25.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 25 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६१० वां* सार -संक्षेप

 धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः सः पन्थाः ।।१७।।


वास्तव में धर्म का मर्म तो गुहा (गुफा) में छिपा है, यानी बहुत गूढ़ है । ऐसे में समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति जैसे *अपने आचार्य जी* जिस मार्ग को अपनाते हैं वही अनुकरणीय है


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 25 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१० वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९२

संसार के साथ सार के महत्त्व को समझते हुए

सद्विचारों को संकलित करें और प्रसरित करें


मनुष्य को यह दुर्लभ शरीर केवल भोग के लिए नहीं, अपितु श्रेष्ठ कर्मों के संपादन हेतु प्राप्त हुआ है। जीवन का मूल धर्म भी कर्म है, और वही धर्म, सच्चे अर्थों में, जीवन का धन है। यदि इस धन को हम प्रातःकाल अपने विचारों में जाग्रत और सन्नद्ध करें, तो यह मानसिक दिशा पूरे दिन हमारे आचरण को प्रभावित करेगी परिणामस्वरूप, चाहे दिनभर में कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न आएं, समाधान की ओर उन्मुखता बनी ही रहेगी  ब्रह्मवेला ब्राह्मी भाव को प्रस्तुत करने में सक्षम रहती है अतः उस वेला का हमें अवश्य लाभ उठाना चाहिए

अन्यथा

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।


सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।....

 


 विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का हो जाता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

किन्तु वशीभूत अन्तःकरण वाला कर्मयोगी साधक रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ अन्तःकरण की निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होने पर साधक के सम्पूर्ण दुःखों का नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्त वाले साधक की बुद्धि निःसन्देह अत्यन्त शीघ्रता से परमात्मा में 

स्थित हो जाती है  अनेक महापुरुषों  ने सनातन संस्कृति और उसके आदर्शों की रक्षा के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया। उनके त्याग, तपस्या और बलिदान के कारण ही आज भी यह धर्म जीवित है, प्रज्वलित है और हमें सत्कर्म, समर्पण व आत्मबोध की प्रेरणा देता है।


इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम भी अपने आचरण, विचार और कर्मों द्वारा इस सनातन परम्परा की गरिमा बनाए रखें और इसे आने वाली पीढ़ियों तक अक्षुण्ण रूप में पहुंचाएं। अंग्रेजों ने जो व्यामोह उत्पन्न किया उससे बचें l



इसके अतिरिक्त आदर्श यथार्थ कैसे होता है भैया मनीष कृष्णा जी, डा सुनील जी का उल्लेख क्यों हुआ, विवेकानन्द महादेवी वर्मा आदि मोक्ष क्यों नहीं चाहते थे जानने के लिए सुनें