1.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 1 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६१७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 1 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१७ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९९

अपने कर्तव्य में फल का व्यामोह नहीं होना चाहिए और  हमें साधना ऐसी करनी चाहिए जो सिद्धिमुक्त हो


जीवन जगत संसार दुनिया नाम रूपों का समर 

जिस किसी ने भी रचा यह नाम उसका है अमर ll

इस समर में उतर कर नर को अगर होना अमर

सतत निस्पृह भाव से संघर्ष करना है प्रखर ॥

इस प्रखर संघर्ष को ही कर्म गीता ने कहा 

और यह भारत-धरा पर ज्ञान-रस बनकर बहा ॥

ज्ञान का सम्मान करना ही हमारा धर्म है 

 मूलतः अमरत्व  के स्वर का यही शिव मर्म है ॥



आत्मज्ञानी व्यक्ति को शरीर के त्याग में दुःख नहीं होता क्योंकि आत्मा तो अमर है, केवल शरीर रूपी आवरण गिरता है।  ऐसा व्यक्ति मृत्यु को त्याग नहीं, एक सहज परिवर्तन मानता है। यह भी पराक्रम का एक प्रकार है l मानस में आये निम्नांकित उदाहरण को देखिये जो निश्चित रूप से हमें बल देगा


राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग। सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥10


बालि जो पहले भगवान् राम के विरोध में था, मृत्यु के क्षणों में प्रभु के चरणों में प्रेमपूर्वक समर्पित हो गया। उसने तन का त्याग सहजता से किया, जैसे कोई हार अपने आप गले से उतर जाए और धारण करने वाला उसे महत्त्वहीन समझे।

और स्वधर्म का पालन, भले ही दोषयुक्त लगे, त्याज्य नहीं है। त्याग, आत्मसंयम और आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करने वाला व्यक्ति ज्ञान के चरम स्तर तक पहुँच सकता है और अन्ततः ब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है।

कर्म ज्ञान भक्ति उपासना आदि का मूल तत्त्व यही है कि परमात्मा जो भी करता है सब अच्छा ही करता है हमें प्रयास करना चाहिए कि ऐसा भाव विचार हमारा सतत बना रहे

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों किया आज आचार्य जी की कहां जाने की योजना है जानने के लिए सुनें