24.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 24 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०९ वां* सार -संक्षेप म

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 24 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०९ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९१

जो अनुचित, अहितकारी और पतनकारक है, हमें उसका परित्याग कर देना चाहिए और जो उचित, हितकारी तथा उत्थानकारक है, उससे स्वयं को युक्त करना चाहिए  यही सदाचार है।


भारत की संस्कृति कोई एक विचार या भावना पर आधारित नहीं है, यह अनेक दिव्य भावों और आध्यात्मिक अनुभूतियों का समन्वित स्वरूप है।  

भारत मां का भाव हमारी मातृभूमि के प्रति सम्मान, श्रद्धा और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। यह भूमि मात्र भौगोलिक क्षेत्र नहीं, अपितु एक चेतन शक्ति मानी गई है, जिसकी रक्षा, सेवा और आराधना करना हम जैसे प्रत्येक नागरिक का धर्म है।ईश्वर का भाव हमें जीवन में आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करता है। शिव, राम और कृष्ण इन तीनों के भाव भारतीय मानस में आदर्श चरित्र और जीवन-पथ के प्रेरणा-स्रोत हैं।  

गायत्री, सावित्री, काली, सरस्वती और दुर्गा के भाव हैं इन सभी भावों के समावेश से जो जीवन-दृष्टि विकसित हुई, वही भारतीय संस्कृति का आधार बनी जो कहती है

जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक।

 इस भाव और भक्ति के साथ भारतवर्ष का साहित्य प्रसारित हुआ

और इसी भाव और भक्ति के साथ विद्या के जो आलय प्रारम्भ हुए वे अजर और अमर हैं ऐसा ही एक विद्यालय हमारा है पं दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय जिसका प्रारम्भ १८ जुलाई १९७० को  धनार्जन की वृत्ति के कारण से नहीं हुआ  अपितु शिक्षा के साथ मातृभूमि के प्रति परमपिता परमेश्वर के प्रति समाज के प्रति प्रेम और श्रद्धा को पल्लवित करने के लिए भी हुआ


जहाँ भाव, भक्ति, विश्वास और संकल्प उपस्थित हों, वहाँ जीवन का उद्देश्य उच्च होता है और इस कारण हमारे आचरण को मर्यादित होने की आवश्यकता है। उत्तम विचारों के अनुरूप आचरण करना अनिवार्य हो जाता है जब व्यक्ति भाव और भक्ति से युक्त होता है, तब वह केवल अपने लिए नहीं, अपितु समाज और सृष्टि के हित में सोचता है और ऐसे व्यक्ति को व्यसनों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि व्यसन (जैसे – क्रोध, लोभ, मद्यपान,द्यूत आदि) मन की स्थिरता को नष्ट कर देते हैं और आत्मिक बल को क्षीण कर देते हैं।



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया विनय अजमानी जी की विशेष चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें