प्रभात है प्रभात में प्रभा बिखेरने उठो,
शरीर-कष्ट भूल कर कलुष निबेरने उठो
उठो शरीर साध कर
कि मन विचार बाँध कर
स्व इष्ट को अराध कर
कि नित्य धर्म याद कर
सुबंधु टेरने उठो
शरीर-कष्ट भूलकर कलुष निबेरने उठो ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 27 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१६१२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९४
भगवान् राम के जीवन से शिक्षा ग्रहण करने हेतु अनेक तत्त्व हैं हम उन्हें प्राप्त करने के लिए प्रयास करते रहें
शक्ति का संघोष धीरज की धरा हूं
गगन का संतोष जलनिधि की त्वरा हूं...
और क्या हूं बहुत कुछ अवशेष अब भी...
यह संसार का सत्य है तत्त्व है इसे स्पष्ट करते हुए भगवान् शङ्कराचार्य कहते हैं
चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्
जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है यह आत्म-ज्ञान की चरम स्थिति का उद्घोष है जो बताता है कि हम शरीर, मन, विचार या कर्म नहीं हैं, बल्कि शुद्ध, मुक्त, चेतन आत्मा हैं जो न आदि है, न अंत; न भय है, न दुःख। यही सोऽहम् का बोध है कि मैं वही परम ब्रह्म हूँ।
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥2॥
प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥
उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी॥3॥
बालि के परम धाम जाने पर विदुषी तारा को भगवान् राम समझा रहे हैं कि अनित्य संसार में नित्य को लेकर हम चलते हैं इस सार को जानने के लिए और सार का संसार के साथ सामञ्जस्य बैठाने के लिए आवश्यक शक्ति की अनुभूति हेतु भक्ति अत्यन्त अनिवार्य है भक्ति की विलक्षणता अवर्णनीय है l भक्ति में शक्ति है l यह संकट में भी सहायक है l
हमारा सनातन धर्म अद्भुत है जिसके रहस्य को भौतिक दृष्टि से जानना अत्यन्त दुष्कर है l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी भैया पवन जी भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी का उल्लेख क्यों किया Geyser की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें