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13.5.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 13-05- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 राम नाम को प्रभाउ पाउ महिमा प्रताप 

तुलसी से जग मनियत महामुनि सो ।”



प्रस्तुत है अलुप्तमहिमन् ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज

ज्येष्ठ मास  कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रम संवत् 2080

  तदनुसार 13-05- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  653 वां सार -संक्षेप

1=जिसकी अक्षुण्ण कीर्ति बनी हुई है


आचार्य जी की भाव विचार गुञ्जा भक्ति शक्ति संयम  अध्ययन स्वाध्याय साधना -तत्त्व वाली अभिव्यक्तियां सांसारिकता में लिप्त हम लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं और यह परमात्मा के भक्त सेवक हनुमान जी की कृपा ही है 

हमें इन तत्त्वमय विचारों का लाभ उठाना चाहिए हम लोगों को अपने विचार पल्लवित करने चाहिए हमारी सात्विकता विकसित होनी चाहिए


कलियुग में रामभक्ति का आधार लेकर हम अपनी शक्ति का संचयन कर परमार्थ के लिए तैयार रहते हैं राष्ट्रार्पित जीवन जीते हैं तो यह कलियुग सतयुग बन जाता है



तुलसीदास जी का रामबोला से गोस्वामी तुलसीदास बनने का सफर इतना सरल  नहीं था । उन्होंने अपनी बाल्यावस्था की दीन-दशा को निम्नांकित मार्मिक शब्दों में चित्रित किया है



जायो कुल मंगन बधावनो बजायो सुनि,

भयो परिताप पाप जननी जनक को ।

बारे तेँ ललात बिललात द्वार द्वार दीन,

⁠जानत हौं चारि फल चारि ही चनक को॥

तुलसी सो साहिब समर्थ को सुसेवक है,

⁠सुनत सिहात सोच बिधि हू गनक को।

नाम, राम! रावरो सयानो किधौं बाबरो,

⁠जो करत गिरी तेँ गरु तृन तेँ तनक को॥



मैं तुलसी मँगतों वाले कुल में जन्मा हूँ। न जन्म का बधावा  बजा, जन्म सुनकर माता-पिता दोनों को पाप का परिताप हुआ। छोटे से, दरवाजे दरवाजे ललचाता रोता फिरता हूँ, दीन हूँ

 चार चनों  को चार फल जानता हूँ अर्थात् चार चने मिल जाने से जान जाता हूँ कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष (चारों फल) मिल गये। सो तुलसी समर्थ साहब का एक अच्छा सेवक है, जिससे  करी गई सेवक की तारीफ  सुनकर  ब्रह्मा सराहना करते हैं और सोचने लगते हैं कि यह इतना बड़ा कैसे हो गया। हे राम! आपका नाम  हल्के तिनके  को पहाड़ सा भारी कर देता है

आइये चलते हैं उत्तर कांड में

कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग।

जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग॥102 ख॥


सतयुग, त्रेता और द्वापर में जो सद्गति पूजा, यज्ञ, योग से प्राप्त होती है, लोग वही सद्गति कलियुग में  केवल भगवान के नाम से पा जाते हैं


अपने इष्ट का नाम अन्तर्मन में गूंजता रहे तो आनन्द ही आनन्द है

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं


राम जी का प्रताप कलियुग में स्पष्ट दिखाई देता है


प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।

जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान॥103 ख॥



धर्म के चार चरण (सत्य, दया, तप और दान) विख्यात हैं, जिनमें से कलियुग में एक चरण ही प्रधान है और वह है दान

जिस किसी प्रकार से भी दिया जाए

दान कल्याण ही करता है


चारों युगों में कुछ न कुछ अन्तर है



कल आचार्य श्री वीरेन्द्र पाण्डेय जी   हम सबको छोड़ कर परम धाम चले गए

भैया अनुराग मिश्र 1983 के पिता जी भी कल गोलोकवासी हो गए

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने उत्तरकांड में आगे क्या बताया जानने के लिए सुनें

8.5.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 08 -05- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।

संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥92 क॥


श्री रामजी अपार गुणों के समुद्र हैं  उनकी कोई थाह  नहीं पा सकता है

जैसा संतों से मैंने  सुना था, वही आपको सुनाया



प्रस्तुत है श्रद्धा -सन्तार ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज

ज्येष्ठ मास  कृष्ण पक्ष  तृतीया विक्रम संवत् 2080

  तदनुसार 08 -05- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  648 वां सार -संक्षेप

1=श्रद्धा- तीर्थ


सांसारिकता से मुक्त होकर राममय होकर भावों में बहते हुए भक्ति और प्रेम में गोता लगाने के लिए

आनन्द प्राप्ति के लिए आइये इस सदाचार वेला में प्रविष्ट हो जाएं


जागैं जोगी जंगम, जती जमाती ध्यान धरैं,

⁠⁠डरैं उर भारी लोभ मोह कोह काम के।

जागैं राजा राजकाज, सेवक समाज साज,

⁠⁠सोचैं सुनि समाचार बड़े बैरी बाम के॥

जागैं बुध विद्याहित पंडित चकित चित,

⁠⁠जागैं लोभी लालच धरनि धन धाम के।

जागैं भोगी भोगही बियोगी रोगी सोगबस,

⁠⁠सोवै सुख तुलसी भरोसे एक राम के॥

(कवितावली उत्तरकांड 109 वां छंद )

इस छंद में अलग अलग प्रकार से जागने के कारणों का वर्णन है 

योगी जन, शिव-उपासक और यति जो सदा ईश्वर का ध्यान करने वाले और लोभ, मोह, क्रोध, काम आदि षड्रिपु से डरने वाले हैं वे सदा जगते हैं। राजा  राज-काज के लिए और उनके सेवकगण शत्रु के समाचार सुनकर सोच में पड़कर जागा करते हैं। विद्या हेतु पण्डित लोग एकाग्रचित्त होकर जागते हैं और लोभी जन धन आदि के लालच में, भोगी भोग के लिए, वियोगी विरह में, रोगी रोग के कारण जागते हैं

लेकिन तुलसीदास प्रभु राम के भरोसे सुखपूर्वक सोता है।

राम के प्रेम की अनुभूति गहराने पर आनन्द का लाभ मिल जाता है 

समाधिस्थ होकर सोने की चर्चा है इसमें


भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।

तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन॥92 ख॥

 हम प्रवेश कर चुकें हैं उत्तर कांड में जहां गरुड़ जी और कागभुशुंडी जी का संवाद चल रहा है


पक्षीराज जी मस्त हो गए

उन्हें ज्ञान होने पर भान हो गया कि मैं कौन हूं

वे विष्णु के पार्षद हैं शिष्यत्व की अनुभूति हो गई

प्रेमातिरेक होने पर भेद बुद्धि समाप्त हो जाती है

भक्त भगवान् हो जाता है

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया मंडनमिश्र की चर्चा क्यों हुई आदि जानने के लिए सुनें

2.4.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का चैत्र शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 02-04- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है पेशल ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

चैत्र शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रम संवत्  2080 

तदनुसार 02-04- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  612वां सार -संक्षेप

1 विशेषज्ञ


हम मनुष्य प्रायः मार्ग में ही रहते हैं , लक्ष्य निर्धारित करते हैं और अपने लक्ष्य /लक्ष्यों को पाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं


हमें शिक्षक खोजने का लक्ष्य भी बनाना चाहिए क्योंकि समाज में शिक्षकों का अभाव हो रहा है  सेवकों की वृद्धि से समाज पराश्रित हो जाता है


विचार और व्यवहार का आदर्श शिक्षक के अन्दर आ जाए तो शिक्षक परिवर्तन करने में सक्षम होता है


शिक्षक कुंठित होता है तो समाज में अंधकार फैल जाता है

और शिक्षक जब जाग्रत होता है तो भय भ्रम शोक कुंठा अविश्वास का निवारण कर देता है



उषा सुनहले तीर बरसती, 


जय-लक्ष्मी-सी उदित हुई; 


उधर पराजित काल-रात्रि भी, 


जल में अंतर्निहित हुई। 


वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का, 


आज लगा हँसने फिर से; 


वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में, 


शरद विकास नए सिर से।



सुदृढ़ संस्कारों वाले भैया शशिकांत अग्रवाल जिनको शिक्षकत्व का स्वभाव प्राप्त है वह समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं

आचार्य जी उनके शिक्षकत्व की प्रकाशवान रश्मि की झलक पाकर आनंदित हुए


ऐसे शिक्षकत्व के भाव वाले लोगों के साथ बैठकर हमें कुछ विचारोन्मुख होना चाहिए

उनके  भाव  विचार उनका विश्वास प्रशंसनीय है


उत्तर कांड में भी 


एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥

बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन॥1॥



एक बार श्री रामजी के बुलावे पर  गुरु वशिष्ठ , ब्राह्मण व अन्य  पुरवासी सभा में आए। जब  सब सज्जन यथायोग्य बैठ गए, तब भक्तों के जन्म-मरण का कष्ट मिटाने वाले श्री राम जी  बोले

(भगवान् राम का अहंकारविहीन शिक्षकत्व वाला भाव देखिए )


बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥4॥

आचार्य जी ने बताया कि शिक्षकत्व शिष्यत्व से     चढ़कर आता है  भगवान् राम का बार बार समर्पण का भाव  अद्भुत है


राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा॥

तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू॥4॥


राजतिलक में हर्ष नहीं वनवास में दुःख नहीं

रामत्व देखिए कानन भी अयोध्या जैसा लगेगा

इसी रामत्व को अपने अन्दर लाने की आवश्यकता है

स्वानुशासन का क्या महत्त्व है अपने भीतर की किरण देखने से क्या तात्पर्य है मनुष्यत्व की अनुभूति से दूर होने से क्या हानि है जानने के लिए आचार्य जी का आज का उद्बोधन अवश्य सुनें 


इसके अतिरिक्त



कल दीनदयाल शोध संस्थान के कृषि विज्ञान केन्द्र मझगवां में वीरांगना रानी दुर्गावती की प्रतिमा का अनावरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख माननीय मोहन जी भागवत ने किया इसके साथ ही उन्होंने विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए भारत रत्न सुरर्षि नानाजी देशमुख की कर्मस्थली में रानी दुर्गावती के शौर्य पराक्रम पर प्रकाश डाला

इस अवसर पर अनेक सांसद, विधायक, मंत्री, सतना जिले के अनेक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे

युगभारती की ओर से आचार्य जी के अतिरिक्त


भैया संपूर्ण सिंह जी 78,डॉ प्रवीण सारस्वत जी 82,वीरेंद्र त्रिपाठी जी 82,मनोज अवस्थी जी 84,मोहन कृष्ण  जी 86,प्रदीप बाजपेयी जी 89,अजय कोस्टा जी 91,आलोक पांडेय जी 93,अक्षय अवस्थी जी 2008,डॉ दीपक सिंह जी 2009 उपस्थित रहे

26.3.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का चैत्र शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 26-03- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।

सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥14 घ॥

(बाल कांड से एक सोरठा )



प्रस्तुत है सुप्रतिष्णात ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

चैत्र शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रम संवत्  2080 

तदनुसार 26-03- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  605 वां सार -संक्षेप

1 =किसी विषय का अच्छा जानकार


कर्ममय जीवन जगत का मूल है अकर्मण्यता दोष है 

असामान्य आचार्य आo श्री ओम शंकर जी हमें इन सदाचार संप्रेषणों के माध्यम से प्रेरित करते हैं कि हम लोग कर्ममय जीवन अपनाएं

किसी भी कार्यक्रम के लिए हमारा उत्साह बना रहना चाहिए  29 व 30 को सरौंहां में हम लोगों ने एक कार्यक्रम करने का संकल्प  किया है और 31 को चित्रकूट जाने की योजना बनाई है ये संकल्प टूटने नहीं चाहिए


इसी कर्ममय जीवन की प्रेरणा देने वाली  संतोष सहारा देने वाली सचेत जीवित जाग्रत संगठित होने का उत्साह देने वाली रामकथा


निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी

में आइये प्रवेश करते हैं



मैली चादर  ओढ़कर श्री राम की    कलि कलुष बिभंजनि गूढ़ कथा हम समझ ही नहीं सकते हमें तो अपने विचार विमल करने ही होंगे

कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।

दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड॥


रामचरितमानस में चार वक्ता और चार श्रोता है:

 कागभुसुंडी ने गरुड़ जी को रामकथा सुनाई,शिवजी ने पार्वती जी को,याज्ञवल्क्य जी ने भारद्वाज जी को और

 तुलसीदास जी,जो नाभादास के अनुसार कलिकाल के वाल्मीकि थे

इतिहासकार स्मिथ के अनुसार  ‘मुगलकाल के सबसे   बड़े  व्यक्ति’ थे 

ने संतों के समूह को रामकथा सुनाई

राम कथा ऐसे समय में लिखी गई जब दुष्ट अकबर का शासन था और इस कथा ने बुझती ज्योति को जलाने का काम किया इस तरह के संतों की परम्परा ने भारतीय जीवन दर्शन को प्राणिक ऊर्जा प्रदान की भारतीय शैली को सुरक्षित रखा शौर्य शक्ति को परिमार्जित किया यह संतत्व है 



