20.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 20 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०५ वां* सार -संक्षेप

 राम कहत चलु , राम कहत चलु , राम कहत चलु भाई रे ।


नाहिं तौ भव - बेगारि महँ परिहै , छुटत अति कठिनाई रे ॥१॥


बाँस पुरान साज सब अठकठ , सरल तिकोन खटोला रे ।


हमहिं दिहल करि कुटिल करमचँद मंद मोल बिनु डोला रे ॥२॥


बिषम कहार मार - मद - माते चलहिं न पाउँ बटोरा रे ।


मंद बिलंद अभेरा दलकन पाइय दुख झकझोरा रे ॥३॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 20 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०५ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८७

हम अपने चिन्तन मनन विचार आदि का सामञ्जस्य करें और अन्य जो ऐसा करें उनके साथ संगठित होएं जिससे शक्ति वृद्धिंगत हो सके


भारतवर्ष एक विलक्षण और दिव्य राष्ट्र है, जिसकी प्रकृति अत्यन्त अद्भुत है। इसके इतिहास में समय-समय पर उत्थान और पतन की घटनाएँ घटित होती रही हैं, जो इसकी जीवंतता और गतिशीलता के प्रमाण हैं। परन्तु जो लोग केवल बाह्य दृष्टि से इसे देखते हैं, वे इसके क्षणिक पतन से व्याकुल हो उठते हैं। इसका कारण यही है कि वे भारत की आत्मा, इसके गूढ़ आध्यात्मिक स्वरूप को नहीं पहचानते।


यदि भारतवर्ष की केवल भौतिक रचना को देखा जाए, तो कभी-कभी यह दुर्बल और संकटग्रस्त प्रतीत हो सकता है। किन्तु जब इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो स्पष्ट होता है कि भारत की आत्मा सदैव जाग्रत है। ऐसा प्रतीत होता है कि जब सब कुछ बुझने को होता है, उसी क्षण भीतर की तेजस्विनी ज्योति पुनः प्रज्वलित हो उठती है। यही भारत की सनातन चेतना है, जो इसे युगों-युगों तक अक्षुण्ण रखती है।


इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हम भारत को उसकी मूल आत्मा के साथ समझें। केवल संकट देखकर हताश न हों, अपितु भारत की गहराई और सामर्थ्य में विश्वास रखते हुए, अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखें। यही जागरूकता और आशा का भाव हमें भारत के निर्माण में सहभागी बनाएगा।


परम विद्वान् भक्त विचारक चिन्तक समाजसेवक तपस्वी गोस्वामी तुलसीदास जिनसे उस समय की सत्ता भी भयभीत रहती थी भारत के निर्माण में सहभागी बने वे राम के रामत्व में रमने वाले उनके शक्ति-तत्त्व को पहचानने वाले एक अद्भुत भक्त बन गये

 ऐसे भक्त और भगवान् के सामञ्जस्य को समझना अत्यन्त कठिन है 


सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥



इसके अतिरिक्त टेढ़ी खीर का प्रचलन कैसे हुआ बेगार क्या है जानने के लिए सुनें