(किं भूषणाद्भूषणमस्ति शीलं
तीर्थं परं किं स्वमनो विशुद्धम् ।
किमत्र हेयं कनकं च कान्ता)
श्राव्यं सदा किं गुरुवेदवाक्यम् ॥ ८॥
प्रश्न :- सदा(मन लगाकर) सुनने योग्य क्या है ?
उत्तर:- वेद और गुरु का वचन |
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 23 दिसंबर 2025 का *गुरु- वचन*
*१६०८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९०
पुरुषार्थ करें समाजोन्मुखता पर ध्यान दें
यद्यपि दशरथ एक पराक्रमी, धीर और तपस्वी राजा थे, फिर भी वे उस स्तर की यशस्विता को नहीं प्राप्त कर सके जो भगवान् राम को प्राप्त हुई। इसका कारण यह था कि दशरथ की दृष्टि सीमित थी वे रावण की विनाशकारी शक्ति के प्रभाव को नहीं पहचान सके, जो संपूर्ण देश को धीरे-धीरे क्षति पहुँचा रही थी। उनका शासन अयोध्या तक ही केंद्रित रहा, जबकि भगवान् राम ने नर-लीला करते हुए पूरे देश और जनमानस की चेतना को स्पर्श किया। उन्होंने रावण के विनाश के माध्यम से केवल लंका ही नहीं जीती, बल्कि अधर्म, अत्याचार और भय के वातावरण को समाप्त कर भारत को धर्म, नीति और न्याय का आधार दिया। इसीलिए उनका अद्भुत रामत्व कालजयी, लोकप्रेमी और सर्वस्वीकार्य बन गया।
हमें भी अपने मनुष्यत्व का बोध होना चाहिए। मनुष्य का शरीर केवल देह नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, प्राण और आत्मा का सम्यक् सामञ्जस्य है। हमारे भीतर परोपकार की भावना विद्यमान होनी चाहिए। यही मनुष्य जीवन की गरिमा और कर्तव्य है।
आचार्य जी ने मणिरत्नमाला की चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि यह संसार एक गहन और भयानक समुद्र के समान है, जिसमें डूबते हुए प्राणियों के लिए विश्वपति परमात्मा के चरणकमल ही एकमात्र सुरक्षित आश्रय रूपी जहाज हैं।
जो व्यक्ति विषय-वासनाओं में आसक्त है, वह वास्तव में बंधनों से जकड़ा हुआ है। यह मनुष्य-शरीर यदि विकारों और तृष्णाओं में डूबा रहे, तो वह नरक के समान है। परंतु जब तृष्णा का नाश होता है, तभी जीवन में स्वर्गतुल्य स्थिति प्राप्त होती है।
जो मनुष्य पुरुषार्थहीन है, वह यद्यपि जीवित है, फिर भी वह मृतक के समान है। इसलिए विवेक, भक्ति और पुरुषार्थ से युक्त जीवन ही सत्य अर्थों में सार्थक है।
किसने कहा हमारे दुःख कभी दूर न करना भैया पंकज जी को क्या अच्छा लगा भैया वीरेन्द्र जी ने आचार्य जी को कल क्या प्रदान किया जानने के लिए सुनें