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15.8.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज अधिक श्रावण मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 15 अगस्त 2023 का सदाचार संप्रेषण *747वां*

 *जीवन तन मन  विवेक का अद्भुत संगम है*

*यह नाट्य मंच पटकथा और अभिनय अनूप*

*इसमें  सब कुछ हर समय घटित होता रहता*

*यही निशीथ की छांव दिवस की यही धूप*


(25-10-2013 को आचार्य जी द्वारा लिखी एक कविता के अंश )



प्रस्तुत है न्यग्भावित ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज अधिक श्रावण मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 15 अगस्त 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *747वां* सार -संक्षेप


 1: श्रेष्ठता को प्राप्त



यह संसार अद्भुत है परमात्मा की इसी अद्भुत सृष्टि में हम जन्म लेते हैं  विचरण करते हैं और विदा हो जाते हैं और पुनः संसार की तैयारी करते हैं

 बिन्दु से सिन्धु सिन्धु से बिन्दु

तक की यात्रा चलती रहती है 

वसुधैव कुटुम्बकम्  विलक्षण सात्विक चिन्तन है 


 यह सब हमारे साहित्य द्वारा हमें प्रचुर मात्रा में प्राप्त है

हमें अनेक बौद्धिक प्रतिभाएं प्राप्त हैं हमारी विचारधारा संपूर्ण विश्व को सुरक्षित रखने में सक्षम है 

प्रतिदिन  इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से अद्वितीय बौद्धिक प्रतिभासम्पन्न आचार्य जी का प्रयास  रहता है कि हमारे अन्दर सद्गुणों का समावेश हो जैसे चिन्तन मनन अध्ययन स्वाध्याय आदि 

हम अध्यात्म का आनन्द लें

लेकिन एकांगी चिन्तन से बचकर अध्यात्म को शौर्य से संयुत रखें अध्यात्म कर्मशीलता का तात्विक पक्ष है

शिवो भूत्वा शिवं यजेत्' यानि शिव बनकर शिव की उपासना करें 

कर्मठता की नई नई परिभाषा  गढ़ें और उसी में एक  वृत्ति  यह पनप जाए कि हमारे मन में जो कुछ आये उसे हम लिख लें भावनाओं की 

यह अभिव्यक्ति समय की बरबादी नहीं है बल्कि समय का सदुपयोग है हमारा आत्मविस्तार है लेकिन उसमें मन रमना चाहिए 

अभिव्यक्तियों के और भी माध्यम हैं हम अपनी रुचि के अनुसार उन्हें अपना सकते हैं 


अतीत से शिक्षा प्राप्त करें वर्तमान से सन्नद्ध रहें और भविष्य के सपनों के लिए  बड़ी से बड़ी सोच रखें और विषम परिस्थितियां आने पर भी उन सपनों को कभी मरने न दें

नर हो न निराश करो मन को 

यही मनुष्य जीवन है मनुष्य परमात्मा की अद्भुत अभिव्यक्ति है हमें मनुष्यत्व की अनुभूति हो तो फिर क्या कहना

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया विनय वर्मा भैया पंकज भैया शौर्यजीत का नाम क्यों लिया teleprompter की चर्चा क्यों की


हमारे विद्यालय का गंगातट के किनारे होने का क्या अभिप्राय है जानने के लिए सुनें

13.8.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का अधिक श्रावण मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 13 अगस्त 2023 का सदाचार संप्रेषण 745

 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।


स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।


अच्छी तरह से आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म की अपेक्षा गुणों की कमी वाला अपना धर्म श्रेष्ठ है।

अपने धर्म में मर जाना भी कल्याण करता है   परधर्म भय देने वाला होता है



हम धर्म अर्थात् कर्तव्य (जो करने योग्य है ) का पालन करें इसके लिए हमारे यहां बहुविध ग्रंथ हैं गृहस्थ यदि निर्विकल्प रहता है तो वह अधार्मिक कहलायेगा

धार्मिक पुरुष को भी व्यावहारिक पथ पर चलना चाहिए 



प्रस्तुत है पालयितृ ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज अधिक श्रावण मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 13 अगस्त 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *745 वां* सार -संक्षेप


 1: संरक्षक



भक्ति और शक्ति जितने सहज सरल विषय लगते हैं उतने ही तात्विक भी हैं भक्ति अर्थात् विश्वास का बोध यदि हमें है तो शक्ति स्वयमेव हमको शरण देने हेतु प्रस्तुत हो जाती है



विश्वास ऐसा कि


सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।


अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।


सारे धर्मों का परित्याग कर तुम  मेरी  शरण में आ जाओ,और इस तरह मैं तुम्हें सारे पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक कतई न करो

जब भगवान कृष्ण के समझाने पर भक्त अर्जुन की सारी उलझनें समाप्त हो जाती हैं


हम बिना भ्रम के उसकी शरण में पहुंच जाएं जिस पर विश्वास किया है जैसा विश्वास अर्जुन ने किया है




आचार्य जी ने नीराजना से नीराजन तक की अद्भुत कथा बताई  शक्ति की उपासना में होने वाली आरती नीराजना /नीराजन कहलाती है

आचार्य जी ने बताया कि बोध चिह्न में भारत सूर्य पुस्तक का संयोजन किया गया प्रतिदिन एक सुविचार लिखा जाने लगा प्रार्थना भी बन गई उस समय के अद्भुत संस्मरण रहे हैं

इसी तरह के अद्भुत संस्मरण हमें लिख लेने चाहिए लेखन -योग महत्त्वपूर्ण है 

इसी लेखन -कार्य पर आधारित  29 दिसंबर 2009

को लिखी 

एक स्वरचित कविता आचार्य जी ने सुनाई


लिखने के लिए कलम लेकर बैठा तो हूं

पर क्या लिख दूं यह सचमुच एक समस्या है

लिखना लिखकर पढ़ना पढ़पढ़ कर फिर लिखना 

अब लगता है यह भी तो एक तपस्या है


तप के प्रकार अब तक जो सुने समझ पाये

उनमें तन मन को ताप तप्त करना भर है 

पर लेखन- तप कुछ ऐसा अद्भुत परिष्कार 

इसमें आनन्द उर्मियों का मानस -सर है 


यह मन का मानस दिव्य दान है स्रष्टा का

इसकी अनुभूति अनोखी है वर्णनातीत 

 इसमें जैसे भविष्य के सपने दिखते हैं 

कुछ वैसा ही उत्सव सा लगता है अतीत 


बस इसीलिए लेखक आनन्दित रहता है

उसको  दुनिया  बस कुछ ही देर  नचाती है 

पर जैसे ही लेखनी उठाता उसका मन 

दुनिया उससे बचती भी और बचाती है


यह कलम जहां भी मन से एकाकार हुई

सर्जन में प्रलय प्रलय में सर्जन रच जाता

लहरों पर  ज्वालामुखियां आग उगलती हैं

विश्रांत गगन में भीष्ण गर्जन मच जाता.....


इस कविता का शेष भाग क्या है आचार्य आनन्द जी की चर्चा क्यों हुई आदि जानने के लिए सुनें