प्रयास हो कि यह शरीर वज्र के समान हो
विचार हो कि मन गहन गँभीर सावधान हो
प्रयास हो कि बुद्धि शुद्ध बुद्ध ज्ञानवान हो
नजर तले स्वदेश के सहित सकल जहान हो।
प्रस्तुत है अनवम ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार 6 मार्च 2024 का सदाचार संप्रेषण
९५१ वां सार -संक्षेप
1 श्रेष्ठ
प्रसिद्धि के लिए नहीं प्रयास कोई खास हो,
सरल हृदय मनोज्ञ कर्मशील आसपास हों l
न दम्भ रंचमात्र किन्तु स्वाभिमान साथ हो
इन्हीं गुणों के साथ साथ संगठित प्रयास हो ll
जब हमारे परिवेश में अत्यन्त सरल हृदय वाले कर्मशील व्यक्ति होंगे और हम अपने को कुसंगति से बचाए रखेंगे
तो हमारी उन्नति होगी
तात्विकता, सात्विकता, जागतिकता और आध्यात्मिकता के समन्वित स्वरूप हनुमान जी की कृपा से व्यवहार से चिन्तन की ओर उन्मुख हमारे लिए अत्यन्त अनुकूल यह अनुकाल सदाचार संप्रेषण हम परमात्मा की लीला के भिन्न भिन्न दिखाई देने वाले लेकिन भीतर से एक पात्रों के मानसिक और सांसारिक दोनों पक्षों का विकास करता है इससे निःसृत हो रहे विचारों में देश और समाज का हित अन्तर्निहित है ये संप्रेषण आत्मतत्त्व के अनुसंधान
अर्थात् हम अपने को पहचानें
(आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् )
हेतु अद्भुत स्रोत हैं
परमात्मतत्त्व का अत्यन्त सूक्ष्म अंश यह आत्मतत्त्व उसी परमात्मतत्त्व में सम्मिलित होने की चेष्टा में रत रहता है
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
मैं संसार का मूल तत्त्व हूं
चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्
यह सारा सनातन चिन्तन हैl
हमारे चिन्तन में सर्वत्र शान्ति की कामना रहती है सर्वत्र सुख की अभिलाषा सन्निहित है
इसके लिए
ॐ सहनाववतु सहनौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
भाव के साथ
हमें अद्भुत शक्ति की भी आवश्यकता है जो व्यवधान डालते हैं उनसे जूझने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम के काज करने की आतुरता आवश्यक है
अगली पीढ़ी को भी संदेश देते हुए
हिन्दु युवकों आज का युगधर्म शक्ति उपासना है ।
बस बहुत अब हो चुकी है शांति की चर्चा यहाँ पर,
हो चुकी अति ही अहिंसा-तत्व की अर्चा यहाँ पर,
ये मधुर सिद्धांत रक्षा देश की पर कर ना पाये,
ऐतिहासिक सत्य है, यह सत्य अब पहिचानना है ।।1
इसके अतिरिक्त रामोपासक आचार्य जी ने भैया संदीप जी का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें