कविता मन का विश्वास भाव की भाषा है
हारे मानस की आस प्राण परिभाषा हैवरदान भारती का है ये शिव का संयम
शुभ सुखद सहज करती जीवन का पथ दुर्गम
कविता की बान अनोखी है अलबेली है
पीड़ाओं की सहचरी अभाव सहेली है
यह ज्योति अमावस की प्रभात का सूरज है
संगम का जल वृन्दावन की पावन रज है
कवि कर्म धर्म की बान जिसे भा जाती है
सपनों की दुनिया नयनों में छा जाती है
कवि की वाणी में सत्य शक्ति प्रेरणा भरी
संकट के तूफानों से यह जूझती तरी
कविता कल्याणी कीर्ति कर्म की धारा है
जूझती तरी के लिए सुरम्य किनारा है
आनन्द विधायी सत्य तत्त्व की राह सरल
अधरों पर अमृत है अन्तर में पचा गरल
कविता का सत्य हृदय में भर देता उछाह
शीतल कर देता अन्तस्तल का विषम दाह
भटके राही को राह दिखाती कविता है
कविता रजनी में चांद दिवस में सविता है
प्रस्तुत है उल्लाघ ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार 18 मार्च 2024 का सदाचार संप्रेषण
*९६३ वां* सार -संक्षेप
1 प्रसन्न
अन्तस्तल के विषम दाह को शीतल कर हमें प्रसन्न करने वाले,हमारे स्वार्थों को सीमित कर हमारी परमार्थ -भावना को बढ़ाने वाले, जीवन के दुर्गम पथ को सहज बनाने वाले, सत्त्व तत्त्व के मार्ग को सरल बनाने वाले,किसी भी भटके राही को राह दिखाने में सक्षम कि जीवन केवल प्राणों का परिरक्षण नहीं है ,पीड़ाओं के साथी के रूप में प्रस्तुत ये सदाचार संप्रेषण, जो किसी दैवीय योजना के कारण हमारे समक्ष उपस्थित हो जाते हैं,अद्भुत हैं ये हमें मनुष्यत्व की अनुभूति कराते हैं अन्तर्मन की मधुरिमा की पहचान कराते हैं हमारी अकर्मण्यता को दूर कराते हैं अधिक से अधिक कर्तव्यों की ओर उन्मुख करते हैं
मनुष्य का जब दैवीय योजना पर विश्वास सुदृढ़ हो जाता है तो वह मान लेता है कि वह परमात्मा की लीला का एक पात्र है अध्यात्म के चरम पर पहुंच जाने पर हमें समझ में आ जाता है कि परमात्मा ही सृष्टि रचता है उसे पालता है और उसे मिटा देता है
परमात्मा की इस विधि व्यवस्था को परमात्मतत्त्व के सत्त्व को भारतवर्ष के ऋषियों ने बहुत गहराई से जान लिया
हमारा कर्तव्य है कि अपने शिक्षकत्व की अनुभूति करते हुए हम भटके लोगों को सही राह दिखाएं उन्हें मनुष्यत्व की अनुभूति कराएं कर्म धर्म का चिन्तन सुस्पष्ट कराएं
उन्हें बताएं कि अध्यात्म सदैव शौर्य से प्रमंडित होना चाहिए क्यों कि जब हम अध्यात्म को शौर्य से संयुत करते हैं तो उसमें उत्साह उमंग उल्लास कर्म और आनन्द दृष्टिगोचर होता है
हमारे यहां प्रतिदिन उत्सव मनाएं जाते हैं उत्सव तब मनाए जाते हैं जब मनुष्य उत्साहित रहता है उसकी व्याकुलता पची रहती है
ऐसा ही एक उत्सव कल सम्पन्न हुआ
उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान लखनऊ द्वारा आयोजित
'भगवान राम और आज का परिवेश 'विषय पर
सरस्वती विद्या मन्दिर इंटर कालेज सिविल लाइंस , उन्नाव में कल एक संगोष्ठी संपन्न हुई
आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम लोग वृद्ध जनों की उपेक्षा न करें
उनके अनुभवों से हम सीखने की चेष्टा करें उनके विचारों को जानें और उनका संग्रह करें
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने पूज्य भाईसाहब का उल्लेख क्यों किया भैया अतुल वाजपेयी जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें