यह जन्म जीवन मरण का अद्भुत अनोखा खेल है,
संसार का यह सत्य पर सच कहूँ---बहुत अझेल है,
ज्ञानी मनस्वी भक्त सब व्यामोह से जकड़े हुए
कोई न कोई शान्ति-सुख लोभी जतन पकड़े हुए।
इस जतन को ही स्यात ज्ञानी "साधना" कहकर गए,
औ भक्त शायद इसी को आराधना भजते भये ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 31 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
*१६१६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९८
समाज को सुखी करने और राष्ट्र की आराधना करने वाले अपने लक्ष्यों को कभी ओझल न करें
प्रातःकाल की शुभ वेला आत्मविकास के लिए उपयुक्त होती है, जहाँ मन शांत, वातावरण निर्मल और एकाग्रता सहज होती है। आज के अत्यन्त व्यस्त समय में चिन्तन, मनन, अध्ययन, स्वाध्याय एवं लेखन जैसे सत्कार्यों की साधना तभी संभव है जब हमें प्रातःकाल शीघ्र जागने का परमात्मा द्वारा वरदान प्राप्त हो।
छोटी-छोटी चीजें जैसे कष्टों को सहन कर लेना, समस्याओं को धैर्यपूर्वक झेल लेना आदि को वास्तव में उनका वरदान ही समझना चाहिए क्योंकि इन्हीं के माध्यम से वे हमारी सहनशीलता, दृढ़ता और आंतरिक शक्ति को जाग्रत करते हैं वे हमारी प्रत्येक परिस्थिति में हमारी परीक्षा लेकर हमें सशक्त और परिपक्व बनाते हैं इसलिए जो भी दुःख या कष्ट जीवन में आता है, उसे परमात्मा की योजना का भाग मानकर स्वीकार करना ही सच्चा आत्मबोध है हमें जितना प्राप्त हुआ है, उसे ही अधिक मानकर उसके प्रति परमात्मा का आभार व्यक्त करना चाहिए। उनकी शक्ति सीमित नहीं, वह अनन्त है, और उनकी इच्छा के बिना कुछ भी घटित नहीं होता। गीता में उनका विराट् स्वरूप अर्जुन को यह अनुभव कराने के लिए दिखाया गया कि वे कोई साधारण मनुष्य नहीं, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्मांड के नियंता और धर्म के पालक हैं।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।11.33।।
इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो। इसी प्रकार दंभी रावण परमात्मा की शक्ति को अनुभव नहीं कर पा रहा है तो असुरों के राजा मयासुर और अप्सरा हेमा की पुत्री विदुषी मन्दोदरी उसे समझाने का प्रयास करती है
अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान।
मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान॥
हमें ऐसे परमात्मा की भक्ति का आश्रय विश्वासपूर्वक लेना चाहिए भक्ति का आश्रय *स्व* के लिए तो है ही *पर* अर्थात् समाज हेतु भी हो तो अतिउत्तम
क्योंकि तब हम समाज को सुखी देखना चाहेंगे इसी कारण हम राष्ट्र की आराधना करते हैं संगठन निर्मित करते हैं
आचार्य जी ने उस प्रसंग की ओर भी संकेत किया जिसमें भगवान् राम के वनगमन के पश्चात् गुरुजन और परिवारजन भरत से अयोध्या के शासनभार को ग्रहण करने का आग्रह कर रहे हैं। इस प्रसंग के माध्यम से नेतृत्व में विनय, त्याग और आदर्श आचरण का महत्त्व रेखांकित हुआ है।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया मनीष जी का उल्लेख क्यों किया लोटपोट का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें