2.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 2 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६१८ वां* सार -संक्षेप स्थान : ग्राम सरौहां

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 2 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१८ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १००

हम विश्वास करें कि भक्ति में शक्ति होती है उस भक्ति का आधार लेकर समाजोन्मुखी कार्य करते रहें


रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।

 रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम:॥...


इस मंत्र का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मनुष्य को अत्यन्त शांति और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है। यह मंत्र भगवान् राम के विविध स्वरूपों का स्मरण कराता है और साधक के हृदय में भक्ति, विनय और धर्मभावना को जाग्रत करता है। इसके जप से मन स्थिर होता है, चिंताओं का नाश होता है और जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। यह मंत्र साधक को भगवान् राम और माता सीता की कृपा का पात्र बनाता है जिससे जीवन में स्थितियाँ अनुकूल होने लगती हैं। इस मंत्र के प्रभाव से व्यक्ति के भीतर मर्यादा, संयम और कर्तव्यबोध की भावना सुदृढ़ होती है,उसे शक्ति की अनुभूति होती है जो जीवन को सफल और सार्थक बनाती है।भगवान् राम हमें सचेत करते हैं कि जीवन में विश्राम की जो धारणा है, वह एक भ्रम है। यह संसार निरन्तर परिवर्तनशील है, इसमें कहीं स्थायित्व नहीं। जब हम सोचते हैं कि अब सब स्थिर है, सब शांत है, वही हमारी सबसे बड़ी भूल होती है जीवन का सत्य तो सतत प्रयास है। विश्राम की प्रतीति हमारे पुरुषार्थ को शिथिल करती है।

आचार्य जी ने बताया कि जिसकी जितनी पात्रता होती है देवता उसको उतना ही देता है l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया सौरभ राय जी, भैया समीर राय जी, भैया राजेश मल्होत्रा जी,भैया अमित गुप्त जी,भैया सुनील पांडेय जी,श्री उत्तम जी, श्री राम कुमार जी की चर्चा क्यों की, हनुमत् कवच का उल्लेख क्यों हुआ,किनकी पौरुषेय वाणी से आचार्य जी प्रभावित रहे, रुदन-मण्डल में क्या होता था जानने के लिए सुनें