30.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 30 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६१५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 30 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१५ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९७

अविद्या और विद्या दोनों को जानें 



कविं पुराणमनुशासितार


मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।


सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप


मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।8.9।।


हमारे लिए ध्यान के योग्य परमात्मा वह है जो वैविध्य भरी सृष्टि का मूल है, जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है और जो ज्ञेय होकर भी ज्ञान से परे है। उसका स्मरण हमें आत्मोन्नति और परम शान्ति की ओर ले जाता है  और जो हमें

भ्रम, अज्ञान,मोह,भय, निराशा से दूर करता है

केवल ज्ञान या साधना ही नहीं, अपितु भक्ति, चित्त की स्थिरता और योगबल का समन्वय आवश्यक है। जो मृत्यु के क्षण में भी परमात्मा का ध्यान स्थिर मन से करता है, वह जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त करता है।

भगवान् कृष्ण कहते हैं

वेद के जानने वाले विद्वान् जिसे अक्षर कहते हैं रागरहित यत्नशील पुरुष जिसमें प्रवेश करते है जिसकी इच्छा से (साधक गण) ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं - उस पद (लक्ष्य) को मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।।


इन्द्रियों के  सम्पूर्ण द्वारों को रोककर मन का हृदय में निरोध करके और अपने प्राणों को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्म का  उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़कर जाता है, वह परमगति को प्राप्त होता है।



आचार्य जी ने बताया कि हम संसार की समस्याओं के समाधान खोजते हुए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करें

जैसे हमारा लक्ष्य है राष्ट्र-निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष

अपने राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाना भी एक लक्ष्य है

आनन्द की अनुभूति होती रहे यह भी एक लक्ष्य है


आचार्य जी ने भगवान् राम की कृपा को भक्ति के रूप में स्पष्ट किया

भगवान् गौतम बुद्ध का कौन सा प्रसंग आचार्य जी ने बताया तरबूज वाला प्रसंग क्या था जानने के लिए सुनें