28.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 28 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६१३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 28 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१३ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९५

व्यक्तिगत लक्ष्य *मोक्ष* जिससे हम प्रफुल्लित रहें और समाजगत लक्ष्य *राष्ट्रोत्थान* दोनों का ध्यान रखें


ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।


मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।


भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह जीवात्मा इस संसार में मेरा ही अंश है और वह सनातन अर्थात् शाश्वत है। यह जीव, मन और पाँच इन्द्रियों सहित प्रकृति में स्थित होकर विषयों की ओर आकर्षित होता है तथा उनके प्रभाव से खिंचता और संघर्ष करता है।


भगवान् यह समझा रहे हैं कि  बद्ध जीव का असली स्वरूप दिव्य और शाश्वत है, परन्तु मन और इन्द्रियों के प्रभाव में आकर वह स्वयं को सीमित मानने लगता है। इसलिए आत्मबोध और आत्मसंयम द्वारा ही यह बंधन समाप्त किया जा सकता है और आत्मा अपने मूल स्वरूप को प्राप्त कर सकता है।

आत्मबोध व्यक्ति को यह विवेक देता है कि शरीर परिवर्तनशील है, कष्ट उसे हैं, परंतु उसका वास्तविक स्वरूप तो अजन्मा, अमर और अविकार है।

इस संसार के सार का अनुभव विलक्षण  परिणाम देता है l


तपस्वियों का फल क्या है

बैच २००० का कार्यक्रम आचार्य जी को कैसा लगा रामकृष्ण परमहंस क्यों पूजे जाते हैं  भैया सौरभ 'लल्लनटाप' की चर्चा क्यों हुई  जानने के लिए सुनें