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20.10.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आश्विन् मास शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 20 अक्टूबर 2023 का सदाचार संप्रेषण *813 वां*

 प्रस्तुत है क्लान्तिछिद ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  आश्विन् मास शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 20 अक्टूबर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *813 वां* सार -संक्षेप


 1 थकावट दूर करने वाला 




06:20 , 16.52 MB, 16:50



भारतीय आर्ष परम्परा का, हिन्दुत्व द्वारा अपनाए गए सनातन चिन्तन, जिसके कारण विश्व ने भारत की अनुकृति की है,का अनुसरण  करती इन सदाचार  वेलाओं का मूल उद्देश्य है कि हम सत्कर्मों में संलग्न रहें ,शरीर मन बुद्धि चैतन्य का सामञ्जस्य बैठाते हुए सक्षम समर्थ शक्तिशाली बनें, हम पुरुष हैं तो पौरुष का अनुभव करें, प्रयास रहे कि  हमारी षड्विकारों से दूरी बनी रहे ,हम यज्ञमयी परमार्थ भाव रखते हुए समाज -हित और राष्ट्र -हित के कार्य करते चलें,हम ग्रामोन्मुखी पुरुषार्थ करें,हम आत्मस्थ होकर इस संसार के रहस्य को समझते और सुलझाते चलें


हमें यह अनुभव कराना कि हम सृजनहार की रची वीणा अर्थात् संसार में रह रहे हैं तो संघर्षों से मुक्त नहीं रह सकते इस लिए उनसे भयभीत नहीं होना चाहिए, मोक्ष हमारा प्राप्तव्य है इसकी भी अनुभूति कराना इन वेलाओं का लक्ष्य है 


आइये प्रवेश करें इस वेला में


सारी समस्याओं का हल यदि हम सहज रूप से कर लें तो इससे अच्छा क्या हो सकता है

कोरोना काल का उदाहरण हमारे सामने है हमने कालिमा की उपज कोरोना पर विजय पाई

आचार्य जी ने उसी समय,जब सन् २०२१ में कोरोना चरम पर था,लिखी एक कविता सुनाई (२४ अप्रैल २०२१ )


शहर संकटग्रस्त पल पल मर रहा है

गांव बेचारा बहुत ही डर रहा है

.........

यह लेखन बहुत सहारा देता है हम भी लेखन -योगी बनें आचार्य जी प्रायः इस पर जोर देते हैं

हम अपनी अध्यात्मपरक जीवनशैली तय करें अपने जीवन को प्रकृति से उन्मुख रखें 

आगामी २९ अक्टूबर को सरौंहां में स्वास्थ्य मेला है उसमें आप लोग सादर आमन्त्रित हैं 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया अरविन्द जी का नाम क्यों लिया आदि जानने के लिए सुनें

12.4.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 12 अप्रैल 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है आर्यक आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 12 अप्रैल 2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




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दुनिया उलझ जाती है तो उसे सुलझाना अत्यन्त कठिन है प्रयास असफल रहता है भौतिकता से बचाव के कारण ही संन्यास की परिकल्पना की गई लेकिन संन्यास भी भौतिकता का सुसंस्कृत स्वरूप है क्योंकि चाह वहां भी बनी रहती है मोक्ष की शान्ति की

आचार्य जी ने 13 दिसंबर 2015 को लिखीअत्यन्त भावों से पूर्ण अपनी रचित एक कविता सुनाई



पद और प्रतिष्ठा सुख सुविधा के पीछे दीवानी दुनिया

कुदरत से लोहा लेने को आतुर है शैतानी दुनिया......


और गीता कहती है संसार में आये हैं तो सहज जीवन जिएं


सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।


सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।18.48।


जसो थारो गाणो वसो म्हारो बजाणो


हम सबमें भावनाएं भरी हैं इसीलिये हम लोग समाज राष्ट्र की चिन्ता करते हैं अतः प्रातःकाल हमें भावनाओं की उपासना करनी चाहिये


प्रकृति में बहुत आकर्षण है यह भावों के साथ जब घुलमिल जाता है तो आत्मानन्द की अनुभूति होती है ध्यान सुदृढ़ होने लगता है और धारणा से संयुत हो जाता है फिर हमारा भाव समाधिस्थ होने लगता है


संसार का मल दूर करने का प्रयास किसे करना चाहिये जानने के लिये सुनें

7.1.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 07/01/2022 का सदाचार संप्रेषण

 हर कर को गांडीव सुलभ है,हर मन को उत्साह ।

किंतु शर्त यह आह न किंचित, हर पल निकले वाह ।।

✍️ओम शंकर



प्रस्तुत है अध्यात्म -प्रशत्त्वन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 07/01/2022

  का सदाचार संप्रेषण 




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कथन और श्रवण संस्कार का एक रूप है और इस पद्धति से हमारे देश में मानव जीवन के लिए संस्कार का एक मार्ग खोला गया

मनुष्य मनुष्य बने इसके लिए ज्ञान का उद्भव सबसे पहले अपने देश में हुआ


कोटि-कोटि कंठों से निकली आज यही स्वर धारा है

भारतवर्ष हमारा है, यह हिन्दुस्तान हमारा है।

जिस दिन सबसे पहले जागे, नवल सृजन के स्वप्न घने,

जिस दिन देश-काल के दो-दो, विस्तृत विमल वितान तने,

जिस क्षण नभ में तारे छिटके, जिस दिन सूरज-चाँद बने,

तब से है यह देश हमारा, यह अभिमान हमारा है!

