18.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 18 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०३ वां* सार -संक्षेप

 सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।

भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 18 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०३ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८५


संसार का समुचित संचालन कर्म पर ही आधारित है—हर प्राणी, हर व्यवस्था कर्म से जुड़ी हुई है। यदि हम मनुष्य अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाए, तो जीवन का संतुलन ही बिगड़ जाएगा। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने धर्मानुसार कर्म करें, जिससे न केवल हमारा जीवन सार्थक बने, बल्कि समाज और संसार भी सही मार्ग पर अग्रसर हों।



गरुड जी की शंका (  प्रसंग :भगवान् राम का नागपाश में बंधना )का समाधान करते हुए कागभुषुण्डि जी कहते हैं कि

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥

आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥1॥


वह ब्रह्म मैं हूँ यह जो अखंड  वृत्ति है, वही उस ज्ञानदीपक की परम प्रचंड दीपशिखा  है।इस प्रकार जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है


तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति क्लेस।

हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥118 क॥


इस प्रकार ज्ञान दीपक के बुझ जाने पर तब फिर जीव अनेक प्रकार से जन्म-मरण आदि के क्लेश पाता है। हे पक्षीराज! हरि की माया अत्यंत दुस्तर है, वह सहज ही में तरी नहीं जा सकती

ज्ञान का मार्ग कृपाण की धार के समान है। हे पक्षीराज! इस मार्ग से गिरते देर नहीं लगती। जो इस मार्ग को निर्विघ्न निबाह ले जाता है, वही कैवल्य (मोक्ष) रूप परमपद को प्राप्त करता है


संत, पुराण, वेद आदि यह कहते हैं कि कैवल्य रूप परमपद अत्यंत दुर्लभ है, किंतु हे गोसाईं! वही (अत्यंत दुर्लभ) मुक्ति श्री राम जी को भजने से बिना इच्छा किए भी आ जाती है


 जिन राम के कार्य और व्यवहार को देखकर आप आशंकित हो गये थे उन्हीं के पद पंकज भजिए क्योंकि वो परम पिता परमेश्वर हैं और नर लीला इस कारण उन्होंने की क्योंकि उनको सृष्टि का कल्याण करना था

भक्ति की शक्ति अद्भुत है वह जीवन के कष्टों को सहने का अंतर्बल, कर्म करते हुए स्थिरता और परमात्मा से एकत्व की अनुभूति देती है।

मानसिक वेदनाओं को दूर करती है

इसके अतिरिक्त किसकी गले की शल्य चिकित्सा हुई भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी का उल्लेख क्यों हुआ संगठन क्यों टूटता है जानने के लिए सुनें