राम-नाम छाँड़ि जो भरोसो करै और रे ।
तुलसी परोसो त्यागि माँगे कूर कौर रे ॥५॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 22 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१६०७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८९
आदित्य हृदय स्तोत्र जो भगवान् सूर्य की स्तुति है, और जो श्रीराम को रावण से युद्ध में विजय दिलाने के लिए ऋषि अगस्त्य द्वारा बताया गया था का पाठ करें; यह स्तोत्र सूर्य देव के अनेक नामों (जैसे ब्रह्मा, विष्णु, शिव, तेज, नक्षत्रों के स्वामी) का स्मरण करते हुए उनकी कृपा मांगता है, जिससे सभी विघ्न दूर होते हैं, संकट कटते हैं और जीवन में विजय प्राप्त होती है, साथ ही स्वास्थ्य अच्छा रहता है
तुलसीदास जी, जो ऋषितुल्य कवि माने जाते हैं, उन्होंने श्री रामचरितमानस के माध्यम से संसार (माया, व्यावहारिक जीवन) और सार (परमार्थ, ईश्वरतत्त्व) को अत्यंत सुंदर ढंग से संयुत किया है कलियुग में जिसमें धर्म का क्षय और अधर्म की प्रवृत्तियाँ प्रबल हैं केवल राम का नाम जप ही जीवन का आधार है।
राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे ।
घोर-भव नीर-निधि नाम निज नाव रे ॥१॥
एक ही साधन सब रिद्धि सिद्धि साधि रे ।
ग्रसे कलि रोग जोग संजम समाधि रे ॥२॥
यह नाम न केवल आत्मा को शुद्ध करता है, बल्कि संसार रूपी भवसागर से पार उतारने का भी सामर्थ्य रखता है। जो व्यक्ति श्रद्धा से इसका जप करता है, वह अपने जीवन में मानसिक शांति, आंतरिक शक्ति और परमात्मा से एक विशेष संबंध की अनुभूति करता है
भगवान् राम का जप हम भावपूर्ण ढंग से करेंगे तो हमारा कल्याण होगा
रामचरितमानस से हमें यह शिक्षा प्राप्त होती है कि हम संसार में जहां की समस्याओं से हम जूझते रहते हुए भी राम नाम के सहारे, समाजोन्मुख होते हुए जीवन को सारयुक्त बना सकते हैं। इसमें लेशमात्र भी भ्रम नहीं है कि समाज की समस्याओं को हल करना अत्यन्त आवाश्यक है अन्यथा हमारा जीवन ही संकट में पड़ जाएगा यही तुलसीदास जी की भक्ति और दर्शन का सार है।
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