18.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 18 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६६५ वां* सार -संक्षेप

 वह बुझने वाली आग नहीं, रग-रग में उसे समाए हूं।

यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या विस्मय?

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 18 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४७

प्रेम आत्मीयता के आधार पर संगठित रहें, संगठन का विस्तार करें, शक्ति प्रदर्शित करने में भ्रमित न रहें 


आचार्य जी निरन्तर यह प्रयास करते हैं कि इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से हम उत्साहित, उत्थित, उद्बोधित और जाग्रत हो सकें। उनका उद्देश्य है कि हम केवल बाह्य ज्ञान तक सीमित न रहें, अपितु जीवन के सार और असार दोनों का यथार्थ विवेकपूर्वक बोध प्राप्त करें।


भारतवर्ष 

जिसे केवल भौगोलिक भूमि नहीं, बल्कि सृष्टि के आदि क्षण से जुड़ी हुई, देश-काल से परे, विस्तृत और दिव्य चेतना वाले राष्ट्र के रूप में निम्नांकित पंक्तियां चित्रित कर रही हैं 



*भारतवर्ष हमारा है, यह हिंदुस्तान हमारा है।*

*जिस दिन सबसे पहले जागे, नव-सिरजन के स्वप्न घने,*

*जिस दिन देश-काल के दो-दो, विस्तृत-विमल वितान तने,*

*जिस दिन नभ में तारे छिटके, जिस दिन सूरज-चाँद बने,*

*तब से है यह देश हमारा, यह अभिमान हमारा है।*


की प्रकृति आदिकाल से ही ऐसी रही है कि वह दुष्ट प्रवृत्तियों का उन्मूलन कर उन्हें भी मानवता के पथ पर अग्रसर करने का प्रयास करती है। जिन दुष्ट व्यक्तियों या शक्तियों में विध्वंस की प्रवृत्ति रही है, भारत की संस्कृति ने उन्हें संस्कारित कर मनुष्यत्व की ओर उन्मुख करने का प्रयास किया है। किन्तु इस महान् कार्य के लिए शक्ति का संग्रह अत्यन्त आवश्यक है। संसार में व्यवस्था, शांति और धर्म की स्थापना संगठित शक्ति से सम्भव होती है। अतः भारत राष्ट्र के प्रति श्रद्धा और समर्पण रखने वाले हम लोगों के लिए संगठित रहना अत्यन्त आवश्यक है। संगठन प्रेम, आत्मीयता,सद्व्यवहार और  विश्वास के आधार पर ही स्थिर और प्रभावी बनता है। जहाँ परस्पर विश्वास होता है, वहाँ शक्ति का संचय होता है और जहाँ शक्ति संगठित होती है, वहाँ धर्म, न्याय और व्यवस्था की स्थापना सहज सम्भव हो जाती है।अतः आवश्यक है कि हम प्रेम और आत्मीयता के सूत्र में बंधे रहते हुए अपनी संगठित शक्ति युगभारती के विकास में सहायक बनें   उसे लोकमंगल के कार्यों में नियोजित करते रहें दुष्टों के विध्वंस में भ्रमित भयभीत न रहें 


आचार्य जी ने समुद्र के खारेपन से किसकी तुलना की, हिन्दुत्व को कैसे व्याख्यायित किया,Indian Jews in Israel पुस्तक का उल्लेख क्यों हुआ, आचार्य जी को चीनी डाक्टर के पास कौन भैया ले गए थे जानने के लिए सुनें