6.11.23

श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष नवमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 6नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण 830 वां सार -संक्षेप

 संसार समस्या है तो हम हैं समाधान 

निर्मिति निर्माता उभय मध्य के विधिविधान, 

हम संयम शील पराक्रम वाले पौरुष हैं 

संपूर्ण सृष्टि-सर्जना-क्रिया के संविधान।


प्रस्तुत है बद्धभाव ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष नवमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 6नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  830 वां सार -संक्षेप


 1  स्नेहशील




आचार्य जी के इन सदाचार संप्रेषणों का मूल उद्देश्य है कि हमें सत्य का साक्षात्कार होता रहे संयम स्वाध्याय साधना का साथी बना रहे

हम शक्ति के साथ भाव के भी धनी बनें हमारे अन्दर भय और भ्रम न रहे और जब भय और भ्रम दूर होगा तो हमारे अन्दर की शक्ति बहुत विश्वासमयी हो जाएगी

आचार्य जी प्रायः प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख कर देते हैं जो हमारा उत्साह   बढ़ा देते हैं

और हमारे बुझे मन ऊंचे शिखर पर चढ़ जाते हैं 

अध्यात्म की शक्ति मनुष्य का बहुत बड़ा बल होती है

हमेँ मृगमाया न छले इसके लिए अध्यात्म आवश्यक है 

मृत्यु के बाद हम कहां जाते हैं यदि इसकी जिज्ञासा है तो इसका अर्थ है हमारे अन्दर शक्ति है और यदि भय है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि शक्ति का अभाव है


निर्भीकता के कारण अनगिनत सांसारिक समस्याओं से जूझते हुए हम आगे बढ़ते जाते हैं

यही भारतीय जीवन दर्शन है


जनमत मरत दुसह दु:ख होई। एहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई॥

कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना॥4॥


आचार्य जी डायरी लेखन पर जोर देते रहे हैं हमें प्रतिदिन अपनी समीक्षा करनी चाहिए

क्या अच्छा किया क्या बुरा किया

प्राणों के चेतन देश में पश्चिम की चतुर बिलार हर घर कैसे मूस गई इस पर विचार करें

क्या त्याग की जगह भोग उचित है इस पर चिन्तन की आवश्यकता है 


जब भी भाव हमें प्रेरित करें हमें लिखना चाहिए 

आचार्य जी की काव्य रचनाएं बहुत उत्कृष्ट कोटि की होती हैं रचना करना आसान नहीं है इसके लिए मन और बुद्धि का सामञ्जस्य बैठाना होता है

इस अद्भुत कविता को देखिए 


जल रही हर जगह आग


धुंध आंगन तक घिर आया


री सुप्त लेखनी जाग


 छल रही फिर से मृगमाया


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इसके आगे की पंक्तियां क्या हैं जानने के लिए सुनें