7.11.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष दशमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 7 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण 831 वां सार -संक्षेप

 ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।


ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ।



प्रस्तुत है बद्धस्नेह ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष दशमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 7 नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  831 वां सार -संक्षेप


 1  स्नेहशील


शिक्षा मनुष्य का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण जीवनाङ्ग है ज्ञान अर्थात् वेद के छः अङ्गों में शिक्षा प्रथम है

शिक्षा उच्चारण  ध्वनि का शास्त्र है

भर्तृहरि के वाक्यपदीय के अनुसार संसार में ऐसा कोई ज्ञान नहीं है जो शब्द से संबद्ध हुए बिना सम्भव हो


न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्व शब्देन भासते ।। (वाक्यपदीयम् 1 / 114 )  

शब्द के साथ तादात्म्य करके ही संसार का समस्त ज्ञान भासित होता है। सभी शब्द वर्णात्मक हैं और वर्णमाला और उसके उच्चारण का ज्ञान प्रदान करने वाली विद्या शिक्षाशास्त्र है। शिक्षाशास्त्र के अध्ययन के बिना अन्य विद्याओं का ज्ञान का व्यवहारतः स्वरूप लाभ होना संभव नहीं है। यही शिक्षा का मौलिक महत्त्व है 


शिक्षा, कल्प, व्याकरण,निरुक्त,ज्योतिष, छन्द छः वेदांग हैं


छन्द को वेदों के पैर , कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक, व्याकरण को मुख कहा गया है।


छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्

तस्मात्सांगमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते॥

व्यावहारिक ज्ञान के लिए उपनिषद् हैं जैसे एक उपनिषद् है तैत्तिरीय उपनिषद्


तैत्तिरीय उपनिषद्  तैत्तिरीय आरण्यक का ही अंश है। इस आरण्यक के सात से नौ प्रपाठकों को ही तैत्तिरीय उपनिषद् कहा जाता है। यज्ञ-संबंधी  विषयों का समावेश इस ग्रन्थ में  है।

तैत्तिरीय आरण्यक कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखा का आरण्यक ग्रन्थ है। तैत्तिरीय ब्राह्मण के एक भाग को तैत्तिरीय आरण्यक कहा जाता है 

इस आरण्यक में दस प्रपाठक हैं और सारे प्रपाठक अनुवाकों में विभक्त हैं। अनुवाकों की कुल संख्या 170 है।

ऐसी थी हमारी शिक्षा जिसके बल पर भारत विश्वगुरु कहलाया

वैदिक काल से ही भारतीय मनीषा ने शिक्षा की उपादेयता को भली-भाँति सनझ लिया था। कदाचित यही कारण है कि वेदांगों में शिक्षा को पहले रखा गया है।


बाद में दैत्यों के कारण इसमें दोष आने लगे शिक्षा में बहुत उथल पुथल हुई है


देश स्वतन्त्र हुआ तो ज्ञान शून्य व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया गया

ज्ञान शून्य व्यवसाय लोभ वासना पैदा करते हैं

लोभी वासनायुक्त व्यक्ति हमेशा दुःखी होता है


इसके अतिरिक्त श्रीकृष्णदेव जी  और प्रणय जी की चर्चा क्यों हुई 

 भैया नीरज जी का नाम क्यों आया आदि जानने के लिए सुनें