं चाहिये कि हमारा ध्येय वाक्य है


" प्रचण्ड तेजोमय शारीरिक बल, प्रबल आत्मविश्वास युक्त बौद्धिक क्षमता एवं निस्सीम भाव सम्पन्ना मनः शक्ति का अर्जन कर अपने जीवन को निःस्पृह भाव से भारत माता के चरणों में अर्पित करना ही हमारा परम साध्य है l "


चौबीस घंटों में हमारे पास कुछ ऐसा समय भी रहता है जो खाली रहता है यदि हम इसे समाज की व्यवस्था में लगा दें लोगों से मिलें टेलीफोनिक संपर्क करें तो यह बहुत अच्छी बात रहेगी 

यही समाजोन्मुखता है

हमारे देश में समय समय पर महापुरुषों का उदय होता रहता है  इन्हीं महापुरुषों के जीवन के प्रकाश में हम अपना मार्ग देखते हैं हम उनके अनुयायी हैं

तर्कोऽप्रतिष्ठो श्रुतयो विभिन्ना

          नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ।

     धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां

          *महाजनो येन गतः स पन्थाः* ॥ ४॥


मार्ग पर हमें चलना है खड़े नहीं होना है कुंठाओं को व्यक्त न कर यह विचार करें कि हम क्या क्या योगदान दे सकते हैं

इसी से व्यक्तिशःसमाजोन्मुखता प्रारम्भ हो जाती है जब संपर्क करते चलते हैं और पता चलता है कि आप भी वही कर रहे हैं जो दूसरा कर रहा है तो यह हमें आनन्द देता है


आजीवन सदस्यता के लिये फोन से संपर्क अवश्य करें कम से कम एक हजार सदस्यों का लक्ष्य बनाएं


लोगों के सद्गुणों को ग्रहण करें दुर्गुणों की ओर ध्यान न दें


इससे संगठन विस्तार लेगा हम भी आनन्दित होंगे समाज भी आनन्दित होगा


समाज के ऐसे चिन्तनशील विचारशील कर्मशील लोगों से भी हम संपर्क करें जो आयु में तो अधिक हैं लेकिन उनके विचार अत्यन्त उपयोगी हैं