15.3.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार 15 मार्च 2024 का सदाचार संप्रेषण *९६० वां* सार -संक्षेप

 यह चित्त-चातक है तृषित, कर शान्त करुणा-वारि से,

घनश्याम ! तेरी रट लगी आठों पहर है अब इसे ।।

प्रस्तुत है चित्तापहारक ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार 15 मार्च 2024 का सदाचार संप्रेषण
  *९६० वां* सार -संक्षेप
1 मनोहर

जीत लिया मन जिसने उसने जीत लिया जग सारा..

मनुष्य के सूक्ष्म शरीर के अन्दर उपस्थित सूक्ष्म तत्त्व अत्यन्त विलक्षण और गम्भीर है इसी तत्त्व में ज्ञान,चिन्तन,मनन, ध्यान, विचार, विवेक आदि बहुत कुछ है

पुरुषत्व की अनुभूति करने वाला अर्थात् पुरुषार्थी मनुष्य सहज रूप से तपस्वी होता ही है जलती हुई लालटेन जलता हुआ दीपक मार्गदर्शक है लोग उसे देखकर मार्ग पकड़ते है बुझे दीपक को ठोकर मार दी जाती है हम एक दूसरे के प्रकाश को देखते हैं प्रकाश अर्थात् ज्ञान
 जीवात्मा की परमात्मा से सम्बन्ध की अनुभूति आनन्ददायक है प्रातःकाल ही इसकी अनुभूति से दिन भर की ऊर्जा प्राप्त हो जाती है

तू है सरोवर अमल तो मैं एक उसका मीन हूँ,
तू है पिता तो पुत्र मैं तब अंक में आसीन हूँ ।।

परमात्मा की रचनाधर्मिता उसकी बहुत बड़ी लीला है हम भारतीय अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि असंख्य संघर्षों को झेलने के बाद भी जीवित जाग्रत हैं और यशस्विता के लिए प्रयत्नशील रहते हैं सफलता तो प्राप्त करते ही हैं हम संघर्षशील तो रहे लेकिन कभी पराजित नहीं रहे

वेदव्यास, वाल्मीकि, अकबर के काल में आंखों में पट्टी बांधे समाज को शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराने वाले तुलसीदास आदि परमात्मा के अंश हैं परमात्मा इनके माध्यम से हमें ज्ञान और शक्ति देता है

गीता तो अद्भुत ज्ञान का भंडार है गीता संसार से प्रारम्भ हुई धृतराष्ट्र अंधे हैं गांधारी ने भी आंख पर पट्टी बांध रखी है वह मोहांध है द्रौपदी के अपमान पर भीष्म सिर झुकाए बैठे रहे
और फिर मोहग्रस्त अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञान देते हैं

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।2.23।।
गीता जीवन का तत्त्व संदेश विचार शक्ति दिशा दृष्टि है
इसी प्रकार श्रीरामचरित मानस है
यह देखिए कि परमात्मा किस किस रूप में कहां कहां उपस्थित होकर कौन कौन से काम करा लेता है
हम भी यही अनुभव करें कि हम भी वही हैं
हम उत्साहित रहें सचेत जाग्रत रहें आनन्दित रहें समाज और देश सेवा के कार्य करते चलें

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कृष्णचन्द्र गांधी जी , नाना जी आदि को शिशु मन्दिरों की स्थापना से कैसे संयुत किया
महाराष्ट्र के गोविन्दगिरि जी महाराज का उल्लेख क्यों किया जानने के लिए सुनें