संवत् सोलह सौ इकतीसा। करौं कथा हरिपद धरि सीसा।।


नौमी भौम वार मधुमासा। अवधपुरी यह चरित प्रकासा।।”


मानस की रचना संवत 1631 ई० में चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, नवमी तिथि, मंगलवार को पूर्ण हुई थी।


उत्तर कांड में


संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥

संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥3॥


वैश्विक कल्याण की चाह रखने वालले भरत जी पूछ रहे हैं संत के साथ असंत के लक्षण भी बता दीजिये

सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ॥

तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कपिलहि घालइ हरहाई॥1॥

दुष्टों से हमें सचेत रहना चाहिए

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया भैया हरीन्द्र त्रिपाठी जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

24.3.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 24-03- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है कुड्मलित ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रम संवत्  2080 

तदनुसार 24-03- 2023

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  603वां सार -संक्षेप

1 =हंसमुख


सदाचारमय विचार प्राप्त कर हम अपने व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाने का प्रयास करते हैं

आचार्य जी हमें प्रेरित करते हैं कि रामचरितमानस श्रीमद्भग्वद्गीता उपनिषदों के साथ साथ हम अपने साहित्य की अन्य कृतियों को खोजें उनका अध्ययन करें


साथ ही साथ हम शयन जागरण खानपान आदि का भी ध्यान रखें ताकि हम स्वस्थ रहें

आनन्दित रहें


शरीर को सहायक बनाए रखने के लिए नियम व्यवस्था के अतिरिक्त अपने इष्ट पर पूर्ण आस्था रखें


अपनी युगभारती के अन्य बन्धुओं से प्राप्त आत्मीयतापूर्ण सहायता के लिए भैया अजय शंकर द्वारा व्यक्त की गई कृतज्ञता की चर्चा करते हुए आचार्य जी ने बताया  कि कर्तव्यभाव से काम करने और अत्यधिक आत्मीयता से काम करने में अन्तर होता है



अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।


निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।12.13।।


सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।


मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।12.14।।


समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।



इस संतत्व में सभी से बहुत अधिक लगाव हो जाता है

यह लगाव परमात्मा की अद्भुत लीला है लगाव देश व्यक्ति स्थान किसी से हो सकता है कामनारहित संत संसार के वैविध्य पर हंसता है


शान्ति वैराग्य विनम्रता मुदिता उपेक्षा संत के लक्षण हैं


संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥

काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई॥4॥


हम प्रवेश कर चुके हैं उत्तर कांड में


आइये आगे चलते हैं

संतत्व सशर्त नहीं होता है यह स्वभाव होता है


बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दु:ख दुख सुख सुख देखे पर॥

सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी॥1॥


भगवान राम संतों के लक्षण बता रहे हैं


संत विषयों में लिप्त नहीं होते,  वे सद्गुणों  का खजाना होते हैं, उन्हें परदुःख देखकर दुःख और सुख देखकर सुख होता है।  उनके मन में कोई उनका शत्रु नहीं है। वे मद से रहित  वैरागी होते हैं  लोभ, क्रोध, हर्ष  भय आदि विकारों से दूर रहते हैं



तुलसीदास का भी संतत्व देखिए वो विदुषी रत्नावली के प्रति कृतज्ञता दिखाते हुए कहते हैं कि तुमने मुझे प्रभु राम से मिलाया

यद्यपि संन्यासी के लिए अंत्येष्टि करना वर्जित है लेकिन शंकराचार्य ने अपनी मां की और  रामचरित मानस को हृदय से लगाकर जीवनभर तप करने वाली अपनी पत्नी की तुलसीदास ने अंत्येष्टि की है


संत अकुतभय होता है

इसके अतिरिक्त किस महापुरुष को आचार्य जी ने अजातशत्रु बताया जानने के लिए सुनें

23.3.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का चैत्र शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 23-03- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है कुलम्भर -रिपु ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

चैत्र शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रम संवत्  2080 

तदनुसार 23-03- 2023

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  602 वां सार -संक्षेप

1 कुलम्भरः =चोर


मनुष्य की परस्थ होकर विचार करने की वृत्ति पतनोन्मुखी वृत्ति है जो प्रायः अधिकांश में होती है लेकिन हमें आत्मस्थ होकर आत्मोन्नति के उपाय खोजने चाहिए


