20.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 20 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३६ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 20 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११८

महापुरुषों की जीवनियों का अध्ययन करें क्योंकि इनके अध्ययन से शक्ति बुद्धि कौशल विचार आदि की प्राप्ति होती है


प्रेम, आत्मीयता,अनुशासन, नियमितता,यशस्विता से रहित कर्म में प्रवृत्त रहने की वृत्ति आदि अनेक जो गुण हमें प्राप्त हुए हैं यह आचार्य जी के कारण ही संभव हुआ है हमें इन्हें कभी नहीं त्यागना चाहिए 


सत् का विस्तार करना और असत् का नाश करना संसार में किया जाने वाला वह कर्म है, जो केवल मनुष्य योनि में ही संभव है। यदि हम लाभ और लोभ से मुक्त होकर शांत चित्त से विचार करें, तो यह स्पष्ट होता है कि  हमें जो मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है उसे निष्क्रियता, प्रमाद या स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों में नष्ट कर देना बुद्धिमत्ता नहीं है।हमारे पास शक्ति, बुद्धि और विचार का जो सामर्थ्य है, उसका सदुपयोग करना हमारा कर्तव्य है। भगवान् राम की कथा में भी यही स्पष्ट किया गया है l



कठिन संसार से पीछा छुड़ाकर मुक्त विचरण है

कठिन वाणी विभव से मुक्त अन्तर्भाव धारण है

कठिन तप त्याग सेवा साधना की जिंदगी जीना

कठिन संकल्पमयता के सहित जग आचरण भी है


हम तप त्याग सेवा आदि के लिए संकल्पित हों जो लोग अपने आत्मतत्त्व को नहीं जानते, उनके लिए यह संसार और परलोक दोनों ही प्रकाशहीन हो जाते हैं। ऐसे लोग जीवन का वास्तविक उद्देश्य न समझ पाने के कारण स्वयं का ही विनाश करते हैं। मृत्यु के बाद वे भी उसी घोर अज्ञान और अन्धकार से भरे लोकों को प्राप्त होते हैं।


 यह सत्य है कि संगठन में रहना आवश्यक है, क्योंकि संगठित शक्ति ही समाज और राष्ट्र को दिशा दे सकती है, किन्तु केवल संगठन पर्याप्त नहीं है। संगठन के साथ विचारशीलता, विवेक भी अनिवार्य है। बिना विचार के किया गया कर्म दिशाहीन हो जाता है हमें अपने आचरण, चिंतन और कर्म के माध्यम से संसार को यह अनुभूति करानी चाहिए कि हम केवल संख्या मात्र नहीं हैं, बल्कि  सत् की स्थापना और असत् के विनाश के लिए सजग रूप से सक्रिय हैं

आचार्य जी ने यह भी बताया कि कीर्तन भजन आदि का उद्देश्य है कि हमारा मन जंजालों से मुक्त हो जाए

भावना से विचार में और विचार से व्यवहार में प्रवेश करना अनिवार्य है 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अधिवेशन की चर्चा क्यों की भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ  प्रशंसा किए जाने पर गोस्वामी तुलसीदास जी क्या करते थे जानने के लिए सुनें