धुंध छाया है अभी यह भी छटेगा
जगत है शुभ अशुभ सब इसमें घटेगा
धैर्य-धन को साथ ले बढ़ते रहो
जो कसाला आ गया वह भी कटेगा ॥
प्रस्तुत है *भयकारक धुंधलके की धमक के रूप में विख्यात आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 26 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१६११ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९३
संयम श्रद्धा और साधना का मूल मन्त्र अपने भीतर रखकर अपने भारत राष्ट्र को परम वैभव सम्पन्न करने हेतु छोटे छोटे प्रयास करते रहें
हमें यह अनुभूति करनी चाहिए कि यह हमारा शरीर केवल पंचमहाभूतों से निर्मित एक तुच्छ भौतिक संरचना नहीं है, अपितु इसमें ईश्वरप्रदत्त एक विशिष्ट दिव्य ऊर्जा भी विद्यमान है। हमें इस सत्य का बोध होना चाहिए कि हमारा वास्तविक स्वरूप यह नश्वर शरीर नहीं है, वरन् वह चेतन तत्त्व है जो अजन्मा, अविनाशी, अमर और अनन्त है। यह आत्मबोध ही जीवन का सार है, जो हमें मृत्यु के भय से मुक्त कर आत्मशक्ति और दिव्यता की अनुभूति कराता है। मैं उस अंशी का अंश हूं यह आत्मबोध अद्भुत और दिव्य है जिससे हममें से वो प्रत्येक व्यक्ति संयुक्त रहता है जिसे भारतीय मनीषा का वरदान प्राप्त है
मैं मरणधर्मा जगत का जागरण हूं
और संसारी जलधि का संतरण हूं..
इसके अतिरिक्त भैया डा अमित जी के किस संदेश की आचार्य जी ने चर्चा की भैया डा पंकज जी क्या संकलित करते हैं बचपन में कवि दिनकर की भूमिका कौन करते थे?
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