आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।
जैसे सारी नदियों का जल चारों ओर से जल से ही परिपूर्ण समुद्र में आकर मिलने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा में अचल प्रतिष्ठित रहता है वैसे ही सम्पूर्ण भोग पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किए बिना ही प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्ति की प्राप्ति करता है, भोगों की कामना वाले के लिए यह संभव नहीं
प्रस्तुत है चित्तवतृ ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार 14 मार्च 2024 का सदाचार संप्रेषण
*९५९ वां* सार -संक्षेप
1 करुणा से भरा हुआ
अत्यन्त प्रभावकारी इन सदाचार संप्रेषणों के द्वारा आध्यात्मिक पथ पर चल रहे करुणाकर आचार्य जी नित्य हमें प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं यह हनुमान जी महाराज की महती कृपा है
परिस्थितियों को अनुकूल बनाकर भावों,जिनमें शक्ति भक्ति विश्वास संयम साधना संतोष और सत्कर्मों का अनन्त प्रवाह है, का संग्रहण और प्रकटीकरण मनुष्य के जीवन का बहुत बड़ा आनन्दमय पक्ष है
परिस्थितियां प्रतिकूल न हों इसके लिए हम सब लोग अपने कर्तव्य का पालन करते हुए तपस्विता का वरण करते हुए नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करें इस चुनौती को हम बेझिझक स्वीकारें
जो हो रहा है यह परमात्मा की लीला है परमात्मा अनुरक्त और विरक्त दोनों होता है
अनुरक्त होने पर वह इस धरती की रक्षा करता है संपूर्ण सृष्टि को संरक्षित सुरक्षित करता है और विरक्त होने पर महाप्रलय की तैयारी करता है और हम उसी लीला के पात्र हैं हमें अपनी भूमिका की अनुभूति करते हुए उस भूमिका के साथ न्याय करना चाहिए
मोहाक्रांत अर्जुन
कर्तव्य विस्मृत कर गया है
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।2.67।।
जिस प्रकार जल में वायु नाव को हर लेती है उस प्रकार ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों के बीच में जिस इन्द्रिय का
अनुकरण मन करता है वह एक इन्द्रिय ही इसकी प्रज्ञा को हर लेती है
उस अर्जुन को भगवान् समझा रहे हैं
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।2.68।।
इसलिए जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार से निगृहीत हैं, उसकी बुद्धि सुस्थिर है वह स्थितप्रज्ञ है
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।2.69।।
सम्पूर्ण प्राणियों की जो रात (परमात्मा से विमुख होना ) है, उसमें आत्मसंयमी व्यक्ति जागता है, और जिसमें सब प्राणी जागते हैं अर्थात् भोग और संग्रह में लगे रहते हैं वह आत्मनिरीक्षक तत्त्वज्ञ की दृष्टि में रात है।
जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं का त्याग करके स्पृहा- ममता- अहंकार रहित होकर आचरण करता है, वह शांति पाता है।
विरक्त रहकर अपने महालक्ष्य
वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः के प्रति हमें अनुरक्त होना चाहिए राष्ट्र के वैभव के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए
छोटे छोटे कामों में भी कर्तव्य का बोध होना चाहिए
इसके अतिरिक्त अगले जन्म में दो शादी कर लेना किसने कहा भैया राजेन्द्र गुप्त जी का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया विद्यालय को मान्यता कैसे मिली किस शब्द की जगह अन्य व्यय लिखना उचित रहा जानने के लिए सुनें