जगत जंजाल जंगल जो कहें अद्भुत कहानी है,
समंदर की सदा के साथ रहता आग-पानी है,
कि, काँटे और कोंपल साथ रह पाटल खिलाते हैं,
बुढ़ापे का सहारा बन खड़ी रहती जवानी है ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 11 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१५९६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७८
कर्म करते हुए सफलता का चिन्तन करें मात्र सफलता का चिन्तन और कर्म का त्याग किसी प्रकार उचित नहीं है लक्ष्य प्राप्ति तक विश्राम न करें l
आशा और विश्वास जीवन की आधारशिला हैं। आशा वह शक्ति है जो कठिनतम परिस्थितियों में भी मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। विश्वास वह संबल है जो उसे अपने लक्ष्य की ओर अडिग बनाए रखता है।
इन दोनों के बल पर मनुष्य जीवन के बड़े से बड़े संघर्षों को पार कर लेता है। ऐसे संघर्षों से उत्पन्न हुआ इतिहास केवल अतीत नहीं रहता, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाता है।
भारत इस आशा और विश्वास का अद्भुत प्रतीक है एक ऐसा देश जिसने असंख्य सुख-दुःख, पराजय-विजय, और उत्थान-पतन को सहते हुए भी मोक्ष, मुक्ति और आत्मकल्याण की कामना को सर्वोच्च स्थान दिया है। यह जाज्वल्यमान ध्रुवतारा बनकर सम्पूर्ण विश्व को प्रेरणा देता आया है।मोक्ष का अर्थ है सारे जंजालों से मुक्ति l किन्तु संसार का सत्य है कि लालसा बनी रहती है और इससे संघर्ष का नाम तत्त्व है l
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।4.16।।
कर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषय में विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ संसार-बन्धन से मुक्त हो जायगा।
भैया अखिलेश तिवारी जी भैया वीरेन्द्र जी भैया डा अमित जी भैया प्रदीप श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ मार्ग से दूर होने पर क्या होता है मार्ग कैसे आनन्द देता है अधिवेशन कैसा स्वरूपहोता है धुरन्धर की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें