9.3.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार 9 मार्च 2024 का सदाचार संप्रेषण ९५४ वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है उद्भावयितृ ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८० तदनुसार  9 मार्च 2024 का  सदाचार संप्रेषण 

  ९५४ वां सार -संक्षेप

1 उत्कृष्ट बनाने वाला


हमें उत्कृष्ट बनाने के लिए हमें शक्तिसम्पन्न बनाने के लिए हमें सदाचारी बनाने के लिए हमारे भावों में बसे आचार्य जी नित्य प्रयास करते हैं यह हनुमान जी की बहुत  बड़ी कृपा है

आचार्य जी का प्रयास रहता है कि हम अपने पौरुष को कभी विस्मृत न करें 

संपूर्ण कर्मों की पराकाष्ठा ज्ञान है तो


तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।


उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।4.34।।


हे अर्जुन! उस तत्त्वज्ञान को तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषों के समीप जाकर समझो । उनको साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी  निस्पृह भाव से सेवा करने से और सरलतापूर्वक प्रश्न करने से तुम्हें उस तत्त्वज्ञान का उपदेश मिलेगा

आचार्य जी बार बार हमें परामर्श देते हैं कि अर्जुन की तरह यदि  अनेक विषयों में चञ्चु प्रवेश वाले लेकिन बहुत कुछ जानने की इच्छा रखने वाले हम भी  यदि प्रश्न करते हैं तो हमें इसका लाभ मिलेगा


आर्षपरम्परा का विस्तार करते ये सदाचार संप्रेषण हमें आत्मस्थ होने की प्रेरणा देते हैं हमारे अन्दर का विश्वास हमारा गुरु है

गुरुत्व हमारे भीतर विद्यमान है

इसलिए हमें आसन,वाणी, व्यवहार,संगति,खानपान, जागरण, शयन,शरीर पर  ध्यान देना चाहिए शरीर हमारा साधन है साधना का मूल है यदि साधन  पवित्र स्वच्छ होगा तो वह लक्ष्य तक पहुंचा ही देगा

आसन बहुत महत्त्वपूर्ण है अष्टांग योग के आठ योगांगों में आसन भी है

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि


प्रश्नोत्तर आसन सिद्ध होते हैं 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया सिद्धार्थ सिंह जी का नाम क्यों लिया प्रथम भक्त द्वितीय भक्त कौन हैं आदि जानने के लिए सुनें