भारतवर्ष हमारा है, यह हिन्दुस्तान हमारा है ! I


(बाल कृष्ण नवीन)



विकार संसार में  आते हैं  अपना देश भी इससे अछूता नहीं रह सकता इसलिये बहुत व्याकुल नहीं होना चाहिये



शङ्कराचार्य केवलाद्वैत, रामानुज विशिष्टाद्वैत, निम्बार्क द्वैताद्वैत, मधवाचार्य द्वैत, वल्लभाचार्य शुद्धाद्वैत

आदि भिन्न भिन्न मत हैं इनके समय में भी परिस्थितियां विषम थीं


प्रतिकूल परिस्थिति में मनुष्य के पुरुषार्थ -जागरण के असंख्य उदाहरण भारतवर्ष में हर समय मिल जायेंगे


आचार्य जी ने चार युगों से संबन्धित अपनी रची एक कविता सुनाई

हमने पूरी वसुधा को अपना परिवार......

हमारे विचार भी इसी तरह जब लिपिबद्ध हो जाते हैं और हम स्वयं पढ़ते हैं तो लगता है किसने प्रेरित किया था


कौन अन्दर विद्यमान है अहं ब्रह्मास्मि

उपासना भाव में रहने का प्रयास नित्य करें किसी भी समय करें

आज की परिस्थितियों को देखकर  अध्यात्म के साथ पुरुषार्थ शौर्यपूर्ण पराक्रम की आवश्यकता है ही

समय पर पौरुष का प्रकटीकरण होना चाहिये

रुई भारत में बनती थी लेकिन कपड़ा  इंगलैंड में बनता था और कंट्रोल से मिलता था इस तरह के संकटों से भारत गुजरा है

लेकिन अब हम उस संकट काल से निकल आये हैं

इसलिये निराशा की अभिव्यक्ति अब भी न करें


यह सदाचार वेला हमें सिखाती है कि हम जाग्रत हों, परिस्थितियों से जूझें,आत्मशक्ति की अनुभूति भी करें प्रयोग भी करें

इसके लिये खानपान संयम नियम देखें

परमात्मा ने हमारा शरीर अनुकूलन स्थापित करने वाला बनाया है मनुष्यत्व की अनुभूति करें दुर्भाग्यशाली न बनें

21.12.21

दिनांक 21/12/2021 (चिल्ले कलां का प्रथम दिन )का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है सुद्रविणस् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 21/12/2021 (चिल्ले कलां का प्रथम दिन )का सदाचार संप्रेषण


आचार्य जी 

डा तुलसीराम की पुस्तक 'भारत में अंग्रेजी क्या खोया क्या पाया 'की चर्चा प्रायः करते हैं 

भाषा के संबन्ध में उनके विचार अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं यह सलीके से लिखी पुस्तक है

 जापान, चीन अपनी भाषा को दृढ़ता से पकड़े हैं लेकिन हमारे यहां 

कोई अंग्रेजी बोलता है तो लगता है विद्वान है

सवाल उठता है कि यह भ्रम क्यों उत्पन्न हो गया है अंग्रेजी बोलना ही हम लोगों का जीवन लक्ष्य बन गया है कोई अंग्रेजी बोलता है तो लगता है विद्वान है भाषाई व्यामोह किसी प्रयास से हमारे ऊपर चढ़ा अंग्रेजों ने हमारे  आत्मबोध को विलुप्त करने का सफल प्रयास किया

आचार्य जी ने DISCOVERY OF INDIA पुस्तक के दूसरे संस्करण के 64 वें पृष्ठ को पढ़कर धर्माचरण का महत्त्व बताया

लेकिन बाद में कितना परिवर्तन आ गया

आचार्य जी ने इसी संदर्भ में कभी लिखा था


दुनिया औरों को सदाचार सिखलाती है

पर स्वयं असंयम कदाचार की अभ्यासी .......

और एक अन्य कविता

जागो भारत जागो महान...

के माध्यम से आचार्य जी ने बताया कि जब हम अपना वास्तविक इतिहास पढ़ेंगे तो हमारा स्वाभिमान जागेगा

भारतीय संस्कृति को भाषाई व्यामोह से व्यावहारिक व्यामोह से कुंठित किया गया हमारा खानपान आचरण विचार बदल गया

संस्कृति से दूर होकर ओढ़ी हुई सभ्यता को लेकर हम चल रहे हैं तो स्वाभिमान तो नहीं जागेगा

इसे जगाने का प्रयास दीनदयाल विद्यालय में किया गया इसे अब आगे लाने की आवश्यकता है आत्मबोध को नित्य जाग्रत करने की आवश्यकता है

इन सब बातों का आगे आने वाले कार्यक्रमों में अवश्य ध्यान रखें 

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30.11.21

दिनांक 30/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है जैवातृक आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 30/11/2021 का सदाचार संप्रेषण


मनोयोग पूर्वक काम करते करते हम लोग उस काम में रम जाते हैं और तब हमें अपने शरीर की व्यथाओं का भी अनुमान नहीं लगता

मन पर लिखी आचार्य जी ने अपनी रची एक कविता सुनाई

मानव हूं मन के साथ सदा रहता हूं,

अनायास ही रुक टुक कर बहता रहता हूं।

मन मानव का शत्रु मित्र परिवार पड़ोसी

बेचारा मित्रता निभाकर बनता दोषी,

आजीवन मानव का उसने साथ न छोड़ा

नहीं किसी भी दिशा काल में बंधन तोड़ा,

फिर भी संत विरक्त और ज्ञानी विज्ञानी

आत्मा के हिमायती त्रिकुटी वाले ध्यानी ,

अरे मन को सदा कोसते चिढ़ते नहीं अघाते,

और 'मन को बांधो'  सबको हरदम यही बताते ,

और मन बेचारा है कि सभी कुछ सहता रहता,

कभी किसी से नहीं न किंचित कहता ,

अपमानित होकर भी पूरा साथ निभाता,

इसीलिए यह मेरा साथी मुझको भाता ,

मैं सलाह दूंगा 'अपने मन को पहचानो'

और उससे बात करो उसका अभ्यन्तर जानो।।

आप अपने मनस् में उतरकर यह अनुभूति करें कि मैं कौन हूं

गीता में 

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।


न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।।3.4।

अर्जुन ! मानव न तो कर्मो को न आरम्भ करने से निष्कर्मता की अन्तिम स्थिति को पाता है और न आरम्भ की हुई क्रिया को त्यागने भर से भगवत् प्राप्ति रूपी परम सिद्धि को  प्राप्त होता है। अब तुम्हें ज्ञान मार्ग अच्छा लगे या निष्काम कर्म मार्ग, दोनों मे कर्म तो करना ही पङेगा। 

           प्रायः इस स्थान पर लोग भगवत्पथ में संक्षिप्त मार्ग और बचाव ढूँढने लगते हैं। "कर्म आरम्भ ही न करें , हो गये निष्कर्मी"- कहीं ऐसी भ्रान्ति न रह जाय, इसलिये श्रीकृष्ण बल देते हैं कि कर्मों को न आरम्भ करने से कोई निष्कर्म भाव को नहीं प्राप्त होता। शुभाशुभ कर्मो का जहाँ अन्त है, परम निष्कर्मता की उस स्थिति को कर्म करके ही पाया जा सकता है। इसी प्रकार बहुत से लोग कहते हैं, "हम तो ज्ञान मार्गी है, ज्ञान मार्ग में कर्म है ही नहीं।"- ऐसा मानकर कर्मो को त्यागने वाले ज्ञानी नहीं होते। आरम्भ की हुई क्रिया को त्यागने मात्र से कोई भगवत् साक्षात्कार रूपी परम सिद्धि को प्राप्त नहीं होता है l

तदाकार होना अत्यन्त आवश्यक है 

आचार्य जी ने यह बताया कि जब वे BA में थे तो उनको अध्यापक खेर जी और अध्यापक वाजपेयी जी ने किस तरह पढ़ाया

आप जो काम कर रहे हैं उसको भली प्रकार से समझते हुए करते चलेंगे तो आपको अच्छा भी लगेगा और आप उसके रहस्यों को भी जानते जाएंगे

आचार्य जी ने 

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।


यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69।।

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं


समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।


तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे


स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।

को उद्धृत करते हुए बताया कि जब हमने संपूर्ण संसार के आनन्द को भोग लिया और इस आनन्द की अनुभूति करने के पश्चात् हम यह भी जानें कि आनन्द का स्रोत क्या है  तो यह जिज्ञासा ही अध्यात्म का द्वार है l तब लगता है कि यह संसार अच्छा नहीं है कुछ और अच्छा है यही मोक्ष है


दिल्ली में अकबर का क्या हाल है? यह किसने कहा आदि जानने के लिए सुनें

14.11.21

दिनांक 14/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है उपस्थितवक्ता आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 14/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

बहुत दिन बाद लखनऊ युगभारती की आज बैठक है

हम सब लोगों के मन में बहुत सी कल्पनाएं रहती हैं क्योंकि हम सब आन्तरिक रूप से एक हैं बाह्य स्वरूप अलग अलग हैं 

भाव और रूपमय संसार भाव से एक,रूप से अनेक है

भावरूप, नामरूप,तत्त्वरूप, सत्त्वरूप अलग अलग रूप हैं और जो अरूप है वह


बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥

आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥

आचार्य जी ने नीरज अत्रि और नीलेश नीलकंठ ओक की चर्चा की

ये कुछ लोग अपने वैचारिक क्षेत्र में संघर्ष कर रहे हैं यह इस समय की अनिवार्य आवश्यकता है क्यों कि इस समय भीषण वैचारिक संघर्ष चल रहा है और हमारी आर्ष परम्परा,जिसमें वैदिक ज्ञान औपनिषदिक ज्ञान पौराणिक ज्ञान है, शान्ति प्रदान करेगी ही जिससे आनन्ददायक वातावरण निर्मित होगा

ये उथल-पुथल उत्ताल लहर पथ से न डिगाने पायेगी।

पतवार चलाते जायेंगे मंजिल आयेगी-आयेगी॥


इस उथल पुथल वाले संघर्ष को पार करके निश्चित रूप से ही प्रकाश का प्रसार करेंगे ऐसा विश्वास मन में रखके हममें से प्रत्येक को अपने अपने स्तर से प्रयास करना चाहिए

अपनापन हमारे गांव की हमारे देश की थाती रहा है इस थाती को हमारे शौर्यविहीन अध्यात्म ने दूर किया है

आचार्य जी ने

तैत्तिरीय उपनिषद् में शिक्षावल्ली के 12 वें अनुवाक से

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।


ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ।

के नित्य पाठ का परामर्श दिया

जिसको हम शिक्षित बनाने चले हैं वह इस लोक और परलोक को भलीभांति समझ कर जब शिक्षा प्राप्त करेगा तो जो भी कार्य करेगा तो उस कार्य को करने में न उसको दम्भ होगा न भय न भ्रम न उथल पुथल न ईर्ष्या न द्वेष होगा

आचार्य जी ने माननीय गोखले जी(जिन्होंने बैरिस्टर साहब को स्वयंसेवक बनाया था )से संबन्धित एक प्रसंग सुनाया

4.11.21

 प्रस्तुत है वाग्य आचार्य श्री ओम शंकर जी द्वारा प्रोक्त आज दिनांक 04/11/2021 (दीपावली )का सदाचार संप्रेषण

आज दीपावली है आज के दिन हम 

आत्मविश्वास जगाएं आत्मशक्ति जगाएं हमारे अन्दर संयम के साथ ऊर्जा भी हो अन्यथा संयम निराशा का उद्यम बन जाता है 

भारतवर्ष की ऊर्जा को अपने अन्दर प्रवेश कराएं दीपज्योति हमारे भीतर प्रवेश कर जाए अन्धकार को पचाएं प्रकाश को फैलाएं l 

आर्ष  (अर्थात् ऋषियों के द्वारा) व्यवस्था के अन्तर्गत हमारे यहां जितने भी पर्व निर्धारित हैं वे सब सकारण हैं

भगवान् राम आज ही के दिन रामराज्य का भार उठाने के लिए अयोध्या में प्रवेश करते हैं

कल मुकेश जी ने आचार्य जी के साथ मिलकर वञ्चित बच्चों को वस्त्र दिये l यह सुसंगति का प्रभाव है l

हम भारतीयों के बहुत से सद्गुणों को दोषपूर्ण बनाने के लिए बाहर से बहुत लोग आते रहे विलायती लोग व्यापार करने आये और देखा कि भारतवर्ष के लोगों को तो आसानी से घुमाया जा सकता है अर्थात् अपनी आस्था से संस्कृति से विश्वासों से डिगाया जा सकता है 

 आचार्य जी ने JEAN -ANTOINE DUBOIS नामक फ्रेंच मिशनरी की चर्चा की इसकी विस्तृत जानकारी हमारी सांस्कृतिक विचारधारा के मूल स्रोत लेखक सुरेश सोनी लोकहित प्रकाशन लखनऊ  में मिल जायेगी

पश्चिम के लोग धीरे धीरे हमारी संस्कृति का अध्ययन करके इसे विकृत करने लगे मैक्स मूलर ने भी इसे  बहुत विकृत किया 

वेद हम विदेशी नजर से पढ़ने लगे

आचार्य जी ने अपनी लिखी एक कविता सुनाई


हुआ अजब मतफेर लग रहा सगा पराया

और ये कैसा अन्धेर जीत को गया हराया...

इसके अतिरिक्त  विद्यालय में हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा के समय मुख्य पुरोहित कौन थे? बैरिस्टर साहब का आज आचार्य जी ने नाम क्यों लिया? आदि जानने के लिए सुनें 👇

3.11.21

दिनांक 03/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है यतात्मन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 03/11/2021 का सदाचार संप्रेषण


आचार्य जी ने बताया पश्चिम यथार्थ तो देखता है लेकिन हम जीवन में उत्साह और जीवन में सातत्य देखते हैं


गगन के उस पार क्या,

पाताल के इस पार क्या है?

क्या क्षितिज के पार? जग

जिस पर थमा आधार क्या है?

दीप तारों के जलाकर

कौन नित करता दिवाली?....

-श्याम नारायण पांडेय


हर जिज्ञासु दीवार के उस पार देखना चाहता है संसार का जिज्ञासु भाव एक धन है l


तुलसीदास जी ने सबसे पहले 

हनुमान चालीसा जानकी मंगल पार्वती मंगल लिखे

और मानस में सबसे पहले अयोध्या कांड लिखा राम के कार्य को मांगलिक रूप से प्रारम्भ किया 

बाल कांड अत्यन्त व्यवस्थित ज्ञान का आधार है और भिन्न प्रकार की समस्याओं का समाधान है

आचार्य जी ने बी एन एस डी इंटर कालेज के पूर्व प्रधानाचार्य श्री सद्गुरु शरण अवस्थी और बारानिकोह से संबन्धित एक रोचक जानकारी दी और बताया कि सद्गुरु जी के अनुसार राम चरित मानस में  उन्नीस हजार शब्दों का प्रयोग हुआ है

क्या तुलसी जी की तुलना मिल्टन शेक्सपीयर आदि से की जा सकती है जिन्होंने छह से आठ हजार शब्दों का ही प्रयोग किया था

हमारे सचमुच के तत्त्व को बहुत नीचे गिराया गया हमारे भाव को कुण्ठित किया गया

हमारे ज्ञान के अथाह भण्डार को कम आंका गया

लेकिन अब इस आत्मबोध को जगाने की आवश्यकता है कि हमारा ज्ञान अत्यन्त अथाह है और इसकी तुलना कहीं से नहीं की जा सकती


वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥1॥


भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।

याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥2॥

 

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥3॥

आदि की अत्यन्त लम्बी व्याख्या की जा सकती है

इसके अतिरिक्त आचार्य जी जब एक शादी में गये थे तो क्या घटना घटी और आचार्य जी ने जे पी आचार्य जी का उल्लेख क्यों किया आदि जानने के लिए सुनें 👇

2.11.21

दिनांक 02/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है माहात्मिक आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 02/11/2021 का सदाचार संप्रेषण


प्रायः सभी के दिन उतार चढ़ाव वाले होते हैं समय की गति टेढ़ी मेढ़ी होती है यह सीधी रेखा में कभी नहीं चलती और इसीलिए यह संसार संसार - सागर कहलाता है संसृति इति संसारः जो प्रतिक्षण बदल रहा है लेकिन चल रहा है संसार स्थूल है तो सूक्ष्म भी है

संसार कभी वापस होकर नहीं आता जन्म मरण भी सिलसिलेवार चलता रहता है

जहां संवेदनशीलता का अभाव है वहीं दुराव है जहां दुराव है वहीं विघटन है कुण्ठएं है कलह है कष्ट है

संसार का आचरण उतार चढ़ाव वाला है चिन्तनशील लोग पीड़ा पी लेते हैं भले ही वो किसी आत्मीय से मिली हो  जिस व्यक्ति में कष्टदायक बात को पचाने की क्षमता जितनी अधिक होगी वो उतना ही सफल है और यह क्षमता ध्यान धारणा स्वाध्याय अध्ययन चिन्तन संगति से विकसित की जा सकती है

लेकिन परमात्मा की लीला है कि जिसके हिस्से में जो आया है वह उसे भोगना ही पड़ेगा

आचार्य जी ने अपनी एक रचना सुनाई


दुनिया औरों को सदाचार सिखलाती है

पर स्वयं असंयम कदाचार की अभ्यासी


आपने एक प्रसंग सुनाया जब वे संघ के प्रचारक के रूप में हमीरपुर के पास सुमेरपुर गये थे

शिक्षक का भाव रहता है कि वह सदाचार के माध्यम से प्रेरणा दे सके

जो आत्मस्थ होने का प्रयास नहीं करता वह खीझते खीझते ही जीवन व्यतीत कर देता है आत्मस्थ होकर अपनी धुन की पूजा करो 

आचार्य जी ने बताया कि लोमश ऋषि जिनकी कल उन्होंने चर्चा की थी अमर माने जाते हैं और  एक लोमश -रामायण भी है l

आचार्य जी ने एक और कविता सुनाई


कविता मन का विश्वास भाव की भाषा है....

आचार्य जी ने इसके अतिरिक्त इक प्यार का नगमा है  (फिल्म :शोर )  जैसे भावपूर्ण गीत लिखने वाले गीतकार संतोष आनन्द की चर्चा की l

आज का TAKE HOME MESSAGE

आत्मस्थ होने का प्रयास करें

1.11.21

दिनांक 01/11/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है संस्कृत संयतात्मन् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 01/11/2021 का सदाचार संप्रेषण


आचार्य जी को बहुत कम आयु से एक सूत्र सिद्धान्त का वाक्य प्रभावित किये हुए है

जो करता है सब परमात्मा करता है

और वह अच्छा ही करता है

लेकिन यह प्रायः संकटों में याद आता है 

कष्ट संकट समस्याएं भोग हैं

धन की तीन अवस्थाएं भोग दान नाश हैं


आचार्य जी ने ठण्डी पुलिया कानपुर से संबन्धित एक प्रसंग सुनाया जब संघ के प्रचारक रहे ठाकुर साहब स्व राम गोविन्द सिंह जी (हिन्दू जागरण मंच ) ने आचार्य जी को प्रदेश का बौद्धिक प्रमुख बना दिया था


आचार्य जी ने एक और अत्यधिक रोचक कथा सुनाई जब देव इन्द्र ने ऋषि लोमस को अपने महल बुलाया


तैत्तिरीय उपनिषद् में परमात्मा के बारे में ज्ञान मिल जायेगा


आपने तुलसी के बारे में ये पंक्तियां लिखीं 


प्रचंड तेज शक्ति शील रूप के विधान हो

अनिन्द कर्म धर्म मर्म शर्म  संविधान हो

उदार हो विदार हो प्रफ़ुल्ल कोविदार हो

प्रसार भक्ति भाव राम नाम के प्रचार हो

(शर्म का अर्थ रक्षा,विदार का अर्थ युद्ध, कोविदार का अर्थ कचनार)

तुलसी हमारे मार्गदर्शक बने हुए हैं

आपने 

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।

देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।17.20।।गीता

का अर्थ बताया


ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।


ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।17.23।

आदि में आये ॐ तत् सत्  का अर्थ बताया

संसार में हम कोई भी काम कर रहे हैं वह भगवान् करा रहा है यह भाव सदैव रहना चाहिए

31.10.21

दिनांक 31/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है यमवत् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 31/10/2021 का सदाचार संप्रेषण


सदाचार संप्रेषण का उद्देश्य रहता है कि हम लोगों को उससे ऐसा फल प्राप्त हो जो हमारे मन को संतुष्टि दे फल स्थूल और सूक्ष्म दोनों होता है

सूक्ष्म फल अपने कार्यों और अपने व्यवहारों के परिणामस्वरूप प्राप्त होता है

संसार अत्यधिक अद्भुत है जहां सुख दुःख दोनों हैं 

समस्याएं भी हैं तो समाधान भी हैं 

इस संसार को संचालित करने वाला किसी न किसी रूप में हम सब लोगों के अंदर विद्यमान है विशेषकर मनुष्य के भीतर

किसी का काम लेखन है किसी का काम प्रवचन है

जब हम लेखन करते हैं तो उसके दर्शन भी करते हैं और हाथ की त्रुटियां मस्तिष्क सुधार देता है

शिक्षा देना शिक्षा प्राप्त करना मनुष्योचित कर्म है और धर्म भी है.

आचार्य जी ने जो आज एक स्वप्न देखा उसके बारे में बताया

हमारे आदर्शों की डोर कभी टूटनी नहीं चाहिए भले ही कितने उतार चढ़ाव देखें मन कमजोर न करें 


आचार्य जी ने सन् 2011 में 

लिखी अपनी एक कविता सुनाई


चिन्ता है भारत में क्यों भ्रष्टाचार बढ़ा.....


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया सुरेश गुप्त जी और भैया डा उमेश्वर पांडेय जी का नाम क्यों लिया आचार्य जी के स्वप्न में राव नामक छात्र ने क्या किया आदि जानने के लिए सुनें 

29.10.21

दिनांक 29/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है ब्रह्मिष्ठ आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 29/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

मनुष्य ही एक ऐसा विशिष्ट प्राणी है जिसमें अनेक कल्पनाएं आती हैं और उन कल्पनाओं को फलीभूत करने के लिए उसके प्रयत्न चलते हैं और उन प्रयत्नों के स्वरूप अत्यधिक अद्भुत होते हैं जैसे विशाल अट्टालिकाओं का निर्माण, सुरंगों का निर्माण,कृषिकर्म में अनेक प्रयोग, औषधियों का निर्माण आदि

आचार्य जी ने अपनी रची एक कविता सुनाई

शिल्पी उदास क्यों हो......

गीता द्वारा जीवन जीने की शैली बताई गई है संसार में संघर्ष है युद्ध हैं समस्याएं हैं अपना पराया है अतः संसार में किस प्रकार जीना यह हमें गीता से पता चलता है 

आचार्य जी ने परामर्श दिया कि गीता के 18 वें अध्याय में 18 वें से 26 वें छन्द का अध्ययन करें

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मप्रेरणा ।


करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः।।18.18।।

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।


प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि।।18.19।।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।


अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्।।18.20।।

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।


वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्।।18.21।।


यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।

अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।18.22।।

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।


अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।18.23।।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।


क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।18.24।।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।


मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।18.25।।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।


सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।।18.26।।

26 वें छन्द का अर्थ इस प्रकार है 

जो कर्ता मुक्तसङ्ग अर्थात् जिसने आसक्ति का त्याग कर दिया है जो अनहंवादी  अर्थात् मैं कर्ता हूँ ऐसा बोलने का जिसका स्वभाव नहीं रह गया है जो धृति  (धारणाशक्ति) व उत्साह से  संयुत है तथा जो किये गये कर्म के फल की सिद्धि होने या न होने में निर्विकार है। वह सात्त्विक कहा जाता है।


परमात्मा जीवात्मा की प्रेरणा है हम परमात्मा के प्रतिनिधि हैं, सेवा भाव से किया गया प्रत्येक कार्य परमात्मा को समर्पित होता है

20.10.21

आज 20/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है गुणसागर आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज 20/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

समय पर जिसका वीरत्व जाग जाए वो वीर है l

ज्ञान बांटते बांटते बीते पांचक वर्ष

अब तो कर्म प्रवृत्त हों सब मिल सहित अमर्ष ।

सब मिल सहित अमर्ष ज्ञान हो शक्ति प्रदाता 

और देशहित जिए मरे तज रिश्ता नाता ।

कर्मशक्ति के बिना यदि करते रहे विमर्श 

कभी नहीं मिल पाएगा हमको वांछित हर्ष ।।

(ओम शंकर )

कर्मशक्ति के साथ हो संघबद्ध व्यवहार ,

और आचरण में रहें संयम सहित उदार ।

संयम सहित उदार रहें कमजोर न पलभर ,

दुष्ट देखकर लगें खोजने कोई तलघर ।

संयम शक्ति समुद्र वत् गगन सदृश विस्तार ,

"हम भारत के पूत हैं" यह ही ब्रह्म विचार ।।

(ओम शंकर)


यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना

सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुरा: ।

हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा

मनोरथेनासति धावतो बहि: ॥ भागवत् 5/18/12

का उदाहरण देते हुए आचार्य जी ने सहज मानव मनोवृत्ति 'किसी का किसी के प्रति आकर्षण ' के बारे में बताया l


पाञ्चजन्यं ऋषिकेशाे देवदत्तं धनञ्जयः।                                                                           पाैण्ड्रं दध्माै महाशङ्खं भीमकर्मा वृकाेदरः।।                 अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्राे युधिष्ठिरः।                        नकुलः सहदेवश्च सुघाेषमणिपुष्पकाै।।


दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण,

                            युयुत्सुं समुपस्थितम्।।

                                    (गीता 1/28-।।)

       सीदन्ति मम गात्राणि,

                             मुखं च परिशुष्यति।

       वेपथुश्च    शरीरे    मे,

                            रोमहर्षश्च     जायते।।

                                       (गीता 1/29)

के द्वारा आपने सात्विक लोगों के लक्षण बताये l भगवान् कृष्ण में शक्ति बुद्धि स्थैर्य न होता तो पासा पलट जाता l

लेकिन सात्विकता भी अतिशयता को प्राप्त होती है तो हमारा पराभव होता है जिसे वीर सावरकर ने सद्गुण विकृति कहा है (उदाहरण :पृथ्वीराज चौहान )

अत्यन्त सरल बुद्धिमान् सहज प्रधानाचार्य ठाकुर साहब के पौत्र ने लटकते लड्डू कहां देखे थे?

लगाई डुढाई कौन बोलता था?

आदि जानने के लिए सुनें

6.10.21

दिनाङ्क 06/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

 स्थिरारम्भ आचार्य श्री ओम शंकर जी का कहना है हम कुसंगति से बचें चाहे वह आदतों की हो या व्यक्तियों की हो और यज्ञ हवन पूजन में रत हों संगठन को महत्त्व दें सेवारत हों शक्ति की उपासना करें l प्रस्तुत है इन्हीं सब बातों को लिए आज दिनाङ्क 06/10/2021 का सदाचार संप्रेषण


जिनके जीवन में अस्तव्यस्तता समाप्त हो जाती है वे प्राज्ञ कहलाते हैं l

आज पितृविसर्जनी अमावस्या है और कल से नवरात्र प्रारम्भ हो रहे हैं,

जहां शक्ति की उपासना शौर्य की आराधना भक्ति के साथ परिलक्षित होती है l

आचार्य जी ने 

जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता

तस्माद्वैदिकधर्ममार्गपरता विद्वत्त्वमस्मात्परम्।

आत्मानात्मविवेचनं स्वनुभवो ब्रह्मात्मना संस्थितिः

मुक्तिर्नो शतजन्मकोटिसुकृतैः पुण्यैर्विना लभ्यते॥ २॥ विवेक चूडामणि

की व्याख्या की

इसी माह अपने सरौहां गांव में होने वाले चिकित्सा शिविर को अत्यन्त उत्साह के साथ करने के लिए आपने आह्वान किया

आचार्य जी ने अपनी रचित एक कविता सुनाई

हम चलेंगे साथ तो संत्रास हारेगा

पूर्व फिर से अरुणिमा आभास धारेगा.....

(पूर्व अर्थात् भारत )

5.10.21

दिनांक 05/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है भगवत् आचार्य श्री ओम शङ्कर जी द्वारा प्रोक्त आज दिनांक 05/10/2021 का सदाचार संप्रेषण

लेखन एक योग है और वह हमारा मित्र भी है

धर्म और दर्शन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं धर्म जीवन का व्यवहार है जीने की शैली है और दर्शन आन्तरिक अनुभवों का तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने का उपाय है

दो प्रकार के दर्शन हैं

आस्तिक और नास्तिक

छ्ह नास्तिक दर्शन चार्वाक माध्यमिक योगाचार्य सौत्रांतिक वैभासिक और आरहद और 

छ्ह आस्तिक दर्शन सांख्य योग न्याय वैशेषिक मीमांसा वेदान्त हैं

आचार्य जी ने गीता के निम्नलिखित श्लोक बताये


देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।17.14।।

देवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवात्मा का पूजन , शुद्धि , आर्जवम्( सरलता), ब्रह्मचर्य का पालन  और अहिंसा  --  शरीरसम्बन्धी तप कहलाता है

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।

स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।17.15।।

उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय, हित करने वाला भाषण  स्वाध्याय व अभ्यास -- यह वाणी सम्बन्धी तप कहलाता है


मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।

भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।17.16।।


मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मन का निग्रह  भावों की शुद्धि --  यह मन सम्बन्धी तप कहलाता है l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कुछ काव्य पंक्तियां सुनाईं

आचार्य जी से जीवनी लिखने के लिए किसने कहा आदि जानने के लिए सुनें

4.10.21

दिनांक 04/10/2021 का सदाचार आभाषण

 आनन्दित रहने हेतु आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए हम लोग प्रातःकाल दीक्षक आचार्य श्री ओम शंकर जी की सदाचार वेला की प्रतीक्षा करते हैं

 प्रस्तुत है आज दिनांक 04/10/2021 का सदाचार आभाषण

ब्रह्म क्या है? इस विषय को विस्तार देते हुए आचार्य जी ने

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति ।

यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद् ब्रह्मेति ॥ - तैत्तिरीयोपनिषत् ३-१-३

की व्याख्या की और बताया कि आरण्यक इसी ब्रह्म को जानने की ऋषियों की अनुभूतियां हैं

यज्ञ का स्थूल रूप भी लाभदायक है

यज्ञ दान तप  त्रिविध पुरुषार्थ हैं

यह भाव सदैव रहना चाहिए कि मेरा कुछ नहीं है

इसी भाव को लिए आजीवन समर्पण के उदाहरण हैं

नानक, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, सुभाष चन्द्र बोस दीनदयाल आदि

आचार्य जी ने भारत की महत्ता दर्शातीं ये कविताएं सुनाईं

तपस्या, त्याग,संयम, शील का शुभनाम भारत है ,

समर्पण, सत्य, सेवा साधना का नाम भारत है ,

ये भारतवर्ष केवल भूमि का टुकड़ा नहीं प्यारे ,

समूचे विश्व भर की चेतना का नाम भारत है ।

✍️ओम शंकर



कि, गंगा और गीता गाय का पर्याय भारत है ,

कि, श्रीमद्भागवत का प्रिय दशम अध्याय भारत है,

कि, भारत भूमि का सुर स्वर्ग है ध्रुव सत्य यह ही है ,

कि, जीवन-मुक्ति-पथ का एकमेव उपाय भारत है ।।

✍️ओम शंकर

 परामर्श :

प्रकृति का दर्शन करें

संस्कृति का सृजन करें

विकृति का वर्जन करें


 दीनदयाल विद्यालय प्रबन्धकारिणी समिति के अध्यक्ष श्री योगेन्द्र भार्गव जी ने आचार्य जी को कल फोन क्यों किया? सच्चिदानन्द क्या है?

जानने के लिए सुनें

28.9.21

दिनांक 28-09-2021 का उद्बोधन

 संशितात्मन् आचार्य श्री ओम शंकर जी द्वारा शंसित उद्बोधनों के प्रतिश्रवण हेतु उत्सुक श्रोताओं में यह जिज्ञासा सदैव बनी रहती है कि वे अपने को जानें, अपनी ऋषि -परम्परा, जिसका मूलाधार ज्ञान है, को जानें, अपने इतिहास को जानें

और उनके द्वारा सांसारिक प्रपंचों से हटकर ये उद्बोधन सुन लेना कोई साधारण बात नहीं

प्रस्तुत है आज दिनांक 28-09-2021 का उद्बोधन


कल श्री रामजन्मभूमि आन्दोलन के शिल्पी श्रद्धेय श्री अशोक सिंघल जी के अवतरण दिवस के अवसर पर आचार्य जी ने अपने भाव निम्नांकित पंक्तियों से व्यक्त किए




"जय श्रीराम" शौर्य-स्वर देकर जिसने देश जगाया था ,

जिस स्वर ने हिंदुत्व धार को खरतर कर चमकाया था ,

जिसने भाव भक्ति को विक्रम का उद्बोध कराया था,

जिसने दंभी राजतंत्र को घुटनों बल बैठाया था ,

उस अमरत्व भाव को मेरा अगणित बार प्रणाम नमन ,

उसकी स्मृति अब भी हमको कर देती है दृप्त प्रमन ।।


जिसका स्वर संगीत सदा ही शौर्य शक्ति से झंकृत था ,

जिस स्वर का आलाप दिव्य भावों से सहज अलंकृत था,

जिसकी वाणी में तपव्रत की आग वीरता भरी रही ,

जिससे देशद्रोह वाली संताने हरदम डरी रही ,

उस विजय व्रत वाली वाणी को मेरा सर्वदा नमन ,

उसकी स्मृति से ही अब भी खिल उठता मुरझता चमन ।।


थे अशोक पर शोक एक था "जन्मभूमि थल" बोझिल है ,

राजनीति के चक्रव्यूह में दिशा दृष्टि से ओझल है ,

तुम भरकर हुंकार बढ़े ढह गया तमाशा सदियों का ,

भ्रम मिट गया गुलामी लादे मिथ्या "सेकुलर वदियों" का ,

हे हिंदू की शान मान सम्मान तुम्हें शत बार नमन ,

प्रलय काल तक हिंदुदेश उल्लसित रहेगा मुदित मगन ।।

जय जय श्री राम


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मुण्डकोपनिषद् की भूमिका बांधते हुए


कस्मिन् नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥

का अर्थ बताया

आचार्य जी मोटरसाइकिल में किसके पीछे बैठते थे आदि जानने के लिए सुनें 

24.9.21

दिनांक 24/09/2021 का भाषित

 संसार का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि हम भी इससे अछूते नहीं रहे हैं और हमारे विचारों में अंधेरा प्रवेश कर गया है l यदि हम आत्मस्थ हों तो प्रातःकाल का यह स्वर्णिमकाल जो हमें आनन्दानुभूति देता है व्यर्थ नहीं जाएगा l इन्हीं भावों के साथ ज्ञान -पट खोलने के लिए उत्सुक द्वार्ग श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत है भगवत् आचार्य श्री ओम शंकर जी द्वारा भाषित आज दिनांक 24/09/2021 का भाषित


उपनिषदों का ज्ञान गीता में अवतरित हुआ है

आचार्य जी ने गीता के 15वें अध्याय के निम्नांकित श्लोकों का अर्थ समझने के लिए परामर्श दिया

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।


प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।15.14।।


सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो


मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।


वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो


वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15.15।।


द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।


क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।15.16।।


 कोरोना की तीसरी लहर और अफगानिस्तान समस्या आदि भय व्याप्त हैं तो आचार्य जी ने परसों और कल के बीच  कविता लिख दी कि

भयद तूफान की आवाज बढ़ती जा रही है ,

बची कुछ रोशनी अंधियार बीच समा रही है ,

क‌ई कमजोर दिल धड़कन समेटे रो रहे हैं ,

विवश मजबूर होकर जिंदगी को ढो रहे हैं ,

मगर हम हैं कि हिम्मत हौसले से आ डटे हैं ,

न किंचित भी डिगे हैं या कि तिल भर भी हटे हैं ,

हमारे पूर्वजों ने यही हमको है सिखाया ,

कि साधन शक्ति का आगार है यह मनुज-काया ,

सदा उत्साहपूर्वक विजय के पथ पर बढ़ेंगे ,

कठिन हो राह पर हम हौसले से ही चढ़ेंगे ।।

किसी भय से नहीं भयभीत होते हम कभी भी ,

कभी दबकर रहे हैं औ न रहते हैं अभी भी ,

हमारे पूर्वजों ने युद्ध भी हंसकर लड़ा है ,

हमारा शौर्य सीना तान कर हरदम अड़ा है ,

समय पर काल से आंखें मिलाकर हम अड़े हैं ,

कि सीना तान कर समरांगणों में हम लड़े हैं ,

हमारे हौसले को देवता भी जानते हैं ,

इसी से वे हमारे देश को पहचानते हैं ।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने दशरथ मांझी का उल्लेख क्यों किया, अतिचिन्तनीय कुछ कम हुए यह विद्यालय में किसने कहा था  आदि जानने के लिए सुनें