प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 19 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१६०४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८६
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हमने अपना उद्देश्य निर्धारित किया है *राष्ट्र-निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष*
इसका तात्पर्य है कि हमारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व राष्ट्र के प्रति समर्पित हो, और वह ऐसा हो जो समाज के लिए उपयोगी, प्रेरणादायी और मार्गदर्शक बने।
इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हमारा चिन्तन, मनन, विचार तथा विश्वास सभी राष्ट्र की सेवा और उत्थान में लगें। यह समर्पण केवल भावनात्मक न होकर व्यवहारिक एवं कर्मप्रधान होना चाहिए। जब हम सत्कर्म करेंगे — जैसे सेवा, सहयोग आदि कार्य — तो समाज हमें पहचानेगा
और सत्कर्मों के लिए भाव जाग्रत होगा संत समागम आदि द्वारा
गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।
बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान॥125 ख॥
हे गिरिजे! संत समागम के समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वह संत समागम श्री हरि की कृपा के बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं॥125 (ख)॥
मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥
तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥2॥
श्रीरामचरित मानस की फलश्रुति का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं
जो कान और मन लगाकर इस कथा को सुनते हैं, उनके मन, वचन और कर्म (शरीर) से उत्पन्न सब पाप नष्ट हो जाते हैं
ऐसी अद्भुत है रामकथा
इसी में एक प्रसंग है
पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥2॥
पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनंद भरे मन से अपनी रत्न जडि़त अँगूठी (अँगुली से) उतारी। कृपालु श्री रामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो।
केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए
उसने कहा- हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी॥
ऐसी अद्भुत है रामकथा जिसका नित्य पाठ करने से जिसे आत्मसात् करने से समाज का कलुष दूर हो सकता है जाति भेद समाप्त हो सकता है
इस कथा में भगवान् राम का जो रामत्व प्रदर्शित किया गया है वह अप्रतिम है
राम का रामत्व एक उच्चतम आदर्श का प्रतीक है। यह एक ऐसा दिव्य गुण-संपन्न स्वरूप है, जिसमें मर्यादा, करुणा, शौर्य, धर्म, नीति, दया, त्याग, भक्ति, कर्तव्यनिष्ठा एक साथ समाहित हैं।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने किसे परमेश्वर स्वरूप कहा जानने के लिए सुनें