7.3.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार 7 मार्च 2024 का सदाचार संप्रेषण ९५२ वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है अनिद्र ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार 7 मार्च 2024 का  सदाचार संप्रेषण 

  ९५२ वां सार -संक्षेप

1 जागरूक


समाज और राष्ट्र के लिए सदा जागरूक रहने वाले आचार्य जी के ये सदाचार संप्रेषण हमारे लिए अत्यन्त लाभकारी हैं जो आत्मस्थ भावभूमि से उत्पन्न  हो ऐसे अध्यात्म की  ये प्रस्तुति हैं

ये संप्रेषण हमारी भावना को जाग्रत करते हैं अपने आत्मतत्त्व के अनुसंधान के लिए हमें प्रेरित करते हैं हम कौन हैं हमारे मनुष्य के रूप में जन्म लेने के पीछे क्या उद्देश्य है आदि प्रश्नों के उत्तर इन संप्रेषणों से मिलने लगते हैं


हमें दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए क्यों कि सारे कर्म धुएँ से अग्नि की तरह किसी न किसी दोष से संयुत होते हैं।

हमें भय और भ्रम से दूर रहते हुए आश्वस्त रहना चाहिए कि यदि समस्याएं हैं तो उसके समाधान भी हैं आत्मभूमि में प्रविष्ट होने पर हमें अपने शरीर के कष्ट भी नहीं दिखाई देते 

रात्रि के बाद प्रभात होता ही है


लखनऊ में सितम्बर माह में होने वाले हमारे राष्ट्रीय अधिवेशन का उद्देश्य है कि समाज हमको जाने समझे यह अधिवेशन आत्माभिव्यक्ति है इसमें निस्पृह भाव से समाज -हित और राष्ट्र -हित के कार्य करने वाले हम मौन साधक अपने कार्यों की प्रस्तुति करेंगे अपने विचारों का प्रसारण करेंगे

हम इससे संबन्धित उपक्रमों की अर्चा करते हुए इस अधिवेशन की चर्चा करते रहें देश विदेश से अधिक से अधिक संख्या में सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करें 


यह अधिवेशन कैसे सफल हो इसके लिए आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया

आचार्य जी का गंदगी को एक दिशा में बहाने का क्या आशय था अपनी युगभारती के सदस्य भैया विभास जी का परिणय संस्कार कब हुआ जानने के लिए सुनें