अहर्निशं किं परिचिन्तनीयं
संसार मिथ्यात्वशिवात्म तत्त्वम् ।
प्रश्न :- रात-दिन विशेष रूप से क्या चिन्तन करना चाहिए ?
उत्तर:-संसार का मिथ्यापन और कल्याणरूप परमात्मा का तत्त्व |
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 14 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१५९९ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८१
हमें कर्तव्य करते हुए भी भीतर से शांत और आनंदमय रहना चाहिए
श्री शंकराचार्य जी की प्रश्नोत्तर-मणिमाला बहुत ही उपादेय पुस्तिका है | इसके प्रत्येक प्रश्न और उत्तर पर मनन पूर्वक विचार करना आवश्यक है | संसार में स्त्री, धन और पुत्रादि पदार्थों के कारण ही मनुष्य विशेष रूप से बन्धन में रहता है, इन पदार्थों से वैराग्य होने में ही कल्याण है l
अपार संसार समुद्र मध्ये
निमज्जतो मे शरणं किमस्ति ।
गुरो कृपालो कृपया वदैत-
द्विश्वेश पादाम्बुज दीर्घ नौका ॥ १॥
प्रश्न :- हे दयामय गुरुदेव ! कृपा करके यह बताइये कि अपार संसाररूपी समुद्र में मुझ डूबते हुए का आश्रय क्या है ?
उत्तर :- विश्वपति परमात्मा के चरणकमलरूपी जहाज |
बद्धो हि को यो विषयानुरागी
को वा विमुक्तो विषये विरक्तः ।
को वाऽस्ति घोरो नरकः स्वदेह-
स्तृष्णाक्षयः स्वर्ग पदं किमस्ति ॥ २॥
प्रश्न :- वास्तव में बँधा कौन है ?
उत्तर:- जो विषयों में आसक्त है |
प्रश्न :- विमुक्ति क्या है?
उत्तर:- विषयों से वैराग्य |
प्रश्न :- घोर नरक क्या है ?
उत्तर:- अपना शरीर |
प्रश्न :- स्वर्ग का पद क्या है ?
उत्तर:- तृष्णा का नाश होना |
यह संसार संबंधों का एक जटिल तानाबाना है। इन संबंधों में निकटता और दूरियाँ, मेल-मिलाप और मतभेद आते रहते हैं। मनुष्य जीवन में सम्बन्ध स्वाभाविक रूप से बनते हैं, परंतु उन्हें निभाना और सुरक्षित रखना ही सच्ची बुद्धिमत्ता और संवेदनशीलता है।संबन्धों की मधुरता को बनाए रखने के लिए विश्वास, त्याग, सहनशीलता और संवाद आवश्यक है। यदि हम इन्हें संभालकर न रखें, तो जीवन में अकेलापन, कटुता और विघटन आ सकता है। अतः हमें चाहिए कि अपने संबंधों को स्नेह, श्रद्धा और आत्मीयता से सींचते रहें, तभी हमारा जीवन संतुलित और सुखद बन सकता है।
संसार एक ऐसा मंच है जहाँ समस्याएँ भी हैं और उनके समाधान भी। यह कष्ट भी देता है और साथ ही आनंद भी प्रदान करता है।यदि हम संसार में पूरी तरह लिप्त हो जाते हैं, उसमें डूब जाते हैं, तो हम निरंतर दुख, आशा-निराशा और व्यग्रता में फँसे रहते हैं। परन्तु यदि हम संसार से अलिप्त रहते हुए उसमें अपने कर्तव्य निभाते हैं तो हमारे भीतर निरन्तर आनंद रहता हैl
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अपनी रचित एक कविता सुनाई
आज मेरा मन व्यथित है
चाहता कहना मगर लगता कि पहले से कथित है...
इसके अतिरिक्त आचार्य जी की भैया मनीष कृष्णा जी से क्या अपेक्षा है आचार्य श्री चन्द्रपाल सिंह जी आचार्य श्री शेंडे जी आचार्य श्री प्रयाग जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें