*९५७ वां* सार -संक्षेप
1 निर्दोष
अतिशय रगड़ करे जो कोई।अनल प्रकट चंदन ते होई।।
या
अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई॥8॥
यदि कोई चंदन की लकड़ी को बहुत अधिक रग़ड़े, तो उससे भी अग्नि प्रकट हो जाती है
इसी प्रकार यदि हम इन सदाचार संप्रेषणों के सदाचारमय विचार ग्रहण करते हैं इनकी सुसंगति करते हैं तो ये हमारे अन्दर अद्वितीय परिवर्तन लाने में सक्षम होंगे
हमारे लिए अत्यन्त उपयुक्त लाभकारी और हमें प्रेरित उत्साहित आनन्दित शक्तिसम्पन्न करते शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की आस्थामय व्याख्या करते ये सदाचार संप्रेषण अद्भुत हैं
हम राक्षसी वृत्ति के घालकों के अन्दर आशा का संचार करती रघुनायक का धनुषायक बनाती आत्मबोधोत्सव मनाती
अखंड भारत के लक्ष्य की ओर ले जाती शुभ कर्मों का वितान तनवाती
विभु की कल्पना हमारे मन में प्रतिपल संजोती आचार्य जी द्वारा रचित यह कविता देखिए
मैं तत्व शक्ति विश्वास समस्याओं का निश्चित समाधान
मैं जीवन हूं मानव जीवन मैं सृजन विसर्जन उपादान
मैं भाव प्रभाव सुनिष्ठा हूं
धरती की प्राणप्रतिष्ठा हूं
संकट कराल संघर्ष बीच दृढ़ धैर्य शक्ति मंजिष्ठा हूँ
मैं संयम शुचिता सात्विकता संतोष सरलता मुदिता हूं
मैं गहन निशा में चन्द्रकिरण प्रमुदित प्रभात का सविता हूं
विभु की कल्पना और अणु की अनुभूति हमारे मन में है
संसार धर्म का ज्ञान और परिपालन भी जीवन में है
मैं राग विराग और अनुरागी स्वर सरगम का गायक हूं
इस महानाट्य के रंगमंच का मैं अभिनेता नायक हूं
मैं सृजन प्रलय का कथा व्यास सुर संगत ढोल मजीरा हूं
विश्वामित्री संकल्प और भावना भक्ति की वीणा हूं
मैं प्रणव मंत्र का घोष प्रकृति की लीला का सहकर्मी हूं
सर्जन का शुभ संकल्प शास्त्र विधि पालन का सद्धर्मी हूं
मैं कर्म कथा का गायक शिव संदर्भों का उन्नायक हूं
मैं चक्षु दर्शन कभी कभी रघुनायक का धनुषायक हूं
इतिहास पृष्ठ का लेखक मैं भूगोल बनाने वाला हूं
राक्षसी वृत्ति का घालक दैवी जीवन का रखवाला हूं
मैं सृष्टि सृजन आधार और आधेय हमारा स्रष्टा है
इस तन को ही अपनाया करता सृजन प्रलय का द्रष्टा है
इसलिए दिव्य मानो जीवन को कभी उपेक्षित करो नहीं
नश्वर सुख सुविधाओं से इसकी तुलना करके मरो नहीं
प्रतिपल अनुभव करना सीखो मैं अमर तत्व रखवाला हूं
परमात्म शक्ति की दिव्य ज्योति इस जगतीतल की ज्वाला हूं
प्रार्थना यही परमेश्वर से मानवपन पर विश्वास रहे
संसार असार न छू पाए जब तक इस तन में श्वास रहे
हे परमपिता मानवपन पर विश्वास सदा ही बना रहे
शुभ कर्मों का मंगल वितान आजीवन सिर पर तना रहे
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया अतुल वाजपेयी जी भैया प्रमोद जी का नाम क्यों लिया
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