हम अपने समाज में उचित व्यवहार का अभाव देखते हैं जिसका कारण संस्कारहीनता है इसी कारण समाज में हमें यदि उचित व्यवहार देखना है तो उचित शिक्षा महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि शिक्षा संस्कार है संस्कार से विचार उत्पन्न होते हैं और विचार से व्यवहार आता है


 इस उचित शिक्षा की महत्ता दर्शाते ये सदाचार संप्रेषण हमें आत्मोन्नति के उपाय भी बताते हैं

इन संप्रेषणों से समझ में आता है कि  भारतीय संस्कृति विलक्षण है  अक्षय है इस संस्कृति को समाप्त करने के बहुत से उपाय किये गए लेकिन यह अक्षय ही रही



हम भारतीय संस्कृति के उपासक कभी हताश नहीं हुए

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥


यह हरिनाम का जप प्राणिक ऊर्जा को उत्पन्न कर देता है प्राणिक ऊर्जा के बिना शरीर कुछ भी नहीं है इसी प्राणिक ऊर्जा में भक्ति भाव शक्ति आदि बहुत कुछ है लेकिन इसकी अनुभूति संस्कारों से ही की जा सकती है

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः वाला भाव हमारे अन्दर धीरे धीरे प्रवेश कर रहा है लेकिन इस जागरण में हम उन्माद से ग्रसित न हों हमें तो संतवृत्ति अपनानी है


जिसके लिए आइये चलते हैं रामचरित मानस

जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी

के 

उत्तर कांड में


सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिर नाए॥

पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं॥1॥


भगवान् राम से जानना चाहते हैं कि संत की महिमा क्या है


संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥

भगवान् राम कहते हैं

 अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥3॥


संतों, असंतों की करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चंदन का आचरण होता है। कुल्हाड़ी चंदन को काटती है क्योंकि उसका स्वभाव ही काटना है लेकिन चंदन अपने स्वभाव के कारण अपना गुण देकर उसे भी सुगंधित कर देता है

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने और क्या बताया जानने के लिए सुनें

13.3.23

 प्रस्तुत है मेध्य ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

चैत्र कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रम संवत्  2079

तदनुसार 13-03- 2023

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  592 वां सार -संक्षेप

1=पुण्यशील




भारतीय चिन्तन की विधि है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य का मनुष्योचित विकास हो

इन सदाचार वेलाओं का मूल उद्देश्य है कि हम सदाचारमय विचार ग्रहण कर ऊर्जा से भर जाएं हमारी अध्यात्म की ओर उन्मुखता हो लेकिन वह शौर्य प्रमण्डित ही हो




सदा वेदपथ की ओर चलने वाले तुलसीदास जी कहते हैं



श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।

किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़॥

विषम परिस्थितियों में लिखी रामचरित मानस के  गूढ़ तत्व को समझने के लिए हमें इस कथा को बार बार   पढ़ना पड़ेगा


मानस के उन भावों में हम भी जाने का प्रयास करें जिन भावों से भावित होकर तुलसीदास जी ने वह तत्व हमें दे दिया


आइये चलते हैं उत्तर कांड में

बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।

चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥20॥





धर्म इस समय बहुत चर्चा का विषय है वर्णाश्रम व्यवस्था भारतवर्ष का वैशिष्ट्य है

यह समाप्त नहीं किया जा सकता यह व्यवस्था संपूर्ण प्रकृति में है स्थावर जंगम में है हमें इन्हें समझने के लिए समय भी चाहिए हमें समय के सदुपयोग के लिए भी प्रयास करना चाहिए


हम सूक्ष्मतत्त्व लेकर अवतरित हैं महातत्त्व लेकर अवतरित हुए शंकराचार्य बहुत कम समय में ही बहुत कुछ कर गए

कोई भी काम अच्छा है बस मन उसमें रम जाए संत रविदास पुराने जूते बनाते थे

उन्होंने इसी जूते के काम में परमात्मा के दर्शन कर लिए

यह भारतीय जीवन दर्शन है 


जब हम अपना पथ त्यागकर दूसरे के पथ पर प्रवेश कर जाते हैं तो हमें भय रोग शोक आदि होते हैं 


संघर्ष वहीं होता है जहां लगता है हम सही हैं दूसरा गलत है बहुत प्रकार के पंथ हैं सभी  एक  स्थान पर जाते हैं लेकिन ऐसा भी होता है कि लोग पंथों को ही गंतव्य मान लेते हैं

बीज कभी मरता नहीं इसकी आचार्य जी ने बहुत सुंदर व्याख्या की

हम अपने कर्तव्य को समझें

अपने दर्शनतत्व को भी जानने का प्रयास करें 



आचार्य जी ने यह भी कहा कि कोई भी forwarded message भेजने से पहले उसे भली भांति जांच लें



आचार्य जी ने भैया डा अनुराग भैया आलोक सांवल भैया राहुल मिठास भैया डा मधुकर भैया मनीष का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें

3.3.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन शुक्ल द्वादशी विक्रम संवत् 2079 तदनुसार 03-03- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है ज्ञान -अम्बुभृत् ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

फाल्गुन शुक्ल द्वादशी विक्रम संवत्  2079

तदनुसार 03-03- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  582 वां सार -संक्षेप

1 अम्बुभृत् =समुद्र



परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।


धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।


जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥

ये छंदों के रूप में व्यक्त अद्भुत भाव हैं और यह कवित्व सबको प्राप्त नहीं होता लेकिन हम सौभाग्यशाली हैं कि इस भारतवर्ष की धरती पर जन्मे हैं यहां तो ऐसे कवित्व को प्राप्त कवियों की बहुत लम्बी सूची है

सूर्य की तरह प्रकाश बिखेरने वाले ये कवि हमारे मार्गदर्शक हैं जो 

हमें अंधकार में भटकने से बचाते हैं

रोम रोम में रमे परमात्मा राम की कथा कहने वाले अनेक ऋषियों मनीषियों कवियों ने भी यही प्रयास किया है कि किस प्रकार भगवान् राम, जिनके सामने तो विकट समस्याएं आईं, से प्रेरणा लेकर  हम अपने पौरुष को जाग्रत कर सकते हैं समस्याओं के समाधान के लिए निर्भय होकर जूझते रह सकते हैं


वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः के भाव के साथ शौर्य की उपासना हमारा उद्देश्य है

आइये चलते हैं इन्हीं भावों को धारण करते हुए तुलसीदास जी की अत्यन्त मोहक रामकथा में

उत्तर कांड में आगे



अयोध्या में सबको सबके अनुकूल सम्मान मिल रहा है प्रेम आत्मीयता से लबरेज वातावरण है


कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।

आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ॥8 क॥



फिर नल नील विभीषण सुग्रीव आदि ने मां कौशल्या के चरणों में मस्तक नवाए। मां जी ने हर्षित होकर आशीषें दीं और कहा तुम मुझे राम के समान प्रिय हो क्योंकि तुम लोगों ने 

राम की सुरक्षा सेवा की है 

पूरे अयोध्या में हर्ष का वातावरण है हर जगह सजावट हो रही है



प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी॥

ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥1॥


सबसे पहले मां कैकेयी के घर  राम जी गये

उस समय मां कैकेयी का ज्ञान जागा था जब उन्होंने राम जी को वन भेजा था क्योंकि उन्हें तो मालूम था कि प्रभु का जन्म  पूरे संसार को आतंकित करने वाले रावण के साथ अन्य राक्षसों को मारने के लिये हुआ है

इस समय राम और कैकेयी का बहुत मार्मिक मिलन है



आचार्य जी ने यह भी बताया कि राम जी मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहे जाते हैं

अपने दर्द मैं दुलरा रहा हूं की कौन सी कविता आचार्य जी ने सुनाई जानने के लिये सुनें

28.2.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन शुक्ल नवमी विक्रम संवत् 2079 तदनुसार 28 -02- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है प्रवीर ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

फाल्गुन शुक्ल नवमी विक्रम संवत्  2079

तदनुसार 28 -02- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  579वां सार -संक्षेप

1 =शौर्य- सम्पन्न


भ्रम विचलन मनुष्य की समस्याओं को और बढ़ा  देता है लेकिन यदि हम अदृश्य शक्ति परमात्मा पर विश्वास करें तो असंभव दिखने वाले कार्य भी पूर्ण हो जाते हैं

