प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 19 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६३५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११७
सहव्यक्तित्व, जिसका आधार प्रेम आत्मीयता और विश्वास है, की चर्चा अत्यन्त आवश्यक है
आचार्य जी अपनी दिशा और दृष्टि सुस्पष्ट रखते हुए गहन अनुभवों के आधार पर हमारे भीतर प्रवेश करने की चेष्टा यह कहते हुए कि
मैं मानव की मानवता का परिचायक हूँ,
वंचित शोषित पीड़ित का भाग्य विधायक हूँ,
भ्रम भय से ग्रस्त जवानी का उन्नायक हूँ,
भारती मूल स्वर का मंगलमय गायक हूँ ॥
करते हैं ताकि हम केवल भौतिकता में जीवन न बिताएं भयभीत समाज में व्याप्त अंधकार को दूर करने के लिए कर्म फल में आसक्ति से रहित कर्मयोगी बनें, परिस्थितियों के अनुसार वाणी व्यवहार करें और हमारे ऐसे व्यक्तित्व का उत्कर्ष हो सके जिसमें समाजोन्मुखता के साथ देशभक्ति का भाव भी समाहित हो
देशभक्ति का भाव हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि यही भाव हमें अपने देश, समाज, संस्कृति और परम्पराओं के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाता है। देशभक्ति केवल भावनात्मक उद्गार नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर जीवन जीने की प्रेरणा है। इससे त्याग, सेवा, अनुशासन और उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है, जो राष्ट्र के समग्र विकास के लिए अत्यन्त अनिवार्य है।
आचार्य जी का उद्देश्य है कि हम राष्ट्र की सेवा को अपना परम कर्तव्य समझें क्योंकि सशक्त राष्ट्र का निर्माण केवल शासन या संस्थाओं से नहीं, बल्कि चरित्रवान्, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों से होता है। इसी कारण उनके लिए व्यक्ति-निर्माण, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना महत्त्वपूर्ण है ताकि हम अपने आचरण और कार्यों के माध्यम से राष्ट्रहित में योगदान दे सकें।
आचार्य जी ने भारत की यज्ञमयी संस्कृति की चर्चा करते हुए बताया
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।3.14।।
समस्त प्राणी अन्न से जीवित रहते हैं। अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है। वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ की उत्पत्ति कर्म से होती है।
यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाव से किया गया धर्मयुक्त कर्म है। जब मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन लोककल्याण की भावना से करता है, तो प्रकृति संतुलित रहती है और समाज में समृद्धि आती है।
इसके अतिरिक्त मणिकर्णिका घाट का उल्लेख क्यों हुआ आचार्य श्री जगपाल जी की क्या बात आचार्य जी को याद आई भैया मुकेश जी को क्या परामर्श दिया गया पूर्ण संन्यास क्या है जानने के लिए सुनें