प्रस्तुत है बद्धानुराग ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 4 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण
828 वां सार -संक्षेप
1 स्नेह से बंधा हुआ
सुख हरषहिं जड़ दु:ख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥
धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥4॥
अज्ञानी सुख में हर्षित होते और दुःख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। हे सबका हित करने वाले ! आप विवेक विचारकर धीरज धरिए और शोक का परित्याग कीजिए॥4॥
संकट के समय धैर्य आवश्यक है
संसार में प्रेम आत्मीयता लगाव संसार को बांधता है यही संसार में रहने की हमें शक्ति और सामर्थ्य देता है
संसार में जीवित तत्त्वों में जितना अधिक ईश्वरत्व है उतनी ही उनमें संवेदनाएं हैं
हम आस्थावान् हैं हम भावनाओं की पूजा करते हैं उपासना के माध्यम से अपने पास बैठते हैं अपने तत्त्व को खोजने के लिए
एकोऽहं बहु स्याम
सिद्धान्त के अनुसार हम ही हम सर्वत्र हैं
हम भावों की अभिव्यक्ति करते हैं इसलिए गंगा को हम साक्षात् भगवती मानते हैं
अनास्थावादी ऐसे होते हैं कि जब उन पर कष्ट आता है तो वे खीझते हैं और दूसरे पर कष्ट आता है तो उनकी उपेक्षा करते हैं
अद्वैत सिद्धान्त में जो मिथ्या है वह भी कुछ है
कल हम सबके प्रिय भैया मनीष कृष्णा जी के पिता जी इस संसार में नहीं रहे
उन्होंने अपनी देह दान करने की अंतिम इच्छा प्रकट की
मरणोपरांत भी किसी के काम आना यह भावना सर्वोत्तम है।
स्वर्गीय चाचा जी को निश्चित ही वैकुण्ठ घाम की प्राप्ति होगी।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।2.22।