अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 16 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१६०१ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८३
अध्यात्म के अधिकारी होने के लिए ताकि समाज में प्रशंसा के पात्र बनें और कालान्तर में वन्दित भी हो सकें अपने शरीर को साधें उचित खानपान पर ध्यान दें आचरण विनम्र होना भी अनिवार्य है
अध्यात्म तब ही प्रभावी होता है जब उसमें शौर्य का संग हो। बिना शौर्य के अध्यात्म निष्क्रिय और केवल आत्मकेन्द्रित हो सकता है, जबकि शौर्ययुक्त अध्यात्म समाजोन्मुखी और राष्ट्रोपयोगी होता है। अतः अध्यात्म को सशक्त और सक्रिय बनाने के लिए शौर्य की अनिवार्यता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। शौर्य में शक्ति सामर्थ्य पराक्रम और उपाय आदि बहुत कुछ समाहित है
मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है। समय रहते ईश्वर भजन, सत्कर्म और विनम्र आचरण ही जीवन को सार्थक बनाते हैं। अहंकार, धन-संपत्ति और दिखावे अंततः व्यर्थ सिद्ध होते हैं।
मन पछितैहै अवसर बीते।
दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते॥१॥
सहसबाहु, दसबदन आदि नप बचे न काल बलीते।
हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते॥२॥
जब समय बीत जाएगा तब मन पछताएगा, इसलिए समय रहते इस दुर्लभ मनुष्य शरीर को पाकर भगवान् के चरणों का स्मरण, कर्म, वाणी और मन से करना चाहिए।सहस्रबाहु, रावण जैसे बलशाली राजा भी काल के प्रभाव से नहीं बच सके। जिन्होंने 'मैं-मैं' करके बहुत धन-संपत्ति और वैभव जुटाया, वे अंत में सब यहीं छोड़कर खाली हाथ ही चले गए।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने महानाटक किसे कहा भैया नीरज जी का उल्लेख क्यों हुआ सृष्टि कैसे चल रही है एक विशाल यज्ञ कहां और कब करने की योजना है जानने के लिए सुनें