प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 17 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६६४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४६
सत्कार्य तल्लीन होकर करें
आचार्य जी का नित्य प्रयास रहता है कि हमारे मनों में सद्भावों और सद्विचारों का सतत मंथन होता रहे, जिससे हमारे आचरण में शुद्धता और वाणी /व्यवहार में सौम्यता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगे l
हम जब उच्च आदर्शों में स्वयं को समर्पित करते हैं , तभी हमारा व्यक्तित्व विकसित होता है।
आचार्य जी का यह भी प्रयत्न रहता है कि हम आत्मस्थ होने की भी चेष्टा करें आत्मस्थ होने पर ज्ञात होता है कि मैं न क्षरणशील हूं न मरणशील मैं तो हूं
चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्
अर्थात् मैं सीमित देह नहीं, बल्कि अजर-अमर, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त आत्मस्वरूप हूँ। यही अवस्था परमात्मा से एकत्व की अनुभूति है। इस अनुभूति से हम न भ्रमित रहते हैं न भयभीत l
हम जो भी करें, पहले उसके उद्देश्य को समझें, फिर पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ उसमें तल्लीन हों इस कारण हमारे प्रयास अद्भुत और सार्थक परिणाम प्रदान करेंगे।
हम यह मानकर चलते हैं कि हमारा राष्ट्र परमात्मा की लीला का केंद्र है। अतः हम राष्ट्र की सेवा को उपासना के समान मानते हैं। इस महान् ध्येय की पूर्ति के लिए हमें अनेक ऐसे राष्ट्रभक्तों की आवश्यकता होती है, जिनके हृदय में देश के प्रति निष्कलुष प्रेम और समर्पण का भाव हो। ऐसे राष्ट्रभक्त अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हैं। वे देश के लिए जीते हैं, देश के लिए कार्य करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने को भी तत्पर रहते हैं।
इसी प्रकार के समर्पित और आदर्श नागरिकों से राष्ट्र सशक्त, समृद्ध और गौरवशाली बनता है।
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