जब हम अपनों के लिये कुछ अच्छे कृत्य करेंगे तो हमें यशस्विता मिलेगी जिससे हमें

 आनन्द मिलेगा

हमारा लक्ष्य भी यही है

राष्ट्र निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष


नाना जी कहते थे मैं अपने लिये नहीं हूं अपनों के लिये हूं


अपने वे सब हैं जो राष्ट्र भक्त हैं

समस्याएं आती हैं  फिर भी परमार्थ की अनुभूति  के लिये हम कृतसंकल्प हों तो वास्तव में यह यशस्विता ही देगा


स्व का पर में विलीन होना परा अवस्था है




आइये प्रवेश करते हैं उत्तर कांड में



लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ।

कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ॥6 ख॥



सासुन्ह सबनि मिली बैदेही । चरनन्हि लाग हरषु अति तेही॥

देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता॥1॥



तुलसीदास जी ने भगवान् राम का आदर्श परिवार प्रस्तुत किया है क्योंकि उस समय अकबर के काल में विग्रह दिख रहा था और हम लोग भी विग्रह की चपेट में आ गये थे जिससे हम लोग इस हाल में आ गये

हमें अंधकार की परवाह नहीं करनी है 

हम लोग प्रकाश की किरण हैं तो हम अंधकार से  लड़ने के तैयार रहें


परिवार और बाजार में अन्तर है परिवार के फूलदान को सजाए रहिये मानस में यही बताया गया है

आचार्य जी ने मानस के बहुत मार्मिक प्रसंग बताये

इसके अतिरिक्त आचार्य जी

ने

भैया शान्तनु अग्रहरि जी, भैया भुवनेश प्रताप सिंह जी द्वारा लिखित

Win Over Everyday Battles The Gita Way की चर्चा की

भैया संजय सिंह आजाद जी का नाम कैसे आया जानने के लिये सुनें

22.2.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन शुक्ल तृतीया विक्रम संवत् 2079 तदनुसार 22 -02- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥


पानी से छोटी नदियाँ भरकर किनारों को तुड़ाती हुई चलीं, जिस प्रकार थोड़े धन से  भ्रमित होकर दुष्ट इतराने लगते हैं


प्रस्तुत है  सरभस ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

फाल्गुन शुक्ल तृतीया विक्रम संवत्  2079

तदनुसार 22 -02- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  573 वां सार -संक्षेप

1 = प्रसन्न


स्थान :सरौंहां

अत्र कुशलं तत्रास्तु




समस्याओं से भरे इस संसार में हमें क्षुद्र नदियों जैसा न होकर एकाग्र होकर किसी भी प्रकार के भ्रम, भय और शैथिल्य को त्यागकर अपनी देवभूमि स्वर्णभूमि रत्नभूमि भारत मां की सेवा के लिये तत्पर रहना चाहिये हमारा उद्देश्य भी यही है

राष्ट्र निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष

हमें  असामान्य अद्वितीय आचार्य जी द्वारा प्रोक्त सदाचार संप्रेषणों के रूप में प्राप्त आनन्द के इन क्षणों का लाभ उठाना चाहिये हमें आत्मस्थ होने का प्रयास करना चाहिये 

आत्मस्थता से शरीर के, परिवेश के विकार प्रभावित नहीं करते

अपनी अन्तः और बाह्य प्रकृति दोनों को आनन्दमय बनाकर उत्साहित होने का प्रयास करें हम प्रसन्न हैं तो सर्वत्र प्रसन्नता का हम अनुभव करेंगे


आइये प्रवेश करते हैं रामकथा में

उत्तर कांड में आगे


भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं।

कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि॥2 ख॥


फिर भरत जी के चरणों में सिर झुकाकर हनुमान जी तुरंत प्रभु राम जी के पास आ गए और  उन्होंने सब कुशलता का वर्णन कर दिया तब प्रभु राम हर्षित होकर विमान पर चढ़कर चल दिये



इधर भरत जी भी खुश होकर अयोध्या  आए और उन्होंने गुरु वशिष्ठ जी को सारा समाचार सुनाया! फिर राजमहल में समाचार दिया कि श्री राम  नगर को आ रहे हैं


श्री रामजी के स्वागत के लिए दही, दूब, रोचना , फल, फूल एवं तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोने की थाली में भर-भरकर  सौभाग्यवती स्त्रियाँ गाती हुई चलीं


आचार्य जी ने अनिरुद्धाचार्य, भैया अजय शंकर, भैया पंकज की चर्चा क्यों की आचार्य जी चित्रकूट कब जा रहे हैं  डंड़वाड़ा क्या है जानने के लिये सुनें