संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥ 45॥
हे प्रभो! संत लोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनि भी यही बतलाते हैं कि गुरु के साथ छिपाव करने से हृदय में निर्मल ज्ञान नहीं होता॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 12 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१५९७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७९
अपनी भावी पीढ़ी में अपने सांस्कृतिक रत्नों, जैसे कि वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत एवं अन्य ग्रंथों के प्रति श्रद्धा एवं रुचि जाग्रत करने का हम प्रयास करते रहें
भाव -जगत का विस्तार अद्भुत है इन वेलाओं के माध्यम से हमें अपने भाव-जगत में प्रवेश करने का सतत प्रयास करना चाहिए, जिससे हम अपने सनातन धर्म की विशेषताओं को भली-भाँति जान सकें यह आत्मचिंतन हमें अनेक प्रकार के भ्रमों से मुक्त करता है और हमारे भीतर अपने ही सांस्कृतिक रत्नों, जैसे कि वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत एवं अन्य ग्रंथों के प्रति श्रद्धा एवं रुचि जाग्रत करता है।
इस भावभूमि पर स्थित होकर हम चिन्तन, मनन, स्वाध्याय, लेखन एवं आत्मविकास की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। यही प्रवृत्ति हमें अपने वास्तविक स्वरूप की ओर उन्मुख करती है और धर्म, ज्ञान तथा साधना से युक्त जीवन का पथ प्रशस्त करती है।
तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में
हे राम! करो उद्धार ज्ञान की शक्तिदायिनी किरणों से।
हम भटक रहे मृगवारि बीच
विभ्रमित पियासे हरिणों से ॥
ऐसे ही विभ्रमित मुनि भरद्वाज भी हो गये थे
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥
जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥
एक बार पूरे मकर भर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने-अपने आश्रमों को लौट गए। किन्तु परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनि को चरण पकड़कर भरद्वाज ने रोक लिया क्योंकि वे अपनी शंकाएं दूर करना चाहते थे
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥
एक राम तो अवध नरेश दशरथ के कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है। उन्होंने स्त्री के विरह में अपार दुःख उठाया और क्रोध आने पर युद्ध में रावण को मार डाला।
दो विद्वान् जब मिलते हैं तो एक प्रकार का संगम निर्मित हो जाता है जिसमें उनकी भावभक्ति सरस्वती नदी की तरह अप्रत्यक्ष रहती है जहां यमुना संसार के समान और गंगा मैया,जो बौद्धिकता भावनाओं विचारों विश्वासों का सम्मर्द ही है और जिसका स्वरूप पानी नहीं ब्रह्म-द्रव है,सार के समान है
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