17.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 17 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०२ वां* सार -संक्षेप

 बनते मिटते भूगोल सदा इतिहास बनाया करते हैं 

पौरुष रण करते -करते भी मधुमास मनाया करते हैं


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 17 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०२ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८४


(करु बहियां बल आपनी, छोड़ बिरानी आस।

जाके आंगन नदिया बहै, सो कस मरै पियास।।)


(कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य को अपनी शक्ति पर भरोसा रखना चाहिए, न कि दूसरों की आशा में बैठना चाहिए। जिस व्यक्ति के आँगन में स्वयं नदी बहती हो, वह यदि प्यासा मर जाए तो यह उसकी मूर्खता है। इसका तात्पर्य है  जिसके पास स्वयं साधन-संपत्ति, ज्ञान या अवसर हों, वह यदि फिर भी अभाव की बात करे, तो वह अपने पुरुषार्थ का उपयोग नहीं कर रहा। अतः) हम अपने पुरुषार्थ का उपयोग करें अपने मनुष्यत्व की अनुभूति करें


हमारी संस्कृति, साहित्य, विचार और चिन्तन इस सृष्टि में अद्वितीय एवं श्रेष्ठ हैं। किंतु यह वैभव आज अस्त-व्यस्त प्रतीत होता है, क्योंकि हमने अध्यात्म को केवल एक पक्ष त्याग, तप और वैराग्य  तक सीमित कर दिया, उसे एकांगी रूप में ग्रहण किया। इस एकांगिता के कारण जीवन का संतुलन बिगड़ा और समाज में निष्क्रियता बढ़ी। इन सदाचार वेलाओं, जो हमारे कल्याण का एक उपक्रम हैं, का मूल उद्देश्य इसी एकांगिता को समाप्त करना है। ये हमें  नित्य स्मरण कराती हैं कि अध्यात्म केवल ध्यान और त्याग का नाम नहीं, बल्कि उसमें शौर्य, शक्ति, कर्म और पराक्रम भी समाहित होने चाहिए। जब अध्यात्म शौर्य से प्रमंडित होता है, तभी वह समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनता है।


इसलिए आज आवश्यकता है एक ऐसे संपूर्ण अध्यात्म की, जो अंतर्मुखी साधना के साथ-साथ बहिर्मुखी सेवा, संघर्ष और रक्षण के गुणों को भी आत्मसात् करे। यही पूर्ण सनातन दृष्टिकोण है।

भगवान् राम ने मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर न केवल संयमित जीवन जिया, बल्कि अन्याय और अधर्म के विरुद्ध युद्ध कर राक्षसों का संहार भी किया।उन्होंने यह दिखाया कि अध्यात्म का अर्थ पलायन नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ जीवन और साहसपूर्ण कर्म है।

भगवान् कृष्ण ने युद्धभूमि में गीता का उपदेश देकर अर्जुन को मोह से मुक्त किया और यह बताया कि जब धर्म की हानि हो, तो केवल साधना नहीं, शस्त्र भी उठाना आवश्यक होता है।

आचार्य जी ने स्वरचित "गोमुख से पूछ रही गंगा" कविता सुनाई

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने संसार की तुलना गणित के प्रश्न से कैसे की गीता के किन छंदों का आज उल्लेख किया भैया मनीष कृष्णा जी किसमें जुटे हैं भैया संतोष मल्ल जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें