प्रस्तुत है अनवद्यरूप ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार 13 मार्च 2024 का सदाचार संप्रेषण
*९५८ वां* सार -संक्षेप1 निर्दोष
तैत्तिरीय उपनिषद् के साथ
कौषितकीब्राह्मणोपनिषद् तथा मुद्गलोपनिषद् में भी सम्मिलित एक प्रार्थना है:
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ।
सूर्य हमारे लिए शान्तिस्वरूप हों। वरुण हमारे लिए शान्तिस्वरूप हों। अर्यमन (आकाश में आकाशगंगा उन्हीं के मार्ग का सूचक माना जाता है) देवता हमारे लिए शान्तिस्वरूप हों। इन्द्र और बृहस्पति भी हमारे लिए शान्तिस्वरूप हों,विष्णु हमारे लिए शान्तिप्रदाता हों। ब्रह्म को नमन। वायु को मेरा नमन। आप, आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं और उसी प्रत्यक्ष ब्रह्म रूप में मैंने आपका ही कथन किया है। मैं सत्याचरण (ऋतम्) कह रहा हूं । मैं सत्य का कथन कह रहा हूं । उसी ने मेरी रक्षा की है। उसी ने 'वक्ता' की रक्षा की है। अवश्य ही उसने मेरी रक्षा की है; उसने 'वक्ता' की रक्षा की है।
ॐ शान्ति ! शान्ति! शान्ति!
विद्यार्थी प्रार्थना कर रहा है कि ये सब हमें सुस्पष्ट हों और हमारे लिए कल्याणकारी हों मेरी रक्षा तो करें ही मेरे गुरु की भी रक्षा करें
हम एक दूसरे की कुशल क्षेम पूछें
एक दूसरे का सहयोग बहुत आवश्यक है
आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम पूर्व विद्यार्थी उपनिषदों का अध्ययन अवश्य करें चिन्तन करें
यह कठिन बिल्कुल नहीं है इसलिए अध्ययन के साथ इसकी चर्चा भी अवश्य करें अपनी चिन्तन शैली में परिवर्तन करें और एक अभिभावक के रूप में हमारा क्या कर्तव्य है इसका हमें बोध हो गृहस्थ के रूप में हम तपस्वी हैं हमारी तपस्या से भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन होना चाहिए हमारा तेजस उसमें प्रत्यक्ष हो अस्ताचल देशों से भ्रमित न हों
गुरु शिष्य परंपरा न भूलें कर्तव्य ध्यातव्य का बोध हो मालिक बनने का प्रयास करें चिन्तन मनन विचार करें मार्ग निकालें
पूजा पाठ का भाव विकसित करें अपनी भाषा भूषा पर गर्व करें
आत्महीनता की परकाष्ठा में पहुंचे तुलसी कहते हैं
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥
चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़े॥1॥
जो कराल कलियुग में जन्मे हैं, जिनकी करनी कौए जैसी है, वेष हंस सा है, जो वेदमार्ग को छोड़कर कुमार्ग पर चल रहे हैं, जो कपट की मूर्ति और कलियुगी पापी हैं
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ ॥
ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने ॥3॥
इस तरह यदि मैं अपने सारे अवगुणों को ही कहने लगूँ तो कथा बहुत बढ़ जाएगी और मैं पार नहीं पा पाऊँगा। इस कारण मैंने बहुत कम अवगुणों का वर्णन किया है। बुद्धिमान लोग थोड़े ही में ज्यादा समझ लेंगे
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥5॥
मैं न तो कवि हूँ, न चतुर , अपनी बुद्धि के अनुसार प्रभु राम के गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्री राम के अपार चरित्र और कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि l
लेकिन रामकथा कहते कहते तुलसीदास जी की आत्महीनता दूर हो जाती है हमें भी आत्मबोध होना चाहिए
हमें भी रामत्व का बोध होना चाहिए हमारा प्राप्तव्य राष्ट्र की सेवा होना चाहिए यह भाव हमारे भीतर प्रविष्ट हो आचार्य जी इसके लिए नित्य प्रयास करते हैं
हम शक्तिसम्पन्न बनें तपस्वी बनें अध्यात्म यही कहता है कि हम समाज से संयुत हों सूर्य वायु जल वृक्ष नदियां आदि भी समाज सेवा में रत रहते हैं राम का रामत्व अनुभव कर लेने पर हम शिष्य कामना करते हैं कि हमारे साथ हमारे गुरु को भी और अधिक यशस्विता और आध्यात्मिकता प्राप्त हो
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया मनीष कृष्णा का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें