प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८१ तदनुसार 12 मार्च 2025 का सदाचार सम्प्रेषण
*१३२२ वां* सार -संक्षेप
हम श्रोताओं को सदाचारमय विचार प्रदान करने वाले हमारी असीमित शक्तियों का हमें अनुभव कराने वाले अत्यन्त कल्याणकारी इन सदाचार संप्रेषणों को सुनने की हमारे अन्दर प्रतिदिन जिज्ञासा बनी रहती है और इनके आधार में प्रेम आत्मीयता भक्ति तप त्याग समर्पण शौर्य पराक्रम प्रविष्ट है
तुलसीदास जी
राम बाम दिसि जानकी, लखन दाहिनी ओर।
ध्यान सकल कल्यानमय, सुरतरु तुलसी तोर॥
के लिए वह ध्यान कि भगवान् श्री रामजी की बाईं ओर श्री जानकी जी हैं और दाहिनी ओर श्री लक्ष्मण जी हैं, संपूर्ण रूप से कल्याणमय मनमाना फल देने वाला कल्पवृक्ष ही है
ने अद्भुत अद्वितीय कृति श्री रामचरित मानस की जो रचना की है उसमें केवल भक्ति ही आवेष्टित है ऐसा नहीं है उनका विचार सतत जाग्रत रहा है
तुलसीदास जी ने जिनका जीवन राम की सेवा में ही व्यतीत होना निश्चित था जिस राम को उन्होंने सहज रूप से अपने अंतःस्थल में बसा हुआ पाया उसे फिर खोना नहीं चाहा
जब राम के स्थान पर काम स्थान बनाने लगा तो उनकी अर्धाङ्गिनी ने पुनः उन्हें जाग्रत कर दिया
तुलसीदास जी का ध्यान वनवासी राम पर अधिक परिलक्षित हुआ है क्यों कि उस समय दुष्ट अकबर के कारण उपजी विषम परिस्थितियों में राम उन्हें आदर्श दिख रहे थे संपूर्ण भारतवर्ष उन्हें राम के रूप में दिखाई दे रहा था
भगवान् राम के ध्यान से ऐसी विषम परिस्थितियों से राष्ट्रभक्त समाज उबर सकता था
परमात्मा की अखंड रूप से चल रही लीला अद्भुत है जिसके हम भी एक पात्र हैं हमें अपनी भूमिका की पहचान होनी चाहिए
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
त्रेता में विश्वामित्र यज्ञ करने में रत थे और रावण यज्ञ विध्वंस में
ऐसे में परमात्मा मार्ग सुझाता है
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥
आचार्य जी ने एक प्रसंग बताया कि लस्सी न मिलने पर कपड़े की दुकान में कपड़े देखने में किसी ने कैसे अपना समय व्यतीत किया
उसका सार यह है कि हमें समय नहीं बिताना है हमें समय को सार्थक करना है
हमें अपना लक्ष्य विस्मृत नहीं करना है हमें राष्ट्र के जाग्रत पुरोहित के रूप में अपनी भूमिका के साथ न्याय करना है
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम चिन्तन मनन अध्ययन स्वाध्याय लेखन में रत हों प्रातः जल्दी जागें खानपान सही रखें
संगति का ध्यान रखें
परसंद क्या है मीराबाई के पत्र का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें