जीवन में स्वार्थ को दोष की दृष्टि से नहीं, बल्कि उसे ऊर्ध्वगामी बनाकर परमार्थ की दिशा में ले जाने की आवश्यकता है। तभी जीवन सार्थक होता है......
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 29 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१६१४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९६
परमात्मसत्ता की भक्ति किसी भी रूप में करें
जब ज्ञान किसी जटिलता में उलझकर आगे नहीं बढ़ पाता तब मनुष्य की चेतना किसी गहरे समाधान या मार्गदर्शन के लिए एक और मार्ग अपनाती है, और वह है भक्ति l
भक्ति ज्ञान को पीछे नहीं छोड़ती, बल्कि जब ज्ञान बाधित हो, तब भक्ति उसे आगे ले जाती है l
अर्जुन कम ज्ञानी नहीं हैं वे ज्ञानी होने के साथ सांसारिक कलाविद, युद्धविद्या विशारद,अध्येता,तपस्वी, जयस्वी हैं किन्तु मोहांध हो गये जिसके कारण उनकी स्थिति अत्यन्त विषम हो गयी ऐसी स्थिति में भगवान् कृष्ण उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं तो भी अर्जुन को समझ में नहीं आता तब वह अपना विराट् स्वरूप दिखाते हैं तब उन्हें समझ में आ जाता है इसका अर्थ हुआ कि संसार जब शक्ति के स्वरूप का दर्शन करता है तो वह संसार के असारत्व को पार कर जाता है भक्ति और ज्ञान एक स्थान पर आदर्श स्वरूप में जब विराजमान् हो जाते हैं तब आनन्द की अनुभूति होती है
अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।
जेहि जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥
यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिये।...
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया कि रामचरित मानस के सारे तत्त्वों को जानना अत्यन्त दुष्कर है और उन्होंने कठपुतली का उल्लेख भी किया
भैया डा अमित जी भैया डा अजय जी भैया डा मधुकर वशिष्ठ जी भैया शैलेन्द्र दीक्षित जी, भैया रामेन्द्र जी, भैया वीरेन्द्र जी का उल्लेख क्यों किया जानने के लिए सुनें