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13.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 13 अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ।

तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥ 38॥


संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥

निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥4॥


संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥

सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥3॥




प्रस्तुत है ज्ञान -समीच आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 13 अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/76

समीचः =समुद्र

बालकांड और अरण्यकांड की उपर्युक्त पंक्तियों का बहुत विस्तार हो सकता है जैसा मानसपीयूष में कुछ विस्तार है 

आचार्य जी गुरु के रूप में हमें सन्मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करते हैं 

आचार्य जी को गुरुता इस कारण मिली है कि उनका अंधकार विदीर्ण हो गया है और उन्हें सुस्पष्ट दिखाई देता है और इसीलिये वे इन सदाचार वेलाओं में ऐसे विषय उठाते हैं जिनके माध्यम से हम इस संसार में रहते हुए संसार की समस्याओं को केवल नाटक के दृश्य समझें

हम अपनी इच्छानुसार आनन्द का क्षेत्र  ढूंढे  वह संगीत गायन वादन कीर्तन लेखन आदि कोई भी क्षेत्र हो सकता है

यह संसार अकेले चलने का पथ नहीं है हम समूह में चलते हैं तो ही आनन्द में रहते हैं अकेले यात्रा बोझ हो जाती है

संसार को समझना है तो इस स्वरूप का आनन्द हमें लेना ही होगा 

संसार की समस्याओं से हम बच नहीं सकते और इनसे जूझने के लिये हमें आत्मशक्ति चाहिये

और आत्मशक्ति के लिये आवश्यक है कि शरीर के अन्दर अवस्थित आत्मा और परमात्मा का स्वरूप आनन्दित हो

मेरे अन्दर कितना शिवत्व है इसकी अनुभूति करें

अर्जुन के प्रश्न





प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च।


एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।13.1।।


 हे केशव ! मैं, प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।

पर भगवान् कहते हैं




इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।


एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।13.2।।



 हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र  है और इसको जो जानता है, उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

स्वाध्याय भक्ति अध्ययन सद्संगति संयम नियम शौर्यप्रमंडित अध्यात्म आदि हमें जानना ही होगा


अरण्य कांड में


रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।

राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग॥46 क॥




दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।

भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग॥46 ख॥


का उल्लेख करते हुए आज आचार्य जी ने अरण्यकांड का समापन किया

इसके अतिरिक्त  आदरणीय बालेश्वर जी भैया पंकज जी का नाम क्यों लिया तवे पर कौन बैठ गया आदि जानने के लिये सुनें

12.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 12 अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 मैंमंता मन मारि रे, नान्हाँ करि करि पीसि।

तब सुख पावै सुंदरी, ब्रह्म झलकै सीसि॥



प्रस्तुत है कितवारि आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 12 अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/75

कितवः =धूर्त



संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥

सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥3॥


षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥

अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी॥4॥


अरण्यकांड की इन चौपाइयों का उल्लेख करते हुए आचार्य जी कहते हैं


संत वह नहीं है जो जपमाला करने में व्यस्त है और  त्राहि त्राहि कर रहे लोगों की आवाज उसे सुनाई न दे

अपितु


संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥

निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥4॥


संत  हृदय मक्खन के समान होता है, ऐसा कवियों ने कहा है,  मक्खन  ताप को प्राप्त करने से पिघलता है और अत्यन्त पवित्र संत दूसरों के दुःख से पिघल जाते हैं


संत असंत में अन्तर है



जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।

रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।।



निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥



राम सही अर्थों में संत है जिन्होंने अनेक दुष्टों का संहार करके संतों की रक्षा की जन्म से लेकर अवसान तक कभी हार नहीं मानी किसी के साथ अन्याय नहीं किया राम ने अपने अन्दर के भाव को नहीं त्यागा सब लोगों ने भगवान् राम पर विश्वास किया 



संत वह है जो सतर्क बुद्धि के साथ समय पर उचित निर्णय लेने की क्षमता रखता हो आवश्यकता होने पर संत खड्ग उठा सकता है


भोग का लोभ और मुक्ति का लोभ दोनों ही हानिकारक हैं



विवेकानन्द की तरह नौजवानों को भावी पीढ़ी को जाग्रत करना सही गलत में अन्तर बताना सनातन धर्म, राष्ट्र के प्रति आस्थावान बनाना उनके  पराक्रम शौर्य को जाग्रत करना हम अपना उद्देश्य बनायें इसे PERSONALITY DEVELOPMENT कह सकते हैं


चारित्र्यसंपन्न हिन्दुओं का संगठन खड़ा करने का विचार हेडगेवार के मन में आया था



जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा॥

श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया॥2॥


बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना॥

दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ॥3॥


गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला॥

मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सादर श्रुति तेते॥4॥



कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।

अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥

सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।

ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥


तुलसीदासजी कहते हैं कि वे लोग धन्य हैं, जो  केवल श्री हरि के रंग में रंग गये हैं

10.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 10 अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है शुक्षि -स्तम्भ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 10 अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/73

शुक्षि =प्रकाश 


कई बार विषम परिस्थितियों में इन सदाचार संप्रेषणों का प्रसारण होता है यह परमात्मा की कृपा है 


राम चरित मानस अद्भुत ग्रंथ है जो ज्ञान चिन्तन मनन ध्यान और अन्य भावों को एक साथ रख देता है


आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि इसे अवश्य पढ़ें

इससे हमारे विचार परिष्कृत होंगे शान्ति मिलेगी संसार का भी ज्ञान होगा और संसारेतर तो होगा ही




एक ही व्यक्ति अर्थात् तुलसीदास में इतने सारे गुण आश्चर्य का विषय है



अब हम अरण्य कांड के समापन की ओर उन्मुख हैं


भाव जब किसी मुख्य सूत्र से समर्पित हो जाता है तो उसका सीधा सम्बन्ध हो जाता है यहीं भाव की प्रबलता परिलक्षित होती है भक्त का भगवान् से तादात्म्य स्थापित हो जाता है


भक्ति और भाव के माध्यम से भीलिनी निषाद भरत आदि का परमात्मा तक सीधा संपर्क सूत्र संयुत है


यह अद्भुत ज्ञान है

ज्ञान और भक्ति एक स्थान पर मिल जाते हैं और

भक्त विश्वासी  भी होते हैं



पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥

सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥6॥



बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई॥7॥




कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदय पद पंकज धरे।

तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥

नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।

बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥


सारा कथाप्रबन्ध कहकर भगवान के  दर्शन कर योगाग्नि से देह  त्याग कर शबरी वहां चली गई, जहाँ से लौटना नहीं होता। तुलसीदास  कहते हैं कि अनेक प्रकार के कर्म,  मत शोकप्रद हैं,

  इनका त्याग कर दो और विश्वासी बनते हुए  रामजी के चरणों में प्रेम करो।


चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ॥

बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा॥1॥

लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा॥


यह संसारी भाव है रोना गाना संसार का अद्भुत स्वरूप है



नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा॥2॥


हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥

तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥3॥



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कल संपन्न हुए कार्यक्रम की चर्चा की


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7.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 7 अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।


प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।17.4।।




प्रस्तुत है ज्ञान -निश्रयणी आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 7 अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/70

निश्रयणी =सीढ़ी


गीता के इस छन्द का अर्थ है 

सात्त्विक जन देवताओं का पूजन  अर्थात् सात्त्विक पूजन करते हैं,राजसी  यक्ष और राक्षसों को, तथा अन्य तामसी जन प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।।


मनुष्य के अन्दर उठ रहे भाव  विचारों को पल्ल्वित करके व्यवहार रूप में  बहुत से सिद्धान्त प्रस्तुत कर देते हैं

सात्त्विक पुरुष कहते हैं ये सब ईश्वर करता है




हम अपने अन्दर के सात्त्विक तत्त्व को उचित खानपान, उचित आहार विहार उत्तम विचारों के माध्यम से विकसित करें जिसके लिये सद्सङ्गति स्वाध्याय ध्यान धारणा संयम निदिध्यासन आवश्यक है 

सभी कर्मशील व्यक्तियों के शरीर मन बुद्धि एकाकार होने के लिये उत्साहित होते रहते हैं और इन व्यक्तियों का   जीवन  यज्ञ नित्य चलता रहता है 



कल 10 से 14 नवंबर 2022 के मध्य मियागंज में होने वाले राजसूय यज्ञ का  भूमि पूजन संपन्न हुआ जिसमें कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इस यज्ञ के अध्यक्ष परम आदरणीय पूज्य आचार्य श्री ओम शङ्कर जी, भैया मुकेश जी,क्षेत्रीय विधायक श्री बंबा लाल जी, बांगरमऊ विधायक श्री कटियार जी,तहसील हसनगंज के एसडीएम साहब, मियागंज ब्लाक के बीडीओ साहब आदि ने भाग लेकर प्रसाद ग्रहण किया

आइये एक बार फिर से अरण्यकांड में प्रवेश करते हैं


सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।

जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ॥ 31॥


हे तात! सीता हरण की सूचना पिताजी को न दें । यदि मैं राम हूँ तो दशमुख परिवार सहित स्वर्ग में स्वयं ही कहेगा



गीध देह तजि धरि हरि रूपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा॥

स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी॥1॥


जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही।

दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही॥

पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं।

नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं॥1॥


बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं।

गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं॥

जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।

नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं॥2॥



सुनहू उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।

पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई॥2॥

संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन॥

आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता॥3॥



सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता॥

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥1॥


शाप देता , मारता  और कटु वचन कहता  ब्राह्मण  पूजनीय है, संत ऐसा कहते हैं। शील और गुण से रहित भी ब्राह्मण पूजनीय है।  गुण गणों से युक्त और ज्ञान में निपुण  शूद्र पूजनीय नहीं है


ब्राह्मण का अर्थ है जो सतत ब्रह्म के चिन्तन में डूबा रहे संसार से उसे कोई मतलब न रहे


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया निर्भय जी भैया आलोक जी ( सतना ), हिटलर का नाम क्यों लिया

बबूल के पास दिया कौन रखता था आदि जानने के लिये सुनें

4.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 4 अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥5॥


बुरे रास्ते पर पैर रखते ही शरीर में तेज, बुद्धि,शक्ति सामर्थ्य बिल्कुल भी  शेष नहीं बचता

और जिसके अन्तरचक्षु बन्द हैं वह गलत काम कर ही जाता है हाल की घटना देखें तो वनन्त्रा रिजार्ट कांड है




मनीष कृष्णा जी आपके लिये प्रश्न है

खगेस का क्या अर्थ है?



प्रस्तुत है शारद आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 4अक्टूबर 2022

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सार -संक्षेप 2/67


शारद = निपुण


तन मन बुद्धि का बहुत अच्छा सामञ्जस्य हो तो विचार पल्लवित होने लगते हैं और उन विचारों के पल्लवन के साथ जब वाणी का व्यवहार दिखता है तो वह प्रभावशाली होती है



आइये अरण्यकांड में प्रवेश करते हैं आज के समय में व्यावहारिक परिस्थितियां उत्पन्न करने की प्रेरणा देती है रामकथा


प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी॥

तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा॥7॥


कभी प्रकट होता हुआ और कभी छिपता हुआ  बहुत प्रकार के छल करता हुआ मारीच भगवान् राम  को दूर ले गया। तब रामजी ने निशाना लगाकर कठोर बाण मारा और वह चिल्लाता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा


भगवान् तो उसे पहले ही मार सकते थे दूर जाना ही नहीं पड़ता लेकिन यही लीला है



लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा॥

प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा॥8॥


पहले लक्ष्मण का नाम लिया ताकि सीता को भ्रम हो जाये कि वे संकट में हैं फिर भगवान् राम का नाम लिया प्राण त्यागते समय उसने अपना राक्षसी रूप प्रकट किया और प्रेम के साथ भगवान् राम का स्मरण किया।


सर्वज्ञ राम ने उसके  प्रेम को जानकर उसे वह गति  दी जो मुनियों को भी दुर्लभ है।



खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा॥

आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता॥1॥


मारीच को मारकर श्री राम तुरंत लौट पड़े। हाथ में धनुष और कमर में तरकस शोभायमान हैं इधर जब सीताजी ने दुःखभरी वाणी  सुनी तो वे बहुत ही भयभीत हो गईं


सांसारिक सीता जी को भय होगा जब कि साक्षात् सीता तो अग्नि में प्रवेश कर गई हैं

*प्रश्नोत्तर वेला की योजना बनाकर इसे विस्तार दिया जा सकता है*



जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता॥

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई॥2॥



मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥

बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू॥3॥


लक्ष्मण को माया प्रभावित नहीं कर रही है जब कि सीता को कर रही है

लेकिन मर्मस्थल को चुभ जाने वाले सीता जी के वचनों से लक्ष्मण जी का मन डोल गया मति नहीं डोली



सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा॥

जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं॥4॥


सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाईं॥

इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥5॥



क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।

चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ॥28॥


बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा॥

सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी॥3॥


गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥

अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥4॥



जटायु ने सीताजी की दुःखभरी वाणी सुनते ही पहचान लिया कि ये रामजी की पत्नी हैं। उसने देखा कि नीच  इनको इस तरह लिए जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के हाथ आ गई हो



चर अचर जीव सब दुःखी हो गये


यदि जटायु ऐसा कर सकते हैं तो हम भी बहुत कुछ कर सकते हैं



सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा॥

धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसें॥5॥


ऐसा आत्मविश्वास होना चाहिये आज के समय में तो इसकी बहुत आवश्यकता है

3.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी कादिनांक 3अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है ज्ञातृत्व - सागर आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 3अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/66


ज्ञातृत्व =ज्ञान



माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।

बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥15॥




रामकथा के माध्यम से अपनी व्यथाएं शमित करें

अपने को दीन हीन बेचारा न समझें  संसार में संयोग एक अदृश्य शक्ति का लीला क्रम है इस दिव्यता का अनुभव करते हुए संसार सागर  में उलझें नहीं देखा जाये तो हम सब अवतार हैं इसका अनुभव करने के लिये आवश्यकता है आत्मबोध की

अपने पास बैठने का प्रयास करें यह अनुभव करें कि मैं केवल संसार नहीं हूं कुछ और भी हूं इस आनन्द का अनुभव करें



लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।

जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद॥ 23॥



सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥

तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥1॥



पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली सीता जी से भगवान् राम कह रहे हैं कि मैं अब कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा


...

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥


..

, इसलिए मेरे द्वारा राक्षसों के विनाश  तक तुम अग्नि में निवास करो

अर्थात् अपने अन्दर के अग्नि तत्व को अन्य तत्वों आकाश पृथ्वी जल वायु की अपेक्षा प्रबल करने का कार्य 

इस पंचतत्व को ब्रह्मांड में व्याप्त लौकिक एवं अलौकिक वस्तुओं का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कारण और परिणति माना गया है।



जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥

निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥2॥



लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥

दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥3॥


(यह दशानन रावण षड्विकारों से ग्रस्त है

उसमें से एक काम विकार के कारण मां सीता पर वह मुग्ध हो गया था )


नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥

भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥4॥




नीच व्यक्ति की नम्रता भी अत्यन्त दुःखदायी  है

 जैसे अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली का झुकना

दुष्ट की मीठी वाणी भी भय देने वाली होती है

मारीच तो भगवान् राम को समझ चुका था लेकिन रावण को समझ में नहीं आया


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने FLAME TEST, LICENCE, शिक्षावल्ली का उल्लेख किस कारण किया भैया पङ्कज का नाम क्यों लिया जानने के लिये सुनें

13.5.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 13 मई 2022 का सदाचार संप्रेषण

 कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ

शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ।

मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ

सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ॥1॥



प्रस्तुत है  अधिगुण आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 13 मई 2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




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शरीर में विकार होते हुए भी विचार यदि सुरक्षित संरक्षित परिपोषित संबलित और व्यवस्थित रहते हैं तो यह भगवान् की कृपा है मन शरीर बुद्धि की ऐसी सामञ्जस्यपूर्ण अवस्था का हमें लाभ उठाना चाहिये


शरीर में विकारों से मन शरीर की चिन्ता में मग्न रहता है और विचार खंडित हो जाते हैं

विचार विकृत हो जायें तो हम अंधकार में भटकेंगे


खाद्य अखाद्य का विवेक हो आहार विहार सही हो तो तन सही रहेगा तन सही होगा तो हमारा सही काम में मन लगेगा


मानस और गीता हमें स्वाध्याय अध्ययन और भक्तिपूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं शौर्य प्रमंडित अध्यात्म कितना महत्त्वपूर्ण है यह भी समझ में आता है


आचार्य जी ने 6मई के संप्रेषण में नारद जी का प्रसंग   बताया था

 अरण्यकांड में ही 


षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥

अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी॥4॥


सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना॥5॥


गुनागार संसार दु:ख रहित बिगत संदेह।

तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह॥45ll

का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने बताया कि जो भक्तिपूर्वक जीवन जीते हैं वो सांसारिक प्रपंचों में रहते हुए भी उसमें संलिप्त नहीं होते


यह काम कठिन है लेकिन इसकी ओर हमारी उन्मुखता रहती है


जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी।।

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा।।


हम सब राममय हैं राममयता से ही अयोध्या में राममन्दिर बन रहा है परमात्मा भी हम लोगों के विग्रह रच देता है और स्वयं विराजमान हो जाता है


कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।

अस दीनबंधु कृपाल अपने


 भगत गुन निज मुख कहे॥

सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।

ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥


रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।

राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग ll


दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।

भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग॥



तुलसीदास जी ने जहां भगवान् राम की वन्दना की वहां शिव को भी लिया

 क्योंकि उस समय शैव वैष्णव संघर्ष से हमारी वैचारिक शक्ति क्षीण हो रही थी


हम लोग भी यदि इस तरह से लोगों को उलझते देखें तो उन्हें सुलझाने का प्रयास करें 

समाज को अनुभव कराएं कि आप उनसे बीस हैं

ज्ञान ध्यान शक्ति भक्ति विचार व्यवहार प्रेम आत्मीयता में बीस हों तो 

इस देवभूमि को नर्क बनाने वालों को आपसे लगाव होगा

लेकिन दीनहीन न बनें अपने विचारों को मजबूत बनाएं

संगठन के काम हेतु समय भी हमें निकालना होगा

लखनऊ में 17 मई को एक कार्यक्रम है उसमें अधिक से अधिक लोग जाएं

10.5.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का दिनांक 10 मई 2022 का सदाचार संप्रेषण

 कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।

मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥

कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।

चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥


प्रस्तुत है  गोप आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 10 मई 2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

इन सदाचार संप्रेषणों से हमें उचित और अनुचित का अन्तर समझ में आता रहता है 

इन्हें सुनते समय हम यदि ध्यानस्थ   होंगे तो हमें अधिक लाभ होगा

आजकल हमलोग अरण्यकांड में प्रवेश किये हुए हैं

अरण्यकांड में घटनाएं अनेक हैं और वो घटनाएं किसी एक  दिशा को प्रेरित करती हैं



सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥

पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥2॥......

लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।

ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥17॥


तुलसीदास ने इस घटना को संसार धर्म से संयुत कर बहुत अच्छा निर्वाह किया है


लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर॥

रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥6॥



नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।

स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति।।7।।

का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने बताया कि


वाराहीतंत्र' के अनुसार आगम इन सात लक्षणों से परिलक्षित होता है :


सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट्कर्म (=शांति, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन तथा मारण) साधन तथा ध्यानयोग।


आगम तन्त्र शास्त्र की गहन परम्परा है  यह इस संसार में रहने के सलीके तरीके बताता है 

कलियुग में सुधी इस आगम पद्धति से देवताओं का पूजन करते हैं

इन सब को बताने के पीछे आचार्य जी का उद्देश्य यही रहता है कि हमें  विश्वास हो सके कि हमारी संस्कृति हमारा ज्ञान हमारा अनुसंधान अनुपमेय है अद्भुत है

हमने बहुत सी समस्याओं को सुलझाया है

ऐतिहासिक गलतियों पर चिन्तन न कर सफलताओं पर चर्चा करें ताकि हमारा हौसला  बढ़े

सकारात्मक सोच रखें


ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है हम पिटते नहीं पीटते हैं



परमात्मा पर आश्रित विचार विकार नहीं है

यह शैथिल्य नहीं है विश्वास की भूमिका है

1.2.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 01/02/2022 का सदाचार संप्रेषण

 श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥(नवधा भक्ति )


प्रस्तुत है चित्रकथालापसुख आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 01/02/2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w


https://t.me/prav353


यह भावमय संसार अद्भुत है भाव हम सब के अंदर होते हैं

किसी के सुप्त किसी के अव्यवस्थित तो किसी के मार्गान्तरित भी हो सकते हैं, इस भावभूमि का संस्पर्श हम सबको करना चाहिये


मानस में अरण्यकांड में शबरी के आश्रम के बारे में, शबरी द्वारा बेर खिलाना आदि को अनेक ग्रन्थों में विस्तार से बताया गया है


कथावाचकों ने ऐसे भाव व्यक्त किये हैं ताकि हमारे अन्दर वो भावानुभूति हो जाये

कथाएं मन के भाव से संयुत होती हैं, कथाएं इतिहास नहीं होती हैं


कथाओं और साहित्य में इतिहास ढूंढने  का हमें प्रयास नहीं करना चाहिये इतिहास और साहित्य एक दूसरे से गुंथे होते हैं अपने विवेक से हमें उनका विश्लेषण करना चाहिये

इन कथाओं में कुछ ऐसे अंश संयुत हैं जो अपने भाव जाग्रत करने के लिये हैं और तर्कातीत हैं


साहित्यकार को आसपास का पर्यावरण प्रभावित करता है  वह अकबर का ही  समय था जब तुलसी का जन्म हुआ उस समय महिलाओं के बाजार लगते थे स्त्री - स्वातन्त्र्य विचार असंभव था


अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥2॥


जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥

भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥3॥

की व्याख्या में आचार्य जी ने बताया कि भक्तिहीन मनुष्य उसी तरह होता है जैसा जलविहीन बादल

भक्ति ऐसी शक्ति है कि मनुष्य उसे यदि पहचान ले तो सर्वस्व प्रदान कर सकती है


कुछ राष्ट्र -भक्ति के दास हैं कुछ ईश्वर -भक्ति के दास हैं इसी तरह वैराग्य -भक्ति के भी दास होते हैं


नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥4॥



गुर पद पकंज सेवा तीसरि भगति अमान।

चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।। 


मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।

पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।


छठ दम सील बिरति बहु करमा।

निरत निरंतर सज्जन धरमा।।


सातवँ सम मोहि मय जग देखा।

मोतें संत अधिक करि लेखा।।


आठवँ जथालाभ संतोषा।

सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।


नवम सरल सब सन छलहीना।

मम भरोस हियँ हरष न दीना।।

इस तरह  भक्ति के नौ प्रकार हैं

आचार्य जी ने इसके अतिरिक्त राजेश्वरनन्द जी महाराज की भी चर